✕
Home>
सीयेटल 02 : प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है सीयेटल शहर
By EditorialPublished on
प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण कोई शहर में देखता नहीं कि जल भुन कर खाक हो जाता हूँ। कोई शहर समन्दर किनारे हो, बड़ी-बड़ी झीलें हो, नदी-नाले झरने-बर्फीले पहाड़, घाटियां दरें, उतार चढाव भरी सड़के हो, उस शहर से मैं तो क्या कोई भी उदयपुर प्रेमी रश्क कर उठेगा। सीएटल एसा ही शहर है।
_202307252020306803.jpg)
x
_202307252020306803.jpg)
प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण कोई शहर में देखता नहीं कि जल भुन कर खाक हो जाता हूँ। कोई शहर समन्दर किनारे हो, बड़ी-बड़ी झीलें हो, नदी-नाले झरने-बर्फीले पहाड़, घाटियां दरें, उतार चढाव भरी सड़के हो, उस शहर से मैं तो क्या कोई भी उदयपुर प्रेमी रश्क कर उठेगा। सीएटल एसा ही शहर है।
सीएटल के समुद्री तट के आस पास ढेर सारे छोटे छोटे द्वीप हैं जहां बस्तियां बसी हुई हैं, यहां आने जाने के लिये निरन्तर नावें चलती हैं। प्राकृतिक वातावरण व सुन्दरता के कारण ये द्वीप बहुत महंगे हो गए हैं। समुद्र से लगती हुई कुछ झाले भी है जिनके आसपास भी कुछ द्वीप हैं, इन द्वीपों पर रहना तो और भी महंगा होने लगा है। समुद्र के कटे फटे तट के कारण कई खाड़ियां भी स्वाभाविक रूप से उभर आई हूँ जो शहर की सुन्दरता में अभिवृद्धि कर देती है। यही वजह है कि पूरा शहर हरियाली से आच्छादित है।
सीएटल माइक्रोसोफ्ट, अमेजन, बोइंग, कोस्टको तथा स्टारबक्स जैसी विश्व प्रसिद्ध कम्पनियों का संस्थापक शहर है। बिल गेट्स यहीं रहते हैं। यही कारण है कि सिलिकोन वैली की प्रारम्भिक सफलता के पश्चात सीयेटल दुनिया भर के आईटिशियनों का घर बन गया है। इस दृष्टि से सियेटल को युवाओं का शहर कह दिया जाये तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं क्यूंकि इन आधुनिक कम्पनियों में काम करने वाले तमाम लोग युवा हैं। सियेटल में जिधर देखो उधर युवा ही युवा नजर आते हैं। यहां रेस्टोरेन्ट, बार, क्लबों आदि की भरमार हो गई है। हमारे यहां जिस तरह की प्रतिष्ठा बेंगलूरू ने अर्जित की है वही प्रतिष्ठा सीयेटल की है।
मयंक हमें लेने एयरपोर्ट पर आ गया था। वह अमेजन कं. में ही काम करता है। कुछ समय पूर्व ही उसने खुद का घर खरीद लिया था जो शहर से थोड़ी दूर था। आई.टी. कम्पनियों के कारण जिस गति से सीएटल का विस्तार हो रहा है उसी के अनुपात में नई नई बस्तियां भी बसती जा रही है। ये बस्तियां शहर से दूर होती हैं जिस कारण यहां घर अपेक्षाकृत कम दामों में मिल जाते है। यहां हमारी तरह प्लोट खरीद कर खुद का मकान बनाना संभव नहीं होता। यह काम बिल्डर ही करते हैं।
सबसे पहले डवलपर कोई जमीन खरीदते हैं और वहां प्लोट काटते हैं। यह जमीन स्थानीय प्रशासन की योजनाओं में बस्ती बसाने के लिये चिन्हित होना अनिवार्य है। प्लोट काटने के बाद डवलपर वहा अन्डर ग्राउण्ड पाईप डालता है. सीवेज, पानी, बिजली वगैराह की लाईनें बिछाने के बाद सड़कें बनाई जाती है। यह काम पूरा हो जाता है तब बिल्डर आता है। या तो डेवलपर बिल्डर को जमीन बेच देता है या फिर दोनों ही मिलकर कोलोनी बनाते हैं।
बिल्डर अब तीन तरह के ले आउट तैयार करता है। ये तीन तरह के घरों के होते हैं, छोटे-मध्यम और बड़े। इन तीनों तरह के एक एक मकान का निर्माण करवा कर इन्हें पूर्णतया फर्निश कर मोडल हाउस तैयार किये जाते हैं। ये मोडल हाउस ग्राहकों को बता कर बेचे जाते हैं। जिस मकान का सौदा हो जाता है उस मकान का निर्माण शुरू हो जाता है। 3 महीने में निर्माण वगैराह पूरा हो ग्राहक को कब्जा भी मिल जाता है।
