Pratahkal - Lekh Update - Both the grand alliances are united in formation
राहुल वर्मा
भारतीय राजनीति (Indian Politics) लिए मंगलवार का दिन काफी गहमागहमी वाला रहा। इस दिन दो महत्वपूर्ण बैठकें हुईं। एक दिल्ली (Delhi) में, तो दूसरी राष्ट्रीय राजधानी (Capital) से काफी दूर बेंगलुरू (Bangalore) में। दिल्ली बैठक में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने एकजुटता दिखाई, जबकि बेंगलुरू में कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियों ने विचार- विमर्श किया। दोनों बैठकें आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर बुलाई गई थीं, इसलिए कह सकते हैं कि साल 2024 के चुनाव का अब बाकायदा आगाज हो चुका है। अब यह भी स्पष्ट है कि आगामी चुनावी समर इन्हीं दोनों महा - गठबंधनों के बीच होगा, तीसरे मोर्चे की कोई खास गुंजाइश नहीं बची है।
दावा किया गया है कि भाजपा (BJP) के नेतृत्व में बुलाई गई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (National Democratic Alliance) की बैठक में 38 पार्टियां शामिल हुईं और उनमें कई मुद्दों पर सहमति भी है। मसलन, यह बिल्कुल साफ है कि राजग में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा, जिसमें केंद्र सरकार के काम-काज का लेखा- जोखा पेश किया जाएगा। चूंकि राजग के चुनाव अभियान में भाजपा केंद्र में रहेगी, इसलिए गठबंधन का वैचारिक नजरिया भी स्पष्ट है। उधर, विपक्षी दल पटना होकर बेंगलुरू पहुंचे थे और कई मुद्दों पर वे आगे बढ़ते हुए भी दिखे, मगर कुछ विषयों पर वे अब भी अंतर्विरोधों से जूझ रहे हैं। उन्होंने एक सधी शुरूआत जरूर की है, और अगर उनकी बैठकों का सिलसिला जारी रहा (अब अगली बैठक महाराष्ट्र में होगी), तो गठबंधन का स्वरूप भी धीरे- धीरे स्पष्ट हो जाएगा, लेकिन अभी यह राह कुछ लंबी है। बेशक, 26 विरोधी दलों ने बेंगलुरू बैठक में कई मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की है, जिनमें गठबंधन का नाम, उसका ढांचा, साझा कार्यक्रम आदि प्रमुख थे। गठबंधन का नाम 'इंडिया' रखा गया है, जो अंग्रेजी के शब्द 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस' से बना है। बैठक के बाद साझा प्रेस वार्ता में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने न सिर्फ इस नाम की घोषणा की, बल्कि यह भी बताया कि दिल्ली में एक सचिवालय की स्थापना की जाएगी, जिसके पास चुनावी रणनीति की कमान होगी। बैठक में चुनाव में उठाए जाने वाले मुद्दों को लेकर भी एकजुटता दिखाने की पूरी कोशिश की गई। मगर दो गुत्थियां अब भी सुलझ नहीं सकी हैं। एक, यह गठबंधन क्या किसी एक चेहरे पर चुनाव लड़ेगा? अगर इसका जवाब हां है, तो वह चेहरा कौन होगा? और दूसरी उलझन सीटों के बंटवारे को लेकर है। हालांकि, माना यही जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के नजदीक आने के साथ ही ये उलझनें भी दूर हो जाएंगी।
हो सकता है कि अगले साल जनवरी आसपास यह साफ हो जाए कि कौन दल कितनी सीटों पर और कहां-कहां मैदान में होगा? यह तो साफ है कि 'एक दल, एक उम्मीदवार' की वकालत बार- बार विरोधी दलों द्वारा की जा रही है। वैसे, बेंगलुरू बैठक कई मामलों में विपक्षी दलों के लिए नई खुराक लेकर आई है। यह बैठक संकेत है कि विपक्षी पार्टियों का एक- दूसरे के प्रति जो संशय या मतभेद रहा है, उसके बादल अब छंट रहे हैं। पटना बैठक में ही आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच तनातनी की खबर आई थी। आप नेताओं ने दिल्ली पर केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश को लेकर कांग्रेस को अपना रूख स्पष्ट करने को कहा था। अब कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के बयान के बाद दोनों दलों के बीच कटुता कम होती नजर आई है। ऐसा किया जाना जरूरी भी था, क्योंकि जब तक इन दलों में मनमुटाव या एक-दूसरे के प्रति संदेह बना रहेगा, तब तक वे मजबूत गठबंधन नहीं बन सकते, और तब तक ऐसी किसी महाजुटान का कोई मतलब भी नहीं रह जाएगा।
चुनाव सुधार और ईवीएम को लेकर भी विरोधी दल संजीदा दिख रहे हैं। खबर है कि वे अपनी शंकाओं के साथ चुनाव आयोग के पास जा सकते हैं। देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर कथित तौर पर हो रहे हमले के खिलाफ भी उन्होंने सख्त रूख अपनाया है। मगर जनता इन मुद्दों पर कितना साथ देगी, इस पर अभी भी सवालिया निशान है। बहरहाल, इन दोनों बैठकों से यह भी साफ हो गया है कि कुछ ऐसी पार्टियां हैं, जो न तो भाजपा या उसके सहयोगियों के पाले में जाने को इच्छुक लग रही हैं, और न कांग्रेस या विरोधी खेमे में। इनमें प्रमुख हैं- ओडिशा की बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति आदि। ये तमाम पार्टियां अपने अपने राज्यों में सरकार चला रही हैं, और अभी किसी गठबंधन का हिस्सा बनने की उत्सुकता नहीं दिखा रही हैं। उधर, दिल्ली बैठक से न केवल हमें राजग गठबंधन के स्वरूप का अंदाजा हो रहा है, बल्कि यह भी स्पष्ट गया कि किन मुद्दों के साथ वह विरोधियों पर हमलावर होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी झलक मंगलवार दोपहर में पोर्ट ब्लेयर के अपने भाषण में भी दी। उन्होंने अपने शब्दों से विपक्षी दलों के गठबंधन पर खूब तंज कसा और उसे ऐसे लोगों का समूह बताया, जो भ्रष्टाचार में लि हैं और सिर्फ व सिर्फ अपने परिवार व परिजनों को ही आगे बढ़ाने की सोचते हैं। भाजपा अब इसी 'लाइन ऑफ अटैक' के साथ आम चुनाव में विपक्ष पर हावी होने का प्रयास करेगी। देखना होगा कि विरोधी दल इसकी काट किस तरह निकाल पाते हैं।
जाहिर है, राजग को अधिक पार्टियों का साथ हासिल है, उसके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व है, गठबंधन की धुरी को लेकर स्पष्टता है और यह भी साफ है कि वह किन मुद्दों पर चुनाव लड़ेगा। इसके बरअक्स, विपक्ष कई तरह के द्वंद्वों से लड़ रहा है, और कुछ ऐसे सवाल अब भी कायम हैं, जिनके जवाब के लिए उसको आने वाले समय में अधिक मेहनत करनी होगी। हां, इस बार एकजुटता को लेकर विपक्ष काफी संजीदा दिखा है, इसलिए उसके इस प्रयोग को अभी तरह से नकारा जाना उचित नहीं होगा । 'इंडिया बनाम एनडीए' की यह जंग क्या नतीजा देगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल राजग मजबूत जान पड़ रहा है, और विरोधी दलों के लिए भाजपा की रणनीति, खासतौर से मोदी के करिश्मे की काट निकालना ऊंचे पहाड़ को नापने जैसा हो सकता है।

Editorial

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