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इहलोक, परलोक और उभयलोक प्रत्यनित से बचने का करें प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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शुक्रवार को नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में तीर्थंकर समवसरण से पुनः आचार्य महाश्रमण (Acharyashree Mahashraman) की वाणी गुंजायमान हुई। उन्होंने श्रद्धालुओं को भगवती सूत्र के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान के साथ आचार्य तुलसी द्वारा रचित अष्टमाचार्य की जीवन गाथा का व्याख्यान भी किया। 21 रंगी तपस्या के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने अपनी तपस्याओं का सामूहिक प्रत्याख्यान किया।

मुंबई । शुक्रवार को नन्दनवन (Nandanvan) परिसर में तीर्थंकर समवसरण से पुनः आचार्य महाश्रमण (Acharyashree Mahashraman) की वाणी गुंजायमान हुई। उन्होंने श्रद्धालुओं को भगवती सूत्र के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान के साथ आचार्य तुलसी द्वारा रचित अष्टमाचार्य की जीवन गाथा का व्याख्यान भी किया। 21 रंगी तपस्या के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने अपनी तपस्याओं का सामूहिक प्रत्याख्यान किया।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जैन आगमों में चार गतियां बताई गई हैं- नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव। पांचवी गति सिद्ध को माना जा सकता है। कितने जीव तो तिर्यंच गति से बाहर ही नहीं निकल पाए। भगवती सूत्र में तीन प्रकार के प्रत्यनित बताए गए हैं। इहलोक प्रत्यनित, परलोक प्रत्यनित और उभयलोक प्रत्यनित। इहलोक प्रत्यनित वह होता है जो अनजाने रूप में तप कर इन्द्रियों को प्रताड़ित करता है। दूसरा परलोक प्रत्यनित होता है। धर्म, ध्यान, साधना, तप आदि नहीं करता, भोगात्मक, विषयात्मक, इन्द्रिय भोग में बसने वाला परलोक प्रत्यनित होता है। अर्थात् वह अपने आगे की गति को बिगाड़ने वाला होता है। तीसरा उभयलोक प्रत्यनित होते हैं। वैसे मनुष्य जो चोरी से धनार्जन करते हैं, लूटकर धन अर्जित करते हैं, किसी का धन, वस्तु आदि हड़प लेने वाला यह जीवन भी दुःखमय बन जाता है और परलोक भी बिगड़ सकता है। ऐसे लोग उभयलोक प्रत्यनित होते हैं। आदमी को इन तीनों प्रकारों के प्रत्यनित होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में अशुद्ध पैसे से दूरी हो, ईमानदारी रहे। जीवन के अंतिम दिनों में व्यापार आदि कार्यों से मुक्त होकर धर्म, ध्यान, साधना में समय लगाकर अपने परलोक को भी संवारने का प्रयास करना चाहिए। कार्यक्रम में साध्वीवर्या ने उपस्थित जनता को उद्बोधित किया। संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।

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