Pratahkal - Article Update - Parliament deprived of a necessary debate
संजय गुप्त
मणिपुर (Manipur) उच्च न्यायालय (High Court) की ओर से राज्य के मैती समुदाय को जनजाति का दर्जा देने पर विचार करने के आदेश के बाद कुकी और इस समुदाय के बीच शांति सद्भाव अचानक भंग हो गया और वहां मई के पहले सप्ताह में हिंसा भड़क उठी। यह हिंसा दो माह बाद भी पूरी तौर पर शांत नहीं हो सकी है। इस हिंसा के दौरान कुकी और मैती, दोनों ने एक-दूसरे पर हमले किए, उनके घर लूटे - जलाए और हत्याएं भी कीं। इस दौरान पुलिस (Police) के हथियार भी लूटे गए और उनका इस्तेमाल हिंसा फैलाने में किया गया। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर अत्याचार करने में पीछे नहीं रहे। इसके चलते हजारों लोगों को पलायन करना पड़ा।
जब स्थितियां कुछ नियंत्रित होती दिख रही थीं, तो एक ऐसा वीडियो सामने आया, जिसमें कुकी समुदाय की दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाया गया । इनमें से एक के साथ सामूहिक दुष्कर्म भी किया गया। यह घटना 4 मई की है, लेकिन उसका वीडियो चंद दिन पहले आया। इस घटना ने देश को शर्मसार करने के साथ झकझोर कर रख दिया। चूंकि यह वीडियो संसद सत्र शुरू होने के पहले आया इसलिए राजनीतिक हंगामा भी शुरू हो गया-संसद में भी और संसद के बाहर भी ।
मणिपुर की वीभत्स घटना की जितनी भर्त्सना की जाए, कम है। यह घटना दोनों समुदायों यानी मैती और कुकी के बीच की कटुता को तो बताती ही है, यह भी इंगित करती है कि घृणा के शिकार लोग किस हद तक गिर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ठीक ही कहा कि यह सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली घटना है और इससे पूरे देश की बेइज्जती हो रही है।
इस शर्मनाक घटना में आश्चर्य की बात यह है कि पुलिस ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में जरूरत से ज्यादा समय लगा दिया। दोषियों की गिरफ्तारी करीब दो माह बाद तब की गई, जब घटना का वीडियो सामने आया और उसे लेकर हड़कंप मचा। किसी के लिए भी समझना कठिन है कि घटना की एफआईआर मई में ही हो जाने के बाद भी पुलिस को कार्रवाई करने में इतना समय क्यों लग गया ? मणिपुर के मुख्यमंत्री, जो राज्य के गृहमंत्री भी हैं, के बयान से यही लगता है कि वह भी इस घटना से समय रहते अवगत नहीं हो सके। यह ठीक है कि मणिपुर में इंटरनेट बंद होने से सूचनाएं देरी से बाहर आ रही थीं, लेकिन जब पुलिस घटना से अवगत थी, तब उसने इतने संगीन मामले को गंभीरता से क्यों नहीं लिया? प्रश्न यह भी है कि आखिर खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं?
4 मई की घटना मणिपुर के माहौल को फिर से खराब कर सकती है, क्योंकि वह बेहद शर्मनाक और विचलित करने वाली है। आज के जमाने में दो समुदायों में इतना वैमनस्य होना चकित करता है। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि मैती- कुकी के बीच अविश्वास की खाई पाटने और उनकी आपसी घृणा को दूर करने के लिए जैसा राजनीतिक हस्तक्षेप होना चाहिए, वैसा नहीं किया गया। यह ध्यान रहे कि मणिपुर में पिछले दो माह के दौरान अन्य अनेक महिलाओं के साथ भी दुष्कर्म हुआ है। यौन हिंसा की घटनाओं के साथ लूटपाट, आगजनी और हत्याएं भी हुई हैं। इसके अलावा बड़े पैमाने पर हथियार भी लूटे गए हैं। चूंकि मणिपुर की हिंसा को वहां का प्रशासन नियंत्रित करने में नाकाम रहा, अतः केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए गए। उन्हें भी स्थिति को नियंत्रित करने में कठिनाई हुई। इस दौरान देश के राजनीतिक दलों को मणिपुर की वस्तुस्थिति से अवगत कराने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री की ओर से एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, लेकिन उसमें आरोप- प्रत्यारोप ही अधिक हुए। विपक्षी दलों ने यह शिकायत की कि इस बैठक में प्रधानमंत्री क्यों नहीं हैं? यह शिकायत यह जानते हुए भी की गई कि वह उस समय अमेरिका के दौरे पर थे।
मणिपुर की शर्मनाक घटना का वीडियो सामने आने से विपक्ष सरकार के प्रति हमलावर है । वह संसद नहीं चलने दे रहा है। पक्ष-विपक्ष के बीच इस पर मतभेद है कि मणिपुर पर चर्चा किस नियम के तहत हो। आखिर चर्चा आवश्यक है या फिर यह कि वह किस नियम के तहत हो? मणिपुर पर संसद में चर्चा होनी ही चाहिए। विपक्ष को सरकार को कठघरे में खड़ा करने का पूरा अधिकार है। वह ऐसा तभी कर सकता है, जब संसद में चर्चा होने दे।
इस समय जैसा राजनीतिक माहौल है, उसे देखते हुए इसके आसार कम ही हैं कि मणिपुर को लेकर संसद में चर्चा हो जाने मात्र से वहां के हालात सुधर जाएंगे। जब सरकार चर्चा के लिए तैयार है तो फिर विपक्ष को भी इसके लिए आगे आना चाहिए। विपक्ष के रवैये से ऐसा लगता है कि चर्चा का उद्देश्य मणिपुर के हालात पर चिंता जताना कम, राजनीतिक लाभ उठाना अधिक है। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि संवेदनशील मामलों में भी पक्ष - विपक्ष राजनीतिक लाभ उठाने के फेर में ही अधिक रहता है। दोनों की कोशिश एक- दूसरे को घेरने में रहती है, न कि सार्थक चर्चा करने में । निःसंदेह यह नहीं कहा जा सकता कि संसद में सार्थक चर्चा करने के बजाय हंगामा करने से किसी राजनीति दल को कोई विशेष लाभ मिलता है। इसके बाद भी संसद में एक-दूसरे पर राजनीतिक हमले की कोशिश रहती है। यदि संसद लोकतंत्र का मंदिर है तो फिर वहां जनता की भलाई वाले कामों को लेकर चर्चा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी तरह विकास के कामों को आगे बढ़ाने तथा समाजिक सद्भाव को बल देना भी एक साझा उद्देश्य होना चाहिए । जब संसद में सार्थक चर्चा होगी, तभी जनता को कोई सही दिशा मिलेगी और संसद की महत्ता बढ़ेगी। महज एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाली राजनीति से राष्ट्र निर्माण की ओर नहीं बढ़ा जा सकता । लगता है राजनीतिक दल यह समझने को तैयार नहीं कि संसद में गंभीर चर्चा लगातार कम होती जा रही है और इसके कारण उसकी महत्ता और गरिमा प्रभावित हो रही है। जब भी संसद का सत्र आयोजित होता है, सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे से उलझते ही दिखते हैं। विपक्ष कई बार चर्चा की मांग भी करता है और सदन भी नहीं चलने देता। संसद न चलने से केवल लोकतंत्र ही कमजोर नहीं होता, बल्कि देश की प्रगति भी रूकती है, क्योंकि कई आवश्यक विधेयक समय रहते पारित नहीं हो पाते।

Editorial

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