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चुनावी मोर्चाबंदी का अंतिम दौर
By EditorialPublished on
भारतीय संसद के मानसून सत्र के शुरूआती दो दिनों के संकेत साफ हैं। अगले आम चुनाव के लिए गोलबंदी की नींव पुख्ता हो चली है । एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और इंडिया ( भारतीय राष्ट्रीय विकासवादी समावेशी गठबंधन) के सदस्य इस बार अपेक्षाकृत एकजुट दिखे।

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शशि शेखर
भारतीय संसद के मानसून सत्र के शुरूआती दो दिनों के संकेत साफ हैं। अगले आम चुनाव के लिए गोलबंदी की नींव पुख्ता हो चली है । एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और इंडिया ( भारतीय राष्ट्रीय विकासवादी समावेशी गठबंधन) के सदस्य इस बार अपेक्षाकृत एकजुट दिखे। विपक्ष के विरोध के चलते संसद का शीतकालीन सत्र भी बाधित हुआ था, पर उस समय आपसी बिखराव साफ दिखता था। नई उपजी इस एकजुटता को क्या आने वाले चुनावी महीनों का दिशा संकेत मान लेना चाहिए?
ऐसा मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। गुजरे मंगलवार को परिष्कृत एनडीए और इंडिया की बैठकों से दोनों पक्षों का मन- मिजाज साफ हो गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन वाक्यों पर गौर फरमाइए, 'हुम बहुत मेहनत करेंगे। घर-घर जाएंगे और आप सबके साथ, सबके विश्वास के जरिये सन 2024 में 50 प्रतिशत से भी अधिक वोट पाएंगे।' उनके इस बयान से कुछ घंटे पहले बेंगलुरू में ममता बनर्जी ने कहा था, 'इंडिया जीतेगा, भाजपा हारेगा।' तय है, दोनों पक्ष अपने जोश को जगजाहिर कर रहे थे ।
जंग के लिए जोश जरूरी है।
यहां कुछ सवाल उठने लाजिमी हैं। क्या एनडीए बनाम इंडिया की लड़ाई किन्हीं मूल्यों के लिए लड़ी जा रही है? यह विचारधाराओं की टकराहट है अथवा सत्ता की? महाभारत से आज तक के सत्ता-संघर्ष पर नजर डाल देखिए। सारी जंगें सिद्धांतों के नाम पर लड़ी गई, मगर उन्हें जीतने के लिए हर नैतिक मूल्य की बलि चढ़ाई गई। बेंगलुरू और नई दिल्ली के जमावड़ों की तस्वीरें इस कड़वे सच की अगली कड़ी मात्र हैं। इन चित्रों में जो गलबहियां डाले दिख रहे थे, उनके मुस्कराते चेहरों के पीछे आपसी कटुता का लंबा सिलसिला छिपा है । राजनीति में मित्र शत्रु के और शत्रु मित्र के मुखौटे कब धारण कर लें, कोई नहीं जानता। यही वजह है कि जब बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो सुश्री मायावती ने आश्चर्य नहीं कि एनडीए या इंडिया से उन्ह बड़े-बड़े क्षेत्रीय दिग्गज जरूर हैं, पर उन्हें पत्रकार वार्ता का आयोजन किया, तो संवाददाता बिना लिफाफा देखे खत का मजमून समझ गए थे।
वे जानते थे कि मायावती अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करेंगी। पंजाब में अकालियों और हरियाणा में क्षेत्रीय पार्टियों कायम रखेंगी, लेकिन ये दोनों सूबे उनके के साथ वह इस बार भी चुनावी गठबंधन असली प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश से अलग हैं। उनके इस फैसले से उनका गृह प्रदेश खासा प्रभावित होने जा रहा है। हमेशा की तरह वह इस बार भी दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश करेंगी। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन को होगा। कोई आश्चर्य नहीं कि इन दलों के नेता उन पर आरोप लगाते हैं कि वह इस फॉर्मूले के जरिये किन्हीं 'खास कारणों' से भारतीय जनता पार्टी की मदद करती हैं, पर जो आरोपों से डिग जाए, वह मायावती कहां? आने वाले विधानसभा चुनावों में भी वह अकेले चुनाव लड़कर अपना रंग दिखाना चाहती हैं। क्या छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान अथवा तेलंगाना में इसका कोई असर पड़ेगा?
