✕
प्रगति की गति बढ़ाएगी समान नागरिक संहिता
By EditorialPublished on
देश में समान नागरिक संहिता को लेकर जारी बहस के बीच जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन ने इसे एक प्रकार का झांसा बताया है। उन्होंने कहा, 'हम हजारों वर्षों से भिन्न-भिन्न नागरिक संहिताओं के साथ जीते आए हैं और अगले हजार साल और जी सकते हैं। सवाल यह है कि इसे लागू कैसे करेंगे और इसे लागू करने से फायदा किसे होगा?'

x
शिवकांत शर्मा
देश में समान नागरिक संहिता को लेकर जारी बहस के बीच जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन ने इसे एक प्रकार का झांसा बताया है। उन्होंने कहा, 'हम हजारों वर्षों से भिन्न-भिन्न नागरिक संहिताओं के साथ जीते आए हैं और अगले हजार साल और जी सकते हैं। सवाल यह है कि इसे लागू कैसे करेंगे और इसे लागू करने से फायदा किसे होगा?'
लिंगभेद की समस्या के आर्थिक एवं सामाजिक दुष्प्रभावों पर गहन शोध करने वाले बुद्धिजीवी सेन से समान नागरिक संहिता पर ऐसी टिप्पणी हैरान कर गई । सेन भलीभांति जानते हैं कि परिवार और समाज में महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक बराबरी और भागीदारी देश की उन्नति के लिए कितनी महत्वपूर्ण है । वह जानते हैं कि कुछ समुदायों के घोर विरोध के बावजूद क्यों भारत के संविधान निर्माता फ्रांस की समान नागरिक संहिता की तर्ज पर भारत में भी ऐसी ही संहिता बनाना चाहते थे । आखिर क्यों आंबेडकर, नेहरू और पटेल को उसे संविधान की मुख्य धाराओं की जगह नीति निर्देशक सिद्धांतों में रखकर ही संतोष करना पड़ा। शाहबानो केस से लेकर 2009 के गोवा के दीवानी केस तक सर्वोच्च न्यायालय भारत सरकार को बारंबार याद दिलाता रहा है कि उसने समान नागरिक संहिता बनाने संबंधी संविधान के अनुच्छेद 44 के निर्देश का पालन नहीं किया है। शाहबानो मामले में पूर्व न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने लिखा था कि संसद को समान नागरिक संहिता की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए, क्योंकि इसी से राष्ट्रीय सामंजस्य और समानता का मार्ग प्रशस्त होता है। चार साल पहले सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने ही गोवा के दीवानी मामले में राज्य की पुर्तगाली नागरिक संहिता की प्रशंसा करते हुए कहा कि गोवा एक ऐसी मिसाल है, जहां प्रत्येक पंथ के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता है । इसलिए समझ नहीं आता कि प्रो. सेन को समान नागरिक संहिता की बात क्यों मूर्खतापूर्ण एवं आधारहीन लगी ।
समान संहिता परिवार में उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे, विवाह, तलाक और तलाकशुदा का गुजारा भत्ते जैसे मामलों के कानूनों को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप बनाकर उनमें एकरूपता लाती है। इसलिए इसका संबंध आस्था के बजाय सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों से अधिक है। महिलाओं के वोट बटोरने के लिए राजनीतिक पार्टियां जिस नारी सशक्तीकरण के नारे लगाती हैं उसकी शुरूआत परिवार से होती है। अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, कोरिया और मध्य एशिया के देशों में सभी जगह पारिवारिक संपत्ति में स्त्री और पुरूष का बराबर का हक माना जाता है । बहुविवाह पूरी तरह निषिद्ध है और मुंहबोले तलाक की जगह कानूनी तलाक का ही प्रविधान है, जिसके बाद गुजारा भत्ता देना होता है। कई विकसित देशों में समान नागरिक संहिता भले न हो, लेकिन परिवार के मामलों में देश के कानून ही लागू होते हैं जो लैंगिक समानता पर आधारित हैं। ब्रिटेन और कनाडा जैसे कुछ देश इस्लामी देशों में हुए बहुविवाह को कुछ परिस्थितियों में मान्यता दे देते हैं, लेकिन उनकी धरती पर यह पूर्णतया वर्जित है। तुर्किये, ट्यूनीशिया और मध्य एशियाई देशों के इस्लामी होने के बावजूद शादी, तलाक और संपत्ति के नियम वही हैं, जो यूरोप में हैं।
