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सबसे खतरनाक है आरोपों की बाढ़
By EditorialPublished on
यमुना की बाढ़ अब दिल्ली को छोड़कर आगे बढ़ गई है। भारत में आपदाएं अपने पीछे संकल्प छोड़कर नहीं जातीं, भयानक से भयानक आपदाओं के बाद यहां जो बच जाता है, वह राजनीति है। दिल्ली इस समय इसका सबसे उपयुक्त मैदान है। यहां जो केंद्र सरकार है, वह भारतीय जनता पार्टी की है, और राज्य सरकार आम आदमी पार्टी की ।

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हरजिंदर
यमुना की बाढ़ अब दिल्ली को छोड़कर आगे बढ़ गई है। भारत में आपदाएं अपने पीछे संकल्प छोड़कर नहीं जातीं, भयानक से भयानक आपदाओं के बाद यहां जो बच जाता है, वह राजनीति है। दिल्ली इस समय इसका सबसे उपयुक्त मैदान है। यहां जो केंद्र सरकार है, वह भारतीय जनता पार्टी की है, और राज्य सरकार आम आदमी पार्टी की । इस बार दिल्ली के लोगों को सिर्फ बाढ़ की मार नहीं झेलनी पड़ी, बाढ़ को लेकर एक- दूसरे पर लगाए गए इनके आरोपों की बौछार भी झेलनी पड़ी। कांग्रेस ज्यादा सुविधाजनक स्थिति में थी, वह आराम से दोनों पर आरोप लगा सकती थी। कहते हैं कि यमुना में चार दशक के बाद जलस्तर इतना बढ़ा है। चार दशक बाद दिल्ली के राजनेताओं को एक-दूसरे पर आरोप लगाने का जो मौका मिला, उसे वे भला आसानी से कैसे जाने देते?
बाढ़ का यह पानी हिमाचल से चलकर हरियाणा होता हुआ दिल्ली पहुंचा था। दोनों ही प्रदेशों में कम या ज्यादा इसी तरह की राजनीति देखने को मिली। हिमाचल में सरकार ने सारा दोष कुदरत के मत्थे मढ़ दिया। क्या करें, इतने कम समय में इतनी ज्यादा बारिश हो गई कि सारे रिकॉर्ड टूट गए, मौसम के दो चक्र आपस में टकरा गए और कई जगह बादल भी फटे । ऐसा ही तर्क दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी दिया- दिल्ली में बाढ़ इसलिए आई कि पहाड़ों में खूब बारिश हुई और फिर हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज से पानी छोड़ दिया गया । पर्यावरणविद ऐसी आपदा को लेकर कबसे आगाह कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि खतरा कभी भी किसी भी दिन आ सकता है। किसी भी सरकार ने इसके लिए कोई तैयारी नहीं की, वजूद इसके दर को जिम्मेदार ठहराने का विकल्प तो हमेशा ही खुला है।
बाढ़ का पानी अब उत्तर प्रदेश और बिहार की ओर बह चला है। अगर वहां भी बड़े पैमाने पर जल - प्लावन हुआ, तो आरोपों की यह राजनीति पानी में बहते मलबे के साथ ही वहां जा पहुंचेगी। बिहार को इस मामले में एक अतिरिक्त सुविधा प्राप्त है। वहां जब बाढ़ आती है, तो आरोप नेपाल पर लगाया जाता है। कुछ साल पहले नेपाल के पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली आया, तो उनमें से कुछ का कहना था कि भारत की जलनीति के कारण नेपाल के कई हिस्सों में बाढ़ आ जाती है। यानी, नेपाल के पास भी बाढ़ का मुकाबला करने के लिए बस आरोप ही हैं।
