Pratahkal - Lekh Update - Bengal brings shame to the country
राजीव सचान
एक क्षण के लिए कल्पना करें कि यदि देश में ईवीएम यानी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के बजाय मतपत्रों से चुनाव हो रहे होते तो क्या होता? शायद वही, जो अभी बंगाल में पंचायत चुनावों के दौरान हुआ। यहां मतदान वाले दिन मतपत्र ही नहीं, मतपेटियां भी लूटी गईं। उन्हें सीवर, नालों, तालाबों में फेंका गया या फिर जला दिया गया। इसके अलावा मतदान अधिकारियों से मतपत्र छीनकर उनमें अपने प्रत्याशियों के पक्ष में मुहर लगाई गई। मतदान अधिकारी असहाय-निरूपाय होकर लोकतंत्र को कलंकित करने वाली इस अराजकता को देखते रहे। उनके सामने कोई उपाय नहीं था, क्योंकि मतदान केंद्रों में या तो पुलिस थी ही नहीं या फिर वह निष्क्रिय थी ।
कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश से जो केंद्रीय सुरक्षा बल बंगाल भेजे गए थे, उन्हें संवेदनशील स्थानों पर तैनात ही नहीं किया गया या फिर वहां उन्हें देर से भेजा गया। कहीं-कहीं तो तब, जब मतदान हो चुका था। मतदान के दिन बंगाल में केवल इतना ही नहीं हुआ। इस तथाकथित भद्रलोक में अनेक स्थानों पर बम और गोलियां चलीं। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, जिनमें करीब 19 लोग मारे गए। इनमें सभी दलों के नेता और कार्यकर्ता थे। इसका मतलब है कि सभी दलों ने हिंसा का जवाब हिंसा से देने की तैयारी कर रखी थी। ममता सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि हिंसा में उसके दल के लोग भी मारे गए हैं, क्योंकि हिंसा रोकने की जिम्मेदारी उसी की होती है, जो सत्ता में होता है। यह पहले दिन से स्पष्ट था कि ममता सरकार की चुनावी हिंसा रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं । इसीलिए वह कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी, जिसमें उसने कहा था कि पंचायत चुनावों में केंद्रीय बलों को तैनात किया जाए।
ध्यान रहे कि पंचायत चुनाव के लिए नामांकन शुरू होते ही हिंसा और हत्या का दौर शुरू हो गया था। मतदान तिथि के पहले ही बंगाल में एक दर्जन से अधिक लोग मारे जा चुके थे । कायदे से तभी बंगाल सरकार को चेत जाना चाहिए था, लेकिन न वह चेती और न ही राज्य चुनाव आयोग | वह चुनावी हिंसा और अराजकता को रोकने में नाकारा साबित हुआ।
बंगाल में मतपत्रों के जरिये पंचायत चुनाव पांच साल पहले भी हुए थे और तब भी बड़े पैमाने पर उनकी लूट हुई थी और उपद्रवी मतपेटियां लेकर भाग गए थे। इस सबके बाद भी कई राजनीतिक दल समय-समय पर ईवीएम के बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव कराने की मांग करते रहते हैं । यह मांग तब और तेज हो जाती है, जब वे किसी चुनाव में पराजित हो जाते हैं। हिमाचल और कर्नाटक के चुनाव नