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सीयेटल 03 : जब एयर कण्डीशनर खरीदने के लिये लाइनें लग गई।
By EditorialPublished on
घर की दीवार में कभी कोई लीकेज वगैरह की तोड़फोड़ की तो सिर्फ उस हिस्से का 4' x 8' पाटिया बदल दीवार लोक कर दी जाती है वापस प्लास्टर कर पेन्ट कर दिया जाता है। पूरी दीवार गिराने की जरूरत न क्यूंकि सदी ज्यादा पड़ती है इसलिये फर्श पर भी बजाय कारपेट को ही तरजीह दी जाती है।
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घर की दीवार में कभी कोई लीकेज वगैरह की तोड़फोड़ की तो सिर्फ उस हिस्से का 4' x 8' पाटिया बदल दीवार लोक कर दी जाती है वापस प्लास्टर कर पेन्ट कर दिया जाता है। पूरी दीवार गिराने की जरूरत न क्यूंकि सदी ज्यादा पड़ती है इसलिये फर्श पर भी बजाय कारपेट को ही तरजीह दी जाती है।
सीमेंटल अमेरिका के एकदम उत्तर में कनाडा की सीमा से लगा हुआ इसलिये यहां सदी बहुत पड़ती है और भारी बर्फबारी होती है। चारो तरफ इतनी है कि गर्मी का तो नामो निशां ही नजर नहीं आता। यही कारण है कि घरों के अन्दर ए.सी. होते ही नहीं, कभी गर्मी का एहसास होतोय लेने या पंखे चलाने से भी काम चल जाता है।
एक बार मौसम विभाग की भविष्यवाणी हुई कि ग्लोबल वार्मिंग के सीवेटल का तापमान बढ़ कर 90 डिग्री फेरनहीट होने की संभावना है। 90 हि हमारे यहां के 32-33 डिग्री सेल्सीयस के बराबर होता है। हम लोग जो 44-45 डिग्री तक में सामान्य जीवन यापन करते हैं उनके लिये 32-33 डिग्री तो मौसम है मगर इस भविष्यवाणी से सियेटल में अफरा तफरी मच गई। लोग ए कण्डीशनर खरीदने के लिये बेताब हो गये मगर दुकानों पर ये बहुत सीमित मात्रा में थे। इन्हें खरीदने के लिये कतारें लग गई, लोग एडवान्स बुकिंग कराने लग गये और वेटिंग लिस्टें जारी हो गई।
ओफिसों में तो ए.सी. लगे होते हैं मगर घरों में ए.सी. लगाने के लिये उन्हें फिक्स करने की जहमत अलग उठानी पड़ती है इसलिये हर कोई पोर्टेबल ए.सी. खरीदना चाहता था जिसे फिक्स करने की जरूरत नहीं, पंखे जैसा होता है जिसमें एक पाईप के जरिये पानी निकाल देते हैं। उस साल वाकई थोड़ी गर्मी पड़ी, ये ए.सी. काम आये और फिर बेकार हो गये। हालांकि पहले की अपेक्षा अब तापमान बढ़ने लगा है, इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग ही है या अन्य कोई कारण है, पता नहीं चल पाया है।
अगले दिन 13 अग. 16 को हम सुबह जल्दी ही सीयेटल दर्शन को निकल पड़े। इस शहर की खासियत यह है कि इसका समूचा घना बसा इलाका समुद्र किनारे है। अन्य शहरों के घने बसे इलाके वक्त के साथ पुराने पड़ जाते हैं और उनका आकर्षण कम हो जाता है मगर यह बात सीएटल पर लागू नहीं होती थी क्यूकि समुद्री किनारे की वजह से इसका आकर्षण बना हुआ था और यह पर्यटन के अतिरिक्त भी सभी प्रकार की अन्य गतिविधियों से अत्यन्त स्पंदित था।
जिस तरह माउन्ट रेनियर सीयेटल की पहचान बना हुआ है, शहर के किसी श्री में जाओ, हर तरफ से माउन्ट समेयर की हिमाच्छादित चोटियां और ज्वालामुख कटोरा नजर आता है उसी तरह हर तरफ से स्पेस नीडल टावर भी नजर आता है। यह भी शहर की पहचान बना हुआ है। यह वैसा ही टावर है जो और कनाडा के टोरन्टो में देखा था। पर्यटकों को आकर्षित करने का यह तरीका सा बन गया है, कई शहरों में एसे टावर बन गये हैं जिन पर चढ कर पर्यटक दृश्य का रसास्वादन कर सकते हैं। हमारे यहां पर्यटन स्थलों की कमी नहीं मगर इस तरह के कृत्रिम पर्यटन आकर्षण निर्मित कर पर्यटकों को आकर्षित करने की सोच हममें विकसित नहीं हुई है।
