Pratahkal - Mumbai News Update - Acharya Mahashraman
मुंबई : आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने शुक्रवार को कहा कि भगवती सूत्र में ज्ञान के पांच प्रकार और अज्ञान के दो प्रकारों का वर्णन किया गया है। ज्ञान के पाँच प्रकार आधि निबोधिक, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान और केवल ज्ञान। इसी प्रकार दो प्रकार के अज्ञान भी बताया गया है- ज्ञान का अभाव अज्ञान और मिथ्यादृष्टि का बोध रूपी अज्ञान। ज्ञान और अज्ञान के संदर्भ की चर्चा करते हुए बताया गया है कि ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञान रूपी पट्ट पर पड़े मिट्टी के आवरण के समान है। जैसे-जैसे यह मिट्टी हटती जाती है और पूर्ण रूप से मिट्टी हट जाने पर केवल ज्ञान प्रकाशित हो जाता है। एक बार केवल ज्ञान हो जाए तो उस पर दुबारा ज्ञानावरणीय कर्म की मिट्टी आ ही नहीं सकती, किन्तु केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए वीतरागता की परम आवश्यकता होती है। वीतरागता की प्राप्ति के बाद ही केवल ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। अज्ञान और मोह का क्षय होने पर ही सर्वज्ञान अर्थात केवल ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

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इसके बाद उन्होंने अष्टमाचार्य कालूगणी के जोधपुर (Jodhpur) चतुर्मासकाल का वर्णन करते हुए उस दौरान होने वाली दीक्षा में बाल दीक्षा के विरोध के प्रकरण को वर्णित किया।
उन्होंने तेरापंथी महासभा (Terapanthi Mahasabha) द्वारा आयोजित उपासक श्रेणी के शिविर में शिविरार्थियों से कहा कि इस श्रेणी का शुभारम्भ आचार्य तुलसी के समय में हुआ। इस श्रेणी को आचार्य महाप्रज्ञ का आशीर्वाद भी मिला। सूर्यप्रकाश श्यामसुखा, सुमेरमल सुराणा, तरुण गुन्देचा, ऋतु आहूजा व जीतो के चीफ सेक्रेट्री रोशनलाल बड़ाला ने भी विचार रखे।
Editorial

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