✕
भारतीय संस्कृति की विराट शक्ति
By EditorialPublished on
संप्रति भारत राष्ट्रजीवन (Samprati Bharat Rashtrajivan) के सभी क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है। देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ी है, लेकिन यह कथित उदारवादियों की आंखों को चुभ रही है। वे सुनियोजित रणनीति (Politics) के तहत भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) को बदनाम करते रहते हैं।

x

हृदयनारायण दीक्षित
संप्रति भारत राष्ट्रजीवन (Samprati Bharat Rashtrajivan) के सभी क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है। देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ी है, लेकिन यह कथित उदारवादियों की आंखों को चुभ रही है। वे सुनियोजित रणनीति (Politics) के तहत भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) को बदनाम करते रहते हैं। आरोप लगाते हैं कि अल्पसंख्यकों को सामान्य नागरिक अधिकार भी उपलब्ध नहीं हैं। जबकि सच इसका उलटा है। यहां अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तुलना में ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं। उन्हें संविधान में अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के संरक्षण के अंतर्गत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। उन्हें शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं संचालन का भी अधिकार है। ऐसे अधिकार बहुसंख्यकों को नहीं हैं।
लोक नियोजन के सभी अवसर अल्पसंख्यकों को उपलब्ध हैं। वे ग्राम पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक चुने जाते हैं । बावजूद इसके कथित उदारवादी अल्पसंख्यक उत्पीड़न के बहाने भारत पर हमलावर हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की भी इस मुद्दे पर हाल में नकारात्मक टिप्पणी आई। इस बीच विश्व मुस्लिम लीग के महासचिव मुहम्मद बिन अब्दुलकरीम अल ईसा ने बीते दिनों दिल्ली में भारत के ज्ञान एवं संविधान की प्रशंसा करते हुए उसे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सुंदर उदाहरण बताया। अल ईसा ने कहा कि शांति के संबंध में विश्व को भारत से सीखना चाहिए। उन्होंने भारत को अल्पसंख्यक उत्पीड़न का क्षेत्र बताने वाले कथित उदारवादियों को आईना दिखाया है।
भारत (India) में पंथ मजहब आधारित भेदभाव कभी नहीं रहे। भारत के मूल अभिजन आर्य- हिंदू हैं। यहां विश्व के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से जनसमूह आते रहे हैं। संस्कृति और सभ्यता के अध्येता अनेक विद्वानों ने हिंदुओं द्वारा सबको गले लगाने और मिला लेने की क्षमता को अद्भुत बताया है। यहां बाहर से आए ईरानी, यूनानी, पार्थियन, बैक्ट्रियन, हूण, तुर्क, यहूदी और पारसी भी घुलमिल गए। मुसलमान सातवीं शताब्दी में आए। उनका आना काफी लंबे समय तक जारी रहा। उन पर भी हिंदू जीवन रचना का प्रभाव पड़ा।
प्रसिद्ध इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने लिखा है कि, 'विदेशी (मुसलमान तुर्क) अपने पूर्वजों शकों आदि की तरह हिंदू धर्म की आत्मसात करने की अद्भुत शक्ति के वश में हुए और उनमें तेजी से हिंदूपन घर कर गया।' वे भारतीय संस्कृति के प्रभाव में भारत के अभिजन बन गए। हालांकि, पं. जवाहरलाल नेहरू ने स्मिथ द्वारा प्रयुक्त हिंदू धर्म और हिंदूपन शब्द प्रयोग पर आपत्ति में कहा, 'इन शब्दों के इस्तेमाल से एक खास मजहब का ख्याल आता है ।' नेहरू की दृष्टि में हिंदू मजहब है, पर उनका यह निष्कर्ष राजनीतिक होते हुए सत्य से परे है। वस्तुतः, हिंदुत्व भारत के लोगों की जीवनशैली है, लेकिन नेहरू भारत के बाहर से आए लोगों के परस्पर मिल जाने की बात से इन्कार नहीं करते।