जगह यहां काफी है इसलिये लोग अपना अलग से घर लेना ही पसन्द करते हैं, भले ही इसके लिये उन्हें दूर दूर क्यूं नहीं जाना पड़े। हमारे यहां का फ्लेट जैसा सिस्टम यहां भी है मगर यह घने बसे डाउन टाउन इलाके में होता है। यहां फ्लेट को एपार्टमेन्ट कहते हैं। डाउन टाउन में होने के कारण ये बहुत मंहगे पड़ते हैं इसलिए लोग दूर जाकर अपना स्वतन्त्र घर ही लेना पसन्द करते हैं।
सीएटल की उतार-चढ़ाव भरी सड़कों से गुजरते हुए कभी किसी झील से कभी समन्दर किनारे का दर्शन करते हुए हम घने जंगल से गुजरे। सड़क के दोनों तरफ वृक्षों की श्रृंखला और उनके पार्श्व में झांकती हुई अलग अलग कोलोनियों की तिकोनी छतें आनन्द की अनुभूति करवा रही थी। मयंक की कोलोनी अभी निर्माणाधीन ही थी। कई प्लोट खाली थे तो कई खाली प्लोटों पर सोल्ड आउट के बोर्ड लगे थे। ये प्लोट बिक चुके थे और इन पर शीघ्र ही निर्माण शुरू होने वाला था। कई प्लोटों पर घरों का निर्माण जारी था। लकड़ी के ढांचे खड़े थे, ऐसा लग रहा था जैसे खोखों के पाटिये ठोक कर कोई अस्थाई ढांचा खड़ा किया गया हो। मगर एसा नहीं था, यहां मकान इसी तरह बनाये जाते हैं। बिल्डर जब डेवलपर से प्लोट खरीदकर वहां बनने वाले मकान का सौदा कर लेता है तब वहां काम शुरू किया जाता है। जब तक डेवलपर बिजली, पानी, सड़क, सीवर आदि की प्रारंभिक आवश्यकताएं पूरी कर प्रशासन से एन.ओ.सी. नहीं ले लेता तब तक बिल्डर उस पर काम शुरू नहीं कर सकता। यह हमारे यहां से सर्वथा भिन्न है। हमारे यहां प्रशासन व जन प्रतिनिधियों की अकर्मण्यता से जनता की आवश्यकतानुसार योजनाएं नहीं बनाई जातीं जिस कारण लोग अपनी आवश्यकता पूर्ण करने के लिये कृषि भूमि पर प्लोट काट कर अवैध रूप से निर्माण करने को मजबूर हो जाते हैं। एसी अवैध कोलोनियां बन जाती है तब प्रशासन को होश आता है और इन्हें कर बिजली, पानी, आदि की व्यवस्था की जाती है। बिना किसी योजना के बनने वाली एसी कोलोनियां बेतरतीब ही होती है, न तो कोई सेट बेक, न पर्याप्त की सड़क न सार्वजनिक सुविधाओं का कोई प्रावधान। यही बात सायिक गतिविधियों को लेकर भी है।
शहर बढ़ते हैं तो व्यावसायिक आवश्यकताएं भी बढती हैं। प्रशासन का होता है कि दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बाजारों की योजनाएं बनाएं मगर उन्हें इसकी फुरसत ही नहीं होती। आवश्यकता आविष्कार की जननी है की अवधारणा सच करते हुए लोग आवासीय भवनों में ही व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर देते हैं और फिर किसी दिन प्रशासन की गाज गिरती है। यदि प्रशासन के लोग शहर के विकास की कल्पना कर समुचित योजनाएं बनाएं तो शहर का सुनियोजित विकास हो सकता है।
बिल्डर प्लोट पर कंकरीट का फाउन्डेशन कर लकड़ी का मकान बनाता है। यहां सभी मकान लकड़ी के ही बनते हैं। लकड़ी का ढांचा खड़ा कर उसे स्क्रू से कस दिया जाता है। अब इनमें रेडिमेड दीवारें ला कर फिट कर दी जाती हैं। इन्हें वाल बोर्ड कहते हैं। ये आधा इन्च मोटे चूने व मिट्टी के बने 4 फुट चौड़े 8 फुट के पाटिये होते हैं जिन्हें लकड़ी के ढांचे के बीच कस दिया जाता है। एक पाटिये को दूसरे पाटिये से टेप द्वारा चिपका दिया जाता है। इस दीवार के उपर प्लास्टर कर शानदार फिनिश दे दी जाती है। इसके बाद उस पर मनचाहा रंग कर दिया जाता है।
छत भी लकड़ी की ही डाली जाती है जिसके फर्श पर प्लास्टर कर या तो टाइलें लगा दी जाती हैं या कारपेट बिछा दी जाती है। ये मकान दो तीन मंजिल के होते हैं और अमूमन 3 से 6 कमरों तक के होते हैं। चूंकि सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है इस कारण सभी मकानों की छतें तिकोनी होती हैं। छतों पर शिंगल लगाये जाते है, ये शीट मेटेरियल होता है। छतों से पानी नहीं चू पाये इस कारण इन पर डामर तथा प्लास्टिक का मिश्रण भी लगाया जाता है।

Editorial
Next Story
Related News
X
