Pratahkal - Suresh Goyal
अमेरिकी हिन्दुओं को क्रिसमस का त्यौहार मनाने के लिये कोई बाध्य नहीं करता। जिस तरह हमारे यहां उपासना की स्वतन्त्रता है वैसी ही वहां भी है, इसके बावजूद हिन्दु मन्दिर अगर बहुसंख्यक समुदाय का त्यौहार मनाते हैं तो यह उनकी हरफ से सौजन्यता का एक संकेत है कि किस तरह वे जिस देश में रहते हैं उसमें घुल मिलकर रहने को तत्पर हैं। हमारे यहां तो विद्यालयों में सरस्वती पूजा तक हो जाती हैं तो उंगलियां उठ जाती हैं, सूर्य नमस्कार पर प्रश्न चिन्ह खड़े हो जाते हैं, नारियल वदारने पर विरोध प्रदर्शन होने लगते हैं। अगर तुलना करें तो हम किस कदर अपरिपक्व और पिछड़े साबित होते हैं। यह सब धर्म निरपेक्षता के पाखंड के नाम पर आश्चर्य तो तब होता है जब आधुनिकता के ठेकेदार बनने वाले मिशनरी स्कूलों में हिन्दू रीति-रिवाजों, त्यौहारों पर पाबन्दी लग जाती है। बच्चे राखी बांधकर या मेहंदी लगा कर स्कूल चले जांय तो दंड भुगतना पड़ता है।
मंदिर से बाहर निकले तो पार्किंग की तरफ जाने का रास्ता बन्द था। पार्किग के लिये बहुत बड़ी जगह ले रखी थी फिर भी रविवार के कारण वाहनों की भारी भीड़ श्री प्रशासन मन्दिर जैसे सार्वजनिक स्थान बनाने की अनुमति ही सब देता है जब पार्किंग की पर्याप्त जगह का प्रावधान कर लिया जाये। घूम कर गये तो एक जगह पुलिस की गाड़ी आड़ी खड़ी थी और तीन चार पुलिसवाले एक व्यक्ति से पू कर रहे थे। हमारे देखते देखते ही एक पुलिसकर्मी ने उस व्यक्ति को उल्टा और उसके हाथ पीछे कर उनमें हथकड़ियां पहना दी। एसे दृश्य फिल्मों में तो देखने को मिलते हैं मगर वास्तविक रूप से आज देख रहे थे। हम लोग कुछ पल के लिये तो सहम गये कि कहीं कोई आतंकवादी तो नहीं मगर मुनीश ने बताया कि कोई नशीले द्रव्य बेचने वाला होगा। इनकी धर पकड़ होती ही रहती है। मुजरिम कार में बिठा कर पुलिस चली गई। हम भी अपनी कार में बैठ एक भारतीय रेस्टोरेन्ट में नाश्ता करने रवाना हुए।
जैन मंदिरों की तरह यहां हिन्दु मंदिर भी बहुतायत में है। जिस तरह अमेरिका के अन्य शहरों में हिन्दु मन्दिरों का उदय हुआ उसी तरह लॉस एंजलेस में भी हुआ हिन्द आप्रवासियों की संख्या में वृद्धि के साथ ही इनकी भी वृद्धि होती रही। सिद्धि विनायक, स्वामी नारायण इस्कोन सहित सभी हिन्दू देवी देवताओं के मन्दिर नजर आ जाते हैं। दक्षिण भारतीय मंदिर भी अच्छी संख्या में हैं।
लॉस एंजलेस के मलीबु उपनगर का दक्षिण भारतीय मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। होलीवुड फिल्म बेवरली हिल्स नीन्जा के एक दृश्य में यह मन्दिर दिखाया गया था। एश्वर्या राय की फिल्म जीन्स में भी यह मन्दिर दिखाई देता है। प्रसिद्ध अभिनेत्री व गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स के 4 माह के पुत्र को इस मंदिर के पुजारी ने आशीर्वाद दिया था। इस समारोह को मीडीया द्वारा दुनिया भर में प्रचारित किया गया था।
सिन्धी समुदाय का अलग से सिन्धु मन्दिर भी है जहां झूलेलाल के साथ साथ शिव, राम, कृष्ण की भी मूर्तियां हैं। इसी तरह कई गुरूद्वारे, सनातन धर्म मन्दिर व लक्ष्मीनारायण मन्दिर भी हैं।
दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिये यहां के उदीपी रेस्टोरेन्ट बहुत प्रसिद्ध हैं। हालांकि यहां हर तरह के खाद्य मिलते हैं, पंजाबी, गुजराती वगैरा फिर भी अधिकांश लोग इडली, डोसा, उप्पमम आदि ही पसन्द करते हैं। रविवार की सुबह थी, इसलिये रेस्टोरेन्ट पूरा भरा था, आश्चर्य यह था कि भारतीयों के साथ साथ कई अमरीकी गोरे-काले भी यहां की विविधिताओं का रसास्वादन ले रहे थे। कुछ प्रतीक्षा के बाद हमें भी स्थान मिल गया।