मैक्समूलर अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान थे। इंग्लैंड की सरकार ने 1882 में सिविल सेवक अंग्रेज युवकों के प्रशिक्षण के दौरान भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिए उन्हें बुलाया था । उद्देश्य था कि नए सिविल अधिकारी भारत के आत्मा को उचित ढंग से समझ सकेंगे। मैक्समूलर ने 'इंडिया वाट कैन टीच अस' के माध्यम से संस्कृति दर्शन आदि उत्कृष्ट मूल्यों के लिए भारत को विश्व में श्रेष्ठ बताया था। कथित उदारवादी मैक्समूलर के निष्कर्ष नहीं मानते। वे भारत में सभी आस्थाओं का सहअस्तित्व भी नहीं मानते। अमेरिका में श्वेत- अश्वेत भेद रहे हैं। अश्वेतों का उत्पीड़न भी रहा है। इस पर टिप्पणी नहीं हुई। जम्मू-कश्मीर लंबे अर्से से हिंदू उत्पीड़न का क्षेत्र रहा है। कश्मीर घाटी को हिंदू विहीन करने और कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार भुलाया नहीं जा सकता। इस पर किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने कोई प्रतिवाद नहीं किया, लेकिन कथित उदारवादी कश्मीर में सक्रिय आतंकियों की गिरफ्तारी और उन पर कानूनी कार्रवाई को लेकर व्यथित रहते हैं ।
भारत की प्रतिष्ठा कथित उदारपंथियों एवं अलगाववादियों को हजम नहीं होती। अलगाववाद इनका मुख्य एजेंडा है, लेकिन भारत को बदनाम कर कोई भी राजनीति संभव नहीं हो सकती । भारतीयों को असहिष्णु और हिंसक बताकर भी कोई राजनीति नहीं की जा सकती। भारत में विविधता के बावजूद एकता है । इस का को तोड़ने का प्रयास समाज के प्रति अपराध है।
यहां सभी पंथिक आस्थाओं के प्रति सम्मान का स्वाभाविक परिवेश है। सबको अपने विचार के अनुसार पंथ मजहब के प्रति आस्तिकता और तत्संबंधी उपासना के संवैधानिक अधिकार हैं। स्मरण रहे कि राष्ट्र के जन्म, गठन और निर्माण का आधार मजहब नहीं होता। पाकिस्तान का जन्म और गठन मजहब के आधार पर हुआ, लेकिन पाकिस्तान अपने जन्म के 24 वर्ष बाद टूट गया । मजहब ही राष्ट्र गठन का आधार होता तो पाकिस्तान मजबूत राष्ट्र होता । अलगाववादी विचार को लेकर जिन्ना भारत तोड़ने में कामयाब रहे। यह इतिहास का त्रासद अध्याय और विघटनकारी राजनीति का प्रतिफल है। आखिरकार अपने ही समाज की निंदा और आलोचना का मूल लक्ष्य क्या है। विभाजनकारी राजनीति और राष्ट्रतोड़क बयानबाजी का उद्देश्य क्या है?
मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव अल ईसा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी भेंट की। उन्होंने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ मानव केंद्रित विकास को आगे बढ़ाने के तरीके एवं विभिन्न सांस्कृतिक अनुयायियों के मध्य समझ और सद्भाव को बढ़ावा देने पर विमर्श हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने उग्रवाद और नफरत के सभी पहलुओं का सामना करने के लिए सहमति जताई। मानवीय मूल्यों को लेकर भारत का काम ऐतिहासिक रहा है। विश्व लोकमंगल प्राचीन काल से ही भारत का ध्येय रहा है। भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया। अल ईसा ने ठीक ही कहा है कि शांति के लिए सारी दुनिया को भारत से सीखना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक संपदा विराट है। मूलभूत प्रश्न है कि क्या शांति और विभिन्न विचारधाराओं के सहअस्तित्व के संबंध में लोग भारत से प्रेरित होंगे और सीखेंगे? बेशक सीखेंगे, लेकिन इसके पहले भारत के छद्म सेक्युलर और कथित उदारपंथी भारतीय संस्कृति का सत्य स्वीकार करें। भारत की प्रतिष्ठा का रथ चक्र तेज रफ्तार है। इसे रोका नहीं जा सकता। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)

Editorial
Next Story
Related News
X
