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साधु को शुद्ध दान देने से होती है कर्म निर्जरा
By EditorialPublished on
Acharya Mahashraman, साधु को शुद्ध दान देने से होती है कर्म निर्जरा, Mumbai News Update

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दान के अनेक प्रकार और विभिन्न रूप बताया गया है। इससे यह प्रेरणा ली जा सकती है कि आदमी की भावना कैसी है, इसका अपना गहरा प्रभाव होता है। अगर आदमी की भावना शुद्ध हो और अनजाने में सचित्त वस्तु का दान भी दे दिया तो उसे पाप का नहीं कर्म निर्जरा का लाभ प्राप्त होता है। शुद्ध श्रावक, वस्तु भी शुद्ध और दान देने वाला भी साधु हो तो वह दान धर्म की दृष्टि से लाभदायी होता है और श्रावक को अच्छा लाभ होता है।
इसके उपरान्त उन्होंने आचार्य कालूगणी द्वारा जोधपुर में 22 दीक्षाएं प्रदान करने के प्रसंग और उस समय की भव्यता को सरसशैली में व्याख्यायित किया। सुमेरमल सुराणा ने भी आचार्य कालूगणी के प्रभाव के संदर्भ में अभिव्यक्ति दी। उपासक श्रेणी सेमिनार के तीसरे दिन व्यवस्थापक जयंतिलाल सुराणा ने भी विचार रखे। आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि योगेशकुमार ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

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