Pratahkal-Karmaism is predominant in Jain philosophy
मुंबई । सोमवार को नंदनवन (Nandanvan) में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि जैन दर्शन में कर्मवाद को प्रधानता प्राप्त है। कर्मवाद का सिद्धांत व्यापक है। भगवती सूत्र में भी कर्म की बात बताई गई है। कर्म स्वचालित रूप से अपने कार्य को पूर्ण करते रहते हैं।
जिस प्रकार आदमी खाना खा लेता है तो शरीर के भीतर स्थित तंत्र स्वचालित रूप में उसका विपाक कर उससे रक्त, मज्जा, मांस, शक्ति, मल, मूत्र आदि अलग-अलग करता रहता है, उसी प्रकार जीव द्वारा किए गए किसी भी कार्य के बाद उसके फल को कब, कैसे और कहां देने की प्रक्रिया स्वतः होती रहती है। कर्मों का उदय, उसके अच्छे-बुरे फल अपने आप प्राप्त होता है। जीव को तो मात्र उन कर्मों को भोगना होता है।
भगवती सूत्र में आठ कर्म प्रवृत्तियां बताई गई हैं। इन में चार घाती कर्म और चार अघाती कर्म हैं। चार अघाती कर्म आत्मा को ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले नहीं होते हैं। चार घाती कर्म आत्मा का नुकसान पहुंचाने वाले और कर्मों का बंध कराने वाले होते हैं। अघाती कर्म भौतिकता से संदर्भित और घाती कर्म आत्मा से संदर्भित होते हैं। आदमी को कर्मवाद को जानकर चार घाती कर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए और अपनी आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने प्रवचन के बाद आचार्य कालूगणी के उदयपुर चातुर्मासिक प्रवेश के प्रसंगों का वर्णन किया। संचालन मुनि दिनेश कुमार ने किया।
Editorial

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