Pratahkal-Only knowledge is the culmination of knowledge: Acharya Mahashraman
मुम्बई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने गुरुवार को तीर्थंकर समवसरण में कहा कि भगवती सूत्र में दो शब्द बताए गए हैं - छदमस्थ और केवली। ये दोनों शब्द काफी प्रसिद्ध हैं। इन शब्दों का विभाजन ज्ञान के विकास के संदर्भ में किया गया है। आठ कर्म बताए गए हैं, उसमें पहला कर्म ज्ञानावरणीय कर्म है। जिसका ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण नहीं हुआ है, वह मनुष्य छद्मस्थ है और जिस मनुष्य का ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण हो गया है, वह केवली होता है। केवल ज्ञान छद्मस्थ और केवली के बीच की माने भेदरेखा है। जिस मनुष्य को केवल ज्ञान नहीं हुआ, वह छद्मस्थ है। ज्ञान की दृष्टि से छद्मस्थ मनुष्य चार प्रकार के होते हैं- पहला मतिज्ञान और श्रुतज्ञान वाले, दूसरा मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के साथ अवधि ज्ञान और हो जाए, तीसरा मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधि ज्ञान के साथ मनः पर्यवज्ञान भी हो जाए और चौथा जिसके पास उपर्युक्त चारों ज्ञान हो जाए, वह छद्मस्थ मनुष्य होता है। आगम में दस ऐसी चीजें बताई गईं हैं, जिनके बारे में छद्मस्थ मनुष्य सर्व भावेण नहीं जान पाता, उसे केवली जान सकते हैं। ये बातें छदमस्थ और केवली के मध्य अंतर है। केवलज्ञान ज्ञान की पराकाष्ठा है, जो ज्ञानावरणीय कर्म के क्षीण के बाद ही होता है। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय के बड़ी अर्हता चाहिए। इसके लिए भी सबसे पहले मोहनीय कर्म क्षीण होता है तो आदमी मोहनीय कर्म को क्षीण किए बिना ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय नहीं हो सकता। आठ कर्मों में सबसे पहले क्षीण होने वाला मोहनीय कर्म होता है। मोहनीय कर्म क्षीण होता है तो ज्ञानावरणीय कर्म को क्षीण करना सहज हो सकता है। मोहनीय कर्म आसानी से क्षीण नहीं हो सकता। इसके लिए आदमी को क्रोध, मान, माया और लोभ को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
अपनी आत्मा के कल्याण के लिए कषायों से मुक्ति के लिए आदमी को धर्म, ध्यान, जप, तप, स्वाध्याय आदि में समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी आत्मा के कल्याण के लिए एक अवस्था के बाद समय-समय पर मोड़ लेने का प्रयास करना चाहिए। सांसारिक मोह को धीरे-धीरे कम करने और धर्म-अध्यात्म और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने और उसमें समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। व्यापार, धंधा, स्वामित्व आदि से मुक्त होकर ध्यान, जप, तप, स्वाध्याय आदि के द्वारा मोहनीय कर्म को क्षीण करने का प्रयास करना चाहिए। धार्मिक-आध्यात्मिक माहौल में रहने से मोहनीय कर्म को क्षीण करने में सहायता मिल सकती है। इसलिए जितना संभव हो, मोहनीय कर्म को क्षीण करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के उपरान्त उन्होंने अष्टामाचार्य कालूगणी की जीवनी ‘कालूयशोविलास’ के आख्यान क्रम को आगे बढ़ाया। प्रवास व्यवस्था समिति अध्यक्ष मदनलाल तातेड़ व अन्य पदाधिकारियों ने पावस प्रवास की पुस्तिका व फड़द को लोकार्पित किया।
Editorial

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