मायावती अकेली नहीं हैं। ओडिशा के बीजू पटनायक, आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी, तेलंगाना के के. चंद्रशेखर राव और कर्नाटक के जनता दल (सेक्युलर) के देवेगौड़ा पिता-पुत्र भी इस मामले में उनके हमकदम साबित होते आए हैं। कोई कोई बुलावा नहीं आया। हालांकि, आम चुनाव में उनकी भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता। सीधी लड़ाई की स्थिति में तीसरे दल या पक्ष की मौजूदगी नई दिल्ली के सत्ता - चयन को हर हाल में प्रभावित करेगी। ये लोग अपनी इस ताकत वोटबैंक को राष्ट्रीय दलों की ओर मुखातिब को पहचानते हैं और इसका प्रयोग अपने होने से रोकने में करते हैं। यही नहीं, अगर तो वे समर्थन के बदले अपनी पार्टी और दिल्ली का दरबार कभी कमजोर पड़ता है, प्रभाव क्षेत्र के लिए मनचाही मुराद पूरी करवाते हैं।
क्या इनसे कन्नी काटकर 'इंडिया' गलती कर रहा है ?
यकीनन नहीं। उत्तर प्रदेश का उदाहरण लें। मायावती यदि इंडिया में शामिल हो जाएं, तब भी उत्तर प्रदेश के विपक्षी नेताओं वोट पूरी तरह से स्थानांतरित हो पाएगा। धूसरित हो चुका है। यहां आप याद दिला 2019 के चुनाव में यह प्रयोग धूल- सकते हैं कि इससे चार साल पहले बिहार में राजद और जद यू का गठबंधन सफल रहा था। जान लें, राजनीति उलटबांसियों का खेल है। यहां कौन समीकरण कब सफल होगा, इसे समूची जिम्मेदारी से कोई नहीं कह सकता। यही वजह है कि दोनों गठबंधनों में हम कुछ-न-कुछ अंतरविरोध हर हाल में पाते हैं । सत्तारूढ़ एनडीए ने अपना कुनबा बढ़ाया जरूर है, पर महाराष्ट्र और बिहार जैसे बड़े राज्यों में तीन-तीन तलवारें वह कैसे रख पाएगा? भारतीय जनता पार्टी के इस्पाती संगठन में रह-रहकर दरारें दिखती आई हैं। पार्टी ने इसका विधानसभा चुनावों में खामियाजा उठाया है। क्या इन्हें समय रहते भरा जा सकेगा ? इंडिया में तो हर कदम पर ऐसी चुनौतियां हैं। बंगाल में कांग्रेस, वाम दल और तृणमूल; बिहार में जद-यू, राजद और कांग्रेस; उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और रालोद; महाराष्ट्र में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे) को टिकटों के बंटवारे में तयशुदा तौर पर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। एनडीए के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत शख्सियत, संसाधन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साथ है। इंडिया में को इस बात का भरोसा नहीं है कि उनका अभी अपना एक चेहरा अथवा संयोजक चुनना होगा। यही नहीं, मोदी अभी तक भारतीयता, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की जबरदस्त सियासी कॉकटेल रचते आए हैं। इंडिया को इसका 'काउंटर नैरेटिव' गढ़ना होगा। जो लोग यह सोच रहे हैं कि वर्ष 2004 में अटल-आडवाणी की जोड़ी के सामने कोई चेहरा नहीं, सिर्फ गठबंधन था, वे भूलें नहीं। मोदी-शाह की तुलना हो सकती है। अटल-आडवाणी से करना भूल साबित हो सकती है ।
यहां कुछ और बिंदुओं पर गौर करना जरूरी है। पटना, बेंगलुरू और मुंबई के स्थान- चयन के पीछे क्या कोई रणनीति है ? पटना में नीतीश कुमार, कर्नाटक में आए। क्या मुंबई में शरद पवार अथवा मल्लिकार्जुन खड़गे मुख्य भूमिका में नजर मुंबई, दोनों कांग्रेस के छाते से बाहर हैं। उद्धव ठाकरे ऐसा करते दिखेंगे? पटना और क्या इन बैठकों के जरिये छितराए हुए कोशिश है? यह कोशिश तभी कारगर होगी, भाजपा विरोधी मतों को संदेश देने की कोई जब कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के लिए पर्याप्त गुंजाइश छोड़े। क्या कांग्रेस सच्चे मन से अपने साथियों को समाहित करने के लिए कुछ पीछे हटने को तैयार है ? इंडिया के कर्णधार याद रखें। जितना समय बीतता जाएगा, एनडीए फासला बढ़ाता चला जाएगा। उन्हें जो करना है, जल्दी करना होगा। इस मामले में क्या मुंबई बैठक निर्णायक साबित होने जा रही है?

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