Pratahkal - Lekh Update - The burden of election riots on southern states
एस. श्रीनिवासन
पिछले हफ्ते आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) में जगन मोहन रेड्डी (Jagan Mohan Reddy) के नेतृत्व वाली वाईएसआर (YSR) कांग्रेस सरकार (Congress Govt) के खिलाफ सरपंचों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया। राज्य में करीब 13,000 सरपंच हैं, जो आम लोगों की नाराजगी झेल रहे हैं, क्योंकि ग्राम पंचायतों के पास पैसों की कमी है। सरपंचों का आरोप है कि मुख्यमंत्री पंचायत-फंड का उपयोग अपनी पसंदीदा योजनाओं में कर रहे हैं।
पड़ोसी राज्य कर्नाटक (Karnataka) में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया (CM Siddaramaiah) को चुनाव घोषणापत्र में की गई घोषणा के मुताबिक गरीब परिवारों को 10 किलोग्राम चावल मुफ्त में देने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी, क्योंकि उन्हें केंद्र से अपेक्षित सब्सिडी वाला चावल नहीं मिला। तमिलनाडु में भी मुख्यमंत्री एम के स्टालिन को आक्रामक विपक्ष का सामना करना पड़ा, क्योंकि राज्य में महिला प्रमुख वाले परिवारों को 1,000 रूपये देने में उन्होंने कुछ वक्त ले लिया। उधर, केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने केरल की वाम सरकार की आलोचना की है, और उस पर केंद्र की जन- कल्याणकारी योजनाओं की अनदेखी करने व उनके क्रियान्वयन में हीला- हवाली करने का आरोप लगाया है। केरल में वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन योजना है और आवास योजना भी ।
केंद्र सरकार की भी तमाम तरह की कल्याणकारी योजनाएं हैं, जैसे गरीबों को मकान देने वाली प्रधानमंत्री आवास योजना, किसानों को 6,000 रूपये सालाना सहायता देने वाली पीएम किसान योजना, गरीब परिवारों को रसोई गैस सिलेंडर की सुविधा देती उज्जवला योजना आदि। निस्संदेह, केंद्र और राज्य सरकारें, दोनों गरीब परिवारों के लिए जन-कल्याणकारी योजनाएं चलाती हैं, लेकिन वे एक- दूसरे को ऐसी योजनाओं के लिए कठघरे में भी खड़ा करती हैं, और संसाधनों की बर्बादी के आरोप भी लगाती हैं। हालांकि, अर्थशास्त्री कुछ कल्याणकारी योजनाओं, विशेषकर प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण योजनाओं का समर्थन करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार ये प्रयास अधिक सार्थक हैं और लाभार्थियों को मन की करने की सुविधा देते हैं। इसके अलावा, ये खामियों को दूर करती हैं और भ्रष्टाचार कम करती हैं, क्योंकि अगर प्रत्यक्ष हस्तांतरण नहीं होता, तो पूरी प्रक्रिया में बिचौलिये भी शामिल हो जाते हैं, जिनके अपने हित होते हैं। मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों ने ऐसी लोक- लुभावन योजनाओं को एक प्रभावी साधन मान लिया है, इसके लिए वे राजकोष की सीमा से भी पार चले जाने से गुरेज नहीं करते । देखा जाए, तो जन-जन तक कल्याणकारी उत्पादों को पहुंचाना अब राजनीतिक दलों के लिए वैचारिक प्रतिबद्धताओं से आगे एक जिम्मेदारी बन गई है। कांग्रेस लंबे समय से ऐसी योजनाएं चलाती रही है। वामपंथी भी इन योजनाओं का समर्थन करते हैं। चुनावों में भावनात्मक मुद्दों पर भरोसा करने वाली भाजपा को भी अब इन सबसे परहेज नहीं है । यहां तक कि आम आदमी पार्टी भी कल्याणवाद का समर्थन करती है और उसने अपनी कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं। सभी पार्टियों के लिए प्रत्यक्ष नकद लाभ योजनाओं के लिए फंड