Pratahkal - Lekh Update - Common code to be treated in good faith
विभूति नारायण राय
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर उठा विवाद बहुत हद तक प्रत्याशित था । बहुसंख्यकवाद की राजनीति के चलते इसे उठाने का समय भी ऐसा चुना गया, जब चुनावी राजनीति में इसका भरपूर उपयोग हो सके। एक बार फिर से देश का क्षैतिज विभाजन हो गया है और राजनीतिक पंडित कयास लगाने में जुटे हैं कि चुनावी नतीजों पर इसका कितना असर पड़ेगा? यह नहीं भूलना चाहिए कि कई दशकों से इस पर बहस हो रही थी और कोई ठोस प्रस्ताव सामने न होने के कारण आमतौर से यह हवाई ही होती थी। इस बार उम्मीद थी कि सरकार या विधि आयोग समान नागरिक संहिता का कोई ड्राफ्ट सामने रखेगा और फिर उस पर देश भर में एक विस्तृत चर्चा होगी। इसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
संविधान सभा की बहसों को देखा जाए, तो हम पाएंगे कि नई-नई मिली आजादी की पृष्ठभूमि में इस विषय पर लंबी चर्चा हुई थी और चरम सांप्रदायिकता के उस दौर में संविधान निर्माताओं ने जल्दबाजी में ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई फैसला न लेकर इसे नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 के तहत डाल दिया था। उनकी मंशा थी कि कालांतर में जब माहौल अनुकूल होगा, तब भविष्य की पीढ़ियां गंभीर विचार-विमर्श के बाद इस विषय में कोई फैसला करेंगी। दुर्भाग्य से आज जब समान नागरिक संहिता पर उत्तराखंड विधानसभा या संसद कानून बनाने के लिए तत्पर दिख रही है, देश 1947 की ही तरह विभक्त है। पूरी बहस सांप्रदायिक चश्मे से हो रही है।
उम्मीद की जा रही थी, बहस की शुरूआत में कोई मसौदा रखा जाएगा, जिसके आधार पर नया कानून प्रस्तावित होगा, पर हुआ कुछ उल्टा ही । उत्तराखंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से अवकाश प्राप्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक आयोग गठित किया, जिसने आम जन और धार्मिक संगठनों से समान नागरिक संहिता पर राय मांगी। इसी तरह से केंद्रीय विधि आयोग ने भी नागरिकों के विभिन्न तबकों से राय भेजने की अपील की। किसी भी नागरिक संहिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति का बंटवारा, तलाकशुदा पत्नी को मिलने वाला मुआवजा या गोद लेने के अधिकार जैसे मुद्दों पर लाखों की संख्या में विभिन्न श्रेणी के लोगों ने अपनी राय भेजी। विमर्श के ये सारे बिंदु तो सभी धर्मों के लिए प्रासंगिक हैं, पर इनके अतिरिक्त 'हलाला' व 'इद्दत' ऐसी प्रथाएं हैं, जो इस्लाम केंद्रित हैं और कुछ उलेमा द्वारा शरिया कानूनों का अविभाज्य अंग मानने की जिद के चलते ही संवेदनशील हो गई हैं। ज्यादा उचित होता कि पहले प्रस्तावित कानून का एक मसौदा सारे हितधारकों के समक्ष रखा जाता और उस पर देश भर में गंभीर विमर्श होता और फिर अधिकतम सहमति के आधार पर कोई बिल सदन के पटल पर आता। जल्दबाजी में लाया गया कोई भी प्रस्ताव बड़ी आबादी के मन में स्वाभाविक रूप से शंका पैदा करेगा। इसलिए भी और कि पिछले विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता के विचार को गैर-जरूरी घोषित कर दिया था और मौजूदा विधि आयोग ने अपनी बदली हुई राय के लिए कोई आश्वस्त करने वाला तर्क नहीं दिया है।
