✕
बड़े खतरे से जूझता मणिपुर
By EditorialPublished on
मणिपुर (Manipur) में दो महिलाओं के साथ रूप से यौन हिंसा की अमानवीय घटना से पूरे देश में आक्रोश है। इस घटना के बाद राज्य में मैती एवं कुकी के बीच नए सिरे से तनाव भड़कने की आशंका है। मणिपुर में मैती और 34 जनजातियां सदियों से साथ रह रही हैं। मणिपुर मुख्य रूप से पर्वतीय राज्य है। मैदानी क्षेत्र के करीब 10 प्रतिशत में मैती और 90 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र में जनजातियां रहती हैं। कई त्योहारों के संस्कार ऐसे हैं जो मैती और जनजातियों के प्रगाढ़ संबंधों को प्रमाणित करते हैं।

x

डा. एलांगबम विजयलक्ष्मी
मणिपुर (Manipur) में दो महिलाओं के साथ रूप से यौन हिंसा की अमानवीय घटना से पूरे देश में आक्रोश है। इस घटना के बाद राज्य में मैती एवं कुकी के बीच नए सिरे से तनाव भड़कने की आशंका है। मणिपुर में मैती और 34 जनजातियां सदियों से साथ रह रही हैं। मणिपुर मुख्य रूप से पर्वतीय राज्य है। मैदानी क्षेत्र के करीब 10 प्रतिशत में मैती और 90 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र में जनजातियां रहती हैं। कई त्योहारों के संस्कार ऐसे हैं जो मैती और जनजातियों के प्रगाढ़ संबंधों को प्रमाणित करते हैं।
मैती शासन में उस समय परिवर्तन आया, जब 18वीं शताब्दी में राजा पामहैबा वैष्णव बन गए। परिणामस्वरूप अधिकांश मैती वैष्णव मतावलंबी हो गए। 1891 में अंग्रेजों के हाथों मणिपुर की पराजय हुई और फिर 1945 में वह द्वितीय विश्व युद्ध का साक्षी बना। इस युद्ध के बाद लोकतांत्रिक तरीके से महाराजा बोधचंद्र के नेतृत्व में मणिपुर एक्ट, 1947 बना । जब भारत आजाद हुआ, तब मणिपुर एक स्वतंत्र क्षेत्र था और उसका अपना संविधान था ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभाव से मणिपुर की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियां बदलीं। 1949 में मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र और भारत सरकार के बीच एक संधि के तहत मणिपुर स्टेट का भारत में विलय हुआ। 1956 में मणिपुर केंद्रशासित प्रदेश बना। 1972 में उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और 34 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति की मान्यता मिली। मणिपुर में कुछ ऐसी जनजातियां भी हैं, जो अपने को न कुकी माती हैं और न ही नगा । मणिपुर में इस्लाम मानने वाले भी हैं, जिन्हें मैती पांगल कहते हैं । नेपाल, बिहार के अलावा जैन समुदाय के लोग भी यहां हैं ।
नगा और मैती लोगों को ही मणिपुर का मूल निवासी माना जाता है। बाकी समुदा यहां बाद में आए। कुकी लोगों का मणिपुर में आगमन 1844 से शुरू हुआ । कुकी बर्मा यानी म्यांमार से आकर यहां की पहाड़ियों में बसते रहे। उनका आगमन जारी है। जो कुकी मणिपुर आ चुके हैं, वे अपने लिए अलग स्थान और प्रशासन चाहते हैं। चूड़चंदपुर पर कुकी अपना दावा करते हैं, जबकि इसे मैती महाराजा चुड़ाचांद के नाम पर बसाया गया था। बाद में इस क्षेत्र से ही मैती लोगों को भागना पड़ा । मणिपुर में एक संप्रदाय का दूसरे से संघर्ष और सहअस्तित्व भी रहा है। 20वीं सदी के अंतिम दशकों में नगा-कुकी, मैती - मैती पांगल और कुकी- पाइते के बीच दंगे हुए। 1993 में नगा- कुकी के बीच हुए दंगों के बाद दोनों में समझौता मैती समुदाय ने कराया ।