स्पेस नीडल पर चढने का अच्छा खासा टिकिट है। उपर एक रिवोल्विंग रेस्टोरेन्ट, एक ओब्जर्वेशन डेक व गिफ्ट शोप है। ये तमाम चीजें हर पर्यटन स्थल पर आवश्यक रूप से होती ही हैं जिनसे पर्यटकों की रूची बनी रहती है जबकि हमारे यहां इन आवश्यकताओं को दूर रखने की प्रवृति ही देखी जाती है। जो लोग रेस्टोरेन्ट में खाना खाने की बुकिंग करवाते हैं उन्हें उपर जाने का पैसा नहीं देना पड़ता। यही बात अन्य टावर्स में भी देखी गई थी।
स्पेस नीडल डाउन टाउन इलाके में ही समुद्र किनारे अवस्थित है। इसके आसपास पर्यटन आकर्षण के अन्य केन्द्र भी विकसित हो गये हैं इसलिये यहां हर वक्त मेले सा माहौल नजर आता है। जगह जगह पर लोग करतब दिखाते नजर आते हैं तो कहीं कुछ लोग वाद्य यन्त्रों पर गाना गा रहे होते हैं और सामने कपड़ा बिछा देते हैं जिस पर आने जाने वाले लोग पैसे डालते रहते हैं। यह भीख मांगने का आधुनिक तरीका है या अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर पैसा कमाने का जरिया, इसमें विवाद हो सकता है मगर अमेरिका में कई सार्वजनिक स्थलों पर एसे दृश्य अक्सर दिखाई दे जाते हैं।
पार्किंग की यहां भारी समस्या नजर आई। मयंक हम सबको उतार कर कहीं दूर गाड़ी पार्क करने गया, तब तक हम स्पेस नीडल के गार्डन में ही घूमते रहे। इसे सीटल सेन्टर के नाम से जाना जाता है। यहीं एक स्थान पर प्रसिद्ध फिल्म व टी.वी. श्रृंखला स्टार वार्स का एक पात्र है जो कि रोबोट है, खड़ा था, अमेरिका में यह बहुत लोकप्रिय है, खासकर के बच्चों में यहां बच्चे उस रोबोट से हाथ मिला रहे थे और फोटू खिंचा रहे थे, मगर इसका भी 5 डोलर का शुल्क था।
हम दूर खड़े खड़े यह नजारा देख रहे थे, पास ही स्पेस नीडल में चढ़ने वाल की लाइन लगी थी, तभी मेरी निगाह पार्श्व में नजर आ रहे एक पेड़ की मुझे यह पेड़ अजीब सा लगा। पेड़ बहुत सुन्दर नजर आ रहा था, उसके आस पास के पेड़ भी ऐसे ही सुन्दर और अद्भुत दिख रहे थे। मुझे पेड़ों की तरफ दे मुनीश ने मुस्कुरा कर कहा कि ये पेड़ कांच के बने हुए है, असली नहीं है। रह गया, कांच की कोई कलाकृति एसी बारीकी से और इतना सुन्दर भी बनाई सकती है ? गौर से देखा तो वाकई लगा कि ये कांच के ही हैं।
दरअसल यहाँ एक म्यूजियम भी है जो ग्लास गार्डन के नाम से ही मशर अन्दर विभिन्न प्रकार के वृक्ष आर फूलों के पौधे अत्याकर्षक रूप से काम से बना हुए हैं। ये कांच के पेड़ एक तरह से उस म्यूजियम का ही विज्ञापन कर रहे थे जो प्रवेश शुल्क देकर ही देखा जा सकता था।
सेन्टर में एम्यूजमेन्ट पार्क, फूड कोर्ट, गिफ्ट शोप वगैराह प्रचुरता से थे। से एक मोनो रेल भी चलती है जो समुद्र किनारे स्थित हाट बाजार की तरफ जाती है। हालांकि सभी पास पास ही हैं फिर भी पर्यटक इस मोनो रेल में बैठने का आनन्द उठाने से नहीं चूकते।
हम लोग चलते चलते इस मोनो रेल स्टेशन पर आ गये। यहीं मयंक भी हमें मिल गया। गाड़ी पार्क करने बहुत दूर जाना पड़ा था। मोनो रेल एलीवेटेड लाईन है। जो शहर के डाउन टाउन इलाके के मध्य चलती है। यह विशुद्ध रूप से पर्यटकों के आकर्षण के लिये ही अत्यन्त छोटे से इलाके में चलाई जाती है। इसके सिर्फ दो स्टेशन हैं व लम्बाई भी डेढ कि.मी. ही है।
मोनो रेल में बैठने के लिये पर्यटकों की भीड़ उमड़ती है। हमें भी टिकिट लेने के बाद काफी देर तक खड़ा रहना पड़ा। प्लेटफार्म के अन्दर उतने ही लोगों को प्रवेश दिया जाता है जितने रेल में बैठ सकते हैं। हर पांच मिनट में रेल चलती है। इसलिये ज्यादा इन्तजार भी नहीं करना पड़ता। प्लेटफार्म पर ही खाने पीने की चीजों के स्टाल है। लोग यहां से सामान खरीदकर रेल में बैठकर खाते रहते हैं, कोई मना नहीं करता। रेल में ही कचरा पात्र पड़े रहते हैं जिसमें लोग अपना कचरा डाल देते हैं। कोई नहीं डाले और इधर उधर फेंक दे तो उस कचरे को उठाने वाला भी कोई नहीं होता।

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