अब करीब तीन चौथाई दुनिया लिंगभेद की परंपराएं छोड़ स्त्री-पुरुष बराबरी के सिद्धांतों को अपना चुकी है। ऐसे में सबके लिए बराबरी की संवैधानिक प्रस्तावना वाले भारत में धार्मिक और कबाइली परंपराओं के नाम पर स्त्रियों के साथ अनुचित भेदभाव कायम रखना बड़ी चिंता का विषय है । बराबरी को लेकर विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र के पैमाने पर भारत का स्कोर 50 से नीचे है, जिसका मुख्य कारण वे भिन्न-भिन्न निजी कानून हैं जो संपत्ति के बंटवारे से लेकर विवाह, तलाक और पारिवारिक जिम्मेदारी तक में स्त्रियों को बराबरी के अधिकार नहीं देते। तुर्कमेनिस्तान किर्गिस्तान, लेबनान, ट्यूनीशिया, मोरक्को और तुर्किये भी भारत से आगे हैं।
सेन ने अपनी पुस्तक 'द कंट्री आफ फर्स्ट ब्वाएज' के लेखों में सिद्ध किया है कि स्त्रियों को परिवारों में बराबरी का हक न मिलना बच्चियों के कुपोषण, अशिक्षा, शोषण और आर्थिक पिछड़ेपन का बड़ा कारण है। बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां भी संपत्ति के बंटवारे में भेदभाव से जुड़ी हैं। संपत्ति में बराबरी के अधिकार के बिना महिलाओं को कर्ज लेने अपना कारोबार खोलने और आत्मनिर्भर बनने में कठिनाई होती है। मैकिंजी के अनुसार इस भेदभाव के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 12 ट्रिलियन (लाख करोड़ डॉलर का नुकसान होता है जिसके लगभग आधे का जिम्मेदार अकेला भारत है। समान नागरिक संहिता भारत के स्त्रीधन की बेड़ियां खोलकर पूरे देश को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है। कितनी बड़ी विडंबना है कि भांति-भांति के प्रलोभनों से छोटे-छोटे धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय समूहों के वोट बटोरने में लगी पार्टियां महिलाओं के हितों को अनदेखा कर समान नागरिक संहिता जैसे नारी-हितकारी मुद्दे पर जनमत को गुमराह करने में लगी हैं और कथित महिला हितैषी संगठन मौन हैं। यह संहिता तो संविधान सभा में ही बन जाती यदि मुस्लिम लीग के सभी 73 सदस्यों, रजवाड़ों के 93 में से अधिकांश प्रतिनिधियों और कांग्रेस के भी कुछ रूढ़िवादियों ने इसका विरोध न किया होता । आंबेडकर ने भी हिंदू कोड बिल के आगे न बढ़ने पर इस्तीफा दिया, लेकिन समान नागरिक संहिता के अनुच्छेद 44 में ठेल दिए जाने पर नहीं । कालांतर में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान किए 42वें संविधान संशोधन से संविधान का आत्मा तो बदल दिया गया, किंतु महिला अधिकारों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने की हिम्मत नहीं की। राजीव गांधी सरकार ने इतिहास के सबसे प्रचंड बहुमत का प्रयोग अदालती सलाह मानने के बजाय मौलवियों को खुश रखने में किया और शाहबानो पर शीर्ष अदालत का फैसला पलट दिया । राजनीतिक हितों के लिए ही सही, लेकिन मौजूदा सरकार ने समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाने की हिम्मत तो दिखाई है। विडंबना यही है कि जिन्हें महिलाओं की बराबरी के हक की खातिर इसकी हिमायत में खड़ा होना चाहिए था, वही इसके विरोध में खड़े हैं।

Editorial
Next Story
Related News
X