हाल में मणिपुर में मैती और कुकी के बीच सांप्रदायिक संघर्ष की शुरूआत 3 मई को तब हुई, जब आल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ने मैती लोगों को जनजाति का दर्जा देने की पहल के खिलाफ रैली निकाली। चूड़चंदपुर की रैली में जब कुछ बंदूकधारी शामिल हो गए तब हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा की एक वजह राज्य सरकार द्वारा पर्यावरण और वन रक्षा के लिए उठाए गए कदमों के साथ अफीम की खेती के विरूद्ध चलाया गया अभियान भी माना जा रहा है। इस अभियान से चूड़चंदपुर और काड़पोक्पी जिले में असंतोष उपजा ।
28 अप्रैल को चूड़चंदपुर में मुख्यमंत्री को एक जिम के उद्घाटन के लिए आना था । इसके एक दिन पहले कुकी समुदाय के एक संगठन ने बंद की घोषणा कर दी और जिम को नष्ट कर दिया। इससे तनाव फैला इसी तनाव के बीच हाई कोर्ट का यह आदेश आया कि सरकार मैती को जनजाति का दर्जा देने पर विचार करे। इससे माहौल और बिगड़ा। चूड़चंदपुर और मोरे में मैती लोगों पर हमले शुरू हो गए। उनके घर और मंदिर जलाए जाने लगे। हजारों मैती लोगों को भागना पड़ा। पुलिस हिंसक भीड़ को काबू नहीं कर पाई। मैती लोगों पर हमले की प्रतिक्रिया में इंफाल पूर्व-पश्चिम, विष्णुपुर, थौबाल आदि में चिन कुकी, मिजो, हमार लोगों के घर-दुकान लूटे-जलाए जाने लगे। बाद में मैती लोगों के गांवों पर पहाड़ों से गोलियां बरसाई जाने लगीं और पुलिस एवं सुरक्षा बलों पर भी हमले शुरू हो गए।
सवाल उठ रहे हैं कि सेना की मौजूदगी में भी हिंसा क्यों हो रही है? पुलिस और सुरक्षा बलों पर भी पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह की च दिवसीय मणिपुर यात्रा के बाद लोगों में आशा जगी कि अब हिंसा थम जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हिंसा के 39वें दिन राज्यपाल अनुसुइया उइके की अध्यक्षता में 51 सदस्यों की एक शांति समिति बनी। इसके सदस्यों में मतभेद के चलते इस समिति की एक बैठक तक नहीं हो पाई। हिंसा को लेकर राजनीति भी हो रही है। मणिपुर सरकार के 10 कुकी विधायक अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं । कुकी लोगों का दावा है कि मैती संपन्न हैं और सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या ज्यादा है, पर सच तो यह है कि कुकी लोगों की संख्या भी कम नहीं है।
मणिपुर में ड्रग्स का कारोबार खूब फैला है। यहां अफीम की बढ़ती खेती को देखते हुए लोगों को डर है कि कहीं मणिपुर ड्रग्स का गढ़ न बन जाए। एक डर म्यांमार से बड़ी संख्या में आ रहे कुकी लोगों को लेकर भी है। वे अफीम की खेती करते हैं। कुकी उग्रवादी संगठन म्यांमार से हेरोइन का व्यापार करने के लिए सीमावर्ती शहर मोरे पर कब्जा करने का प्रयास कर चुके हैं। म्यांमार का चिन नेशनल आर्मी उग्रवादी समूह भी मणिपुर के पहाड़ी जिलों और सीमांत इलाकों में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती करता है। इंफाल के एक कुकी इलाके में ड्रग्स बनाने वाली एक मोबाइल लैब मिल चुकी है। ड्रग्स के कारोबार में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली लोग भी संलिप्त हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जो बंदूकधारियों के सहारे चुनाव भी जीत जाते हैं। एक उग्रवादी समूह हथियारों के सहारे कुकी होमलैंड का सपना देख रहा है।
मणिपुर में तमाम लोग कुछ समय पहले अच्छी जिंदगी जी रहे थे, हिंसा के बाद अचानक सड़क पर आ गए हैं। कितनों ने अपनों को खोया है। हिंसा और तनाव के बीच म्यांमार से होने वाली घुसपैठ थमी नहीं है । कुकी समूहों के हथियारबंद तत्व अब भी बेकाबू हैं। मणिपुर की हिंसा देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। इसकी गंभीरता को समझने की जरूरत है। नहीं तो देर हो जाएगी। (लेखिका मणिपुर विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Editorial
Next Story
Related News
X