समय और नीयत के विवाद में पड़े बिना यह तो कहा ही जा सकता है कि यदि दंड संहिता (आईपीसी) या दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) समान हो सकती है, तो कोई कारण नहीं है कि समान नागरिक संहिता न हो सके । बहु-विवाह या हलाला का समर्थन करने वाला कोई धर्मगुरू यह मांग नहीं करता कि शरिया कानून के मुताबिक मुसलमानों को चोरी करते हुए पकड़े जाने पर हाथ काटने की सजा दी जाए। इस तथ्य पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि धर्मों पर आधारित नागरिक संहिताएं स्त्रियों के प्रति अन्यायपूर्ण थीं, लैंगिक समानता की अवधारणा ही बहुत लंबे संघर्ष और ज्ञान के विस्तार की उपज है, आश्चर्य इस पर होगा कि कोई विचार इस परंपरा को नकारते हुए, अब भी स्त्री विरोधी प्रावधानों को बनाए रखने की जिद करे। यह याद रखने की जरूरत है कि संविधान सभा में विरोध के चलते डॉ आंबेडकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू हिंदू कोड बिल के सारे प्रावधान पास नहीं करा सके थे दशकों की जद्दोजहद के बाद अब जाकर हिंदू स्त्रियों को संपत्ति में बराबरी का हक मिल सका है।
हमारी दिक्कत यह है कि हम अनुदार और पिछड़ी मानसिकता के उलेमा को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानते हैं। हमें आईएमएसडी ( इंडियन मुस्लिम फॉर सेकुलर डेमोक्रेसी) द्वारा जारी दस्तावेज का भी अध्ययन करना चाहिए, जो उन्होंने समान नागरिक संहिता के समर्थन में जारी किया है। मुंबई केंद्रित आईएमएसडी उन मुस्लिम बुद्धिजीवियों व एक्टिविस्टों का संगठन है, जो मुस्लिम समाज को आधुनिक और प्रगतिशील बनाकर समय के साथ आगे बढ़ने में यकीन रखता है और इसके लिए एडवोकेसी करता रहता है। इस संगठन को इस बिल के समय और नीयत पर तो ऐतराज है, मगर यह औरतों को नागरिक संहिता में वे सभी अधिकार देने में विश्वास करता है, जो पुरूषों को हासिल हैं। उसके अनुसार, संहिता धर्मनिरपेक्ष व लैंगिक समानता की अवधारणा के अनुरूप होनी चाहिए। विवाह का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, तलाक, संपत्ति के बंटवारे या गोद लेने के प्रावधानों में स्त्री- पुरूष को एक जैसे अधिकार ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर इस संस्था द्वारा जारी दस्तावेज एक प्रगतिशील स्टैंड लेता है । बहुविवाह या हलाला जैसी प्रवृत्तियों को औरतों के आत्म-सम्मान के खिलाफ मानकर उन पर कानूनी प्रतिबंध लगाने का इसमें बिना शर्त समर्थन किया गया है। इसी तरह लड़के-लड़कियों की शादी की उम्र पर भी इसे हिचकिचाहट नहीं है। भिन्न यौनिकता और लिव इन संबंधों पर भी इसका दृष्टिकोण आधुनिक सोच के अनुकूल है।
दुर्भाग्य से अपने समय से पिछड़ी सोच वाले धर्मगुरू ही अगली कतारों में नेतृत्व करते दिखते हैं। प्रगतिशील और आधुनिक दृष्टिकोण वाले मुसलमान अक्सर पीछे धकेल दिए जाते हैं। जरूरत है कि उनकी आवाज भी सुनी जाए। बहुविवाह के समर्थक अपने पक्ष में आदिवासी प्रथाओं की आड़ लेने का प्रयास कर रहे हैं। किसी भी परंपरा में यदि कोई स्त्री विरोधी तत्व है, तो यह भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है और इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। सिर्फ यह याद रखना होगा कि किसी भी समुदाय को परिवर्तन अपनी हार की तरह नहीं लगना चाहिए। उन्हें मानसिक रूप से इसके लिए तैयार करना राज्य का कर्तव्य है ।
Editorial

Editorial

Next Story