देना एक प्रमुख चुनावी मुद्दा है, और वे जानते हैं कि पारंपरिक मतदाता बेशक वैचारिक प्रतिबद्धता निभाएंगे, पर लोक-लुभावन योजनाएं ही सोने पर सुहागा का काम करेंगी। ऐसी योजनाएं अब भारी अंतर से चुनाव जिताने में मदद करती हैं। हालिया कर्नाटक चुनाव में भी दिखा था, जब तमाम राजनीतिक घोषणओं के अलावा मुफ्त चावल योजना की घोषणा पार्टी के लिए मददगार साबित हुई। कर्नाटक में चुनाव घोषणापत्र में करीब 52,000 करोड़ रूपये की गारंटी योजनाओं की घोषणाएं की गई थीं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल भी अपने सालाना बजट का बड़ा हिस्सा ऐसी योजनाओं पर खर्च करते हैं। ये कमजोर वर्गों, महिलाओं, बच्चों, किसानों और वरिष्ठ नागरिकों को लक्ष्य करके लागू किए जाते हैं । कुछ योजनाओं का चरित्र समान होता है, लेकिन मतदाताओं का ध्यान खींचने के लिए उनको अलग-अलग रूपों में पेश किया जाता है। महामारी ने दुनिया को नकद लाभ के फायदे सिखाए हैं। भारत में मजबूत आईटी बुनियादी ढांचे के विकास ने, जिसमें मोबाइल के जरिये रूपये का सरल डिजिटल हस्तांतरण संभव होता है, प्रत्यक्ष लाभ योजनाओं को सरकारों और जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया है। तमिलनाडु में तो द्रविड़ पार्टियों ने विकास के अपने मॉडल को तैयार करने के लिए अपनी विचारधारा में ही कल्याणवाद शामिल कर लिया है। द्रमुक सरकार तो 'द्रविड़ मॉडल' पर अपना अधिकार जताती है और कहती है कि इसके कारण तमिलनाडु ने न केवल अपनी अर्थव्यवस्था सुधारी है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मानव विकास संकेतकों में भी काफी तरक्की करने में सफलता हासिल की है। तथ्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। मसलन, तमिलनाडु में एक लड़की के जन्म के बाद मां को एक बेबी किट दिया जाता है और उच्च शिक्षा के लिए उस लड़की के नाम पर 50,000 रूपये की 'फिक्स्ड डिपोजिट' की जाती है, और उसकी शादी के लिए एक ग्राम सोना अलग से रखा जाता है। लड़की को स्कूल जाने के लिए मुफ्त साइकिल या मुफ्त बस यात्रा का पास मिलता है, कॉपी- किताबें मुफ्त मिलती हैं और ट्यूशन फीस माफ की जाती है। इससे साक्षरता के मामले में राज्य का कद ऊंचा हुआ है, कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ी है ( देश भर में कार्यबल में महिलाओं की सर्वाधिक भागीदारी तमिलनाडु में ही है), और जीडीपी में उनके योगदान को सराहना मिली है। हालांकि, लोक-लुभावन योजनाओं ने राज्यों के बजट पर भी दबाव डाला है। कर्नाटक सरकार ने भारतीय खाद्य निगम की ओपन मार्केट सेल्स स्कीम के माध्यम से सब्सिडी वाले चावल खरीदने की योजना बनाई थी। मगर केंद्र ने यह कहते हुए साथ देने से इनकार कर दिया कि आपदा के समय सहायता देने व महंगाई से बचने के लिए जमा किए गए खाद्यान्न का कहीं और इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसी तरह, आंध्र प्रदेश में पंचायत प्रमुखों के सामने विकट स्थिति पैदा हो गई है, क्योंकि फंड को मुख्यमंत्री कल्याणकारी योजनाओं में स्थानांतरित कर दिया गया है। जाहिर है, 2024 आम चुनाव का वर्ष है, इसलिए काफी संभावना है कि केंद्र और राज्य, दोनों ऐसी कल्याणकारी योजनाएं शुरू करेंगे और उनको अधिकाधिक फंड देंगे। वे बेशक ऐसा करें, लेकिन इस बात का जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन सबसे अर्थव्यवस्था पर किसी तरह की चोट न पहुंचे।
Editorial

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