लॉस एंजलेस में भारतीय समुदाय अच्छी खासी संख्या में उपस्थित है, यही कारण है कि यहां एक लिटिल इण्डिया भी बसा हुआ है जहां लगभग 150 दुकाने भारतीयों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। विश्व के हर कोने में जहां जहां भारतीय समुदाय अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं वहां वहां लिटिल इण्डिया उभर आते हैं। अफसोस इस बात का है कि कुछ लोगों को इण्डिया नाम से ही चिढ़ हो जाती है और वे इसका विरोध करने लगते हैं। मलेशिया के कुआलालम्पुर में दशकों से एक बहुत बड़ा क्षेत्र लिटिल इण्डिया नाम से जाना जाता था मगर कुछ लोगों को हजम नहीं हुआ तो प्रस्ताव पारित कर यह नाम बदला गया। नाम भले ही बदल लो मगर जो नाम लोगों की जबान पर चढ़ जाये वो हट नहीं सकता। आज भी इसे सब लिटिल इण्डिया कह कर ही पुकारते हैं।
बात लोस एंजलेस के लिटिल इण्डिया के साथ भी हुई। भारतीय वासियों ने शहर के अपेक्षाकृत सस्ते और वीरान इलाके आटेंशिया में बसना शुरू किया। धीरे धीरे अपने व्यवसाय भी शुरू कर दिये जिससे यह लिटिल इण्डिय नाम से मशहूर हो गया। पूरे लॉस एंजलेस ही नहीं केलिफोर्निया राज्य के लोग भी यहां आकर अपने देश की एक झलक देख कर घर जैसा महसूस करने लगे। कुछ लोगों को यह रास नहीं आया और हो गया विरोध शुरू कि इण्डिया नाम से अन्य देशों के प्रवासियों को एतराज हो सकता है और इससे अनावश्यक ही समाज में विघटन होगा। दलील हास्यास्पद थी मगर कौन सुनता। क्षेत्र के सभी साईन बोडों से लिटिल इण्डिया नाम हटा कर आर्टेशिया कल्चरल शोपिंग सेन्टर कर दिया। इससे हुआ कुछ नहीं लोगों के मुँह पर लिटिल इण्डिया का नाम चढ़ गया तो चढ गया। सब इसे इसी नाम से पुकारते हैं।
इस बाजार में पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण दूर दूर से आने वाले भारतीय जो यहां थोड़ा वक्त गुजारना चाहते हैं, बहुत निराश होते हैं, अपनी गाड़ी में बैठे बैठे ही वे खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं और गाड़ी में ही बाजार का चक्कर लगा कर लौट जाते हैं। यहां साड़ियों, जूतियों, हेण्डीक्राफ्ट, ब्यूटी पार्लर वगैरा की दुकानों के अलावा भारी संख्या में रेस्टोरेन्ट, मिठाई की दुकानें, मसालों, भारतीय नमकीन आदि की दुकानें है। ब्यूटी पार्लर में स्त्रियां अक्सर मेहंदी मंडवाती नज़र आ जाती हैं। बरसों से यहां बसे भारतीय अपने बच्चों की शादियां भी यहीं करते हैं इस कारण कई दुकानों पर शादी सम्बन्धी वस्त्र व सामग्री भी मिल जाती है।
खा-पी कर वापस घर लौटने से पूर्व एक बड़े स्टोर में कुछ खरीददारी लिये गये। हमारे यहां वालमार्ट का नाम बहुत सुनते हैं मगर इतने दिनों में अमेरिका में था, कनाडा भी गया था पर अभी तक एक भी वालमार्ट के दर्शन न हुए थे। इस स्टोर का नाम कोस्टको था, आजकल अमेरिका में यह बहुत प्रसिद रहा है. यहां हर तरह की चीज, अपेक्षाकृत सस्ते दामों में मिल जाती है। बहुत बड़ा था ही, इसका पार्किंग क्षेत्र इससे चार पांच गुना बड़ा था।
हम लोग गाड़ी पार्क कर रहे थे तो एक विचित्र सा नजारा देखकर अचरज में पड़ गये। अभी तक अमेरिका में एक भी भिखारी के दर्शन नहीं हुए थे गये। कई व्यस्त स्थानों पर कई लोगों को किसी वाद्य के सहारे गाना गाते जरूर देखा था, वहीं वह अपनी हेट बिछा रख देते थे जिस पर आने जाने वाले सिक्के नोट डाल देते थे। यहां पार्किंग क्षेत्र में एक आदमी एक तरफ बैठा था, इसने अपने हाथ में एक बोर्ड ले रखा था, इस बोर्ड पर लिखा था कि उसे मदद की जरूरत है यह भूखा है और बेकार है आते जाते लोग इसके सामने रखे कपड़े पर भी नोट सिक्के डाल कर जा रहे थे।
Editorial

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