पिछले साल पाकिस्तान में भयानक बाढ़ आई थी। एक तिहाई से ज्यादा देश बाढ़ के पानी में डूब गया था। बाढ़ ने उसकी अर्थव्यवस्था को इतना जर्जर कर दिया कि वह अभी तक उसके दंश से नहीं उबर सकी है। यह भी कहा जाता है कि पाकिस्तान को बदहाल बनाने में चीन से लिए गए महंगे कर्ज की भूमिका दूसरे नंबर पर है, पहला नंबर पिछले साल आई बाढ़ का है। पाकिस्तान ने बाढ़ का मुकाबला कैसे किया? उसने आरोप लगाया कि यह बाढ़ भारत के कारण आई है। बाढ़ का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान और उसकी भारी भरकम फौज के पास इसके अलावा और कुछ नहीं था । यह बात अलग है कि उसके बाद दुनिया के जिन तमाम देशों ने पाकिस्तान को आपदा राहत सामग्री भेजी, उनमें भारत भी था । जब दिल्ली की कई सड़कें और मोहल्ले बाढ़ के हवाले थे, उस समय खबरिया टीवी चैनलों पर सिर्फ दो चीजें दिख रही थीं। एक तो बाढ़ का आंखों देखा हाल और दूसरी, भाजपा व आप के बीच आरोप-प्रत्यारोप । बीच- बीच में कुछ पर्यावरणविदों और नगर नियोजकों वगैरह के चेहरे भी कैमरों पर दिखाई दे जाते थे, लेकिन इन संवादी स्वरों को कहीं बहुत ज्यादा भाव नहीं मिला। आरोपों की राजनीति कोई गंभीर विमर्श नहीं पैदा करती और अपनी ऊंची आवाज से समाज में हो रही विमर्श की छोटी-मोटी कोशिशों को दबा भी देती है। कुछ ही समय बाद मीडिया जब किसी नई ब्रेकिंग न्यूज पर दांव लगा देगा, तो राजनीति भी उधर मुड़ जाएगी। नई दृश्यावली के सामने आते ही पुराने दृश्यों के दुख-दर्द लोग भी भूलने लगेंगे। यहां एक और चीज की ओर ध्यान देना होगा कि आम दिनों में जब कोई आपदा हमारे सिर पर नहीं मंडरा रही होती, तब हमारे बीच जो विमर्श चलता है, वह अक्सर पर्यावरण - विरोधी होता है। उस समय न तो हमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान की चिंता सताती है और न आपदाओं की कोई आशंका। अभी कुछ दिन पहले तक इस बात की पूरे उल्लास से चर्चा हो रही थी कि मनाली जाने वाला रास्ता अब 'फोर लेन' हो गया है। अब रास्ते में जाम नहीं मिलेगा, और लोग जल्दी पहुंच जाएंगे। यह चर्चा उस समय हो रही थी, जब गरमी लगभग आ ही चुकी थी और दिल्ली, चंडीगढ़ जैसे महानगरों के लोग यह सोचकर गदगद थे कि इस बार जब पारा 40 डिग्री सेल्सियस को पार करेगा, तो वे गाड़ी उठाएंगे और फर्राटा भरते हुए मनाली पहुंच जाएंगे, जहां पर्वतों की ठंडी ताजा हवा उनका इंतजार कर रही होगी। फिर आगे अटल टनल भी बन गई है, जिसके पार लाहौल स्पीति के मनमोहक क्षेत्र तक पहुंचना अब पहले जितना कठिन नहीं रहा। इन सारी चर्चाओं में यह जि कहीं नहीं था कि फोर लेन सड़क क्या खतरे लेकर आएगी? इससे पर्यावरण का नुकसान कितना हुआ और इसे बनाने के लिए जिन पहाड़ों को तोड़ा और चीरा गया, उनका मलबा कहां गिराया गया? हिमाचल प्रदेश में दो जगह फोर लेन सड़कें बनाई गई हैं। एक कीरतपुरा से लेकर मंडी तक और दूसरी, चंडीगढ़ से लेकर शिमला तक । सबसे ज्यादा नुकसान भी इन्हीं इलाकों में हुआ है, और सबसे भयावह दृश्य भी वहीं पर देखने को मिले हैं। वहां बरसा पानी सब कुछ तोड़ता, बहाता, डुबोता चंडीगढ़ दरवाजे दस्तक देने लगा।
हमने शायद यह मान लिया है कि विकास का रास्ता प्रकृति का गला घोटे बिना नहीं तैयार हो सकता। पर्यावरण को बचाने के लिए हमें बहुत कुछ करना है, पर यह सोच हमें कुछ भी नहीं करने देती । फिलहाल हम अगर अपनी बात को बाढ़ के खतरों तक ही केंद्रित करें, तो क्या ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की जा सकती कि किसी भी कारण से नदियों का रास्ता रोकना सबसे बड़ा अपराध घोषित हो जाए? क्या संसद के अगले सत्र में ऐसा कोई प्रस्ताव आएगा? इस प्रस्ताव का तो पता नहीं, लेकिन बाढ़ को लेकर राजनीतिक आरोप वहां भी सुनाई पड़ेंगे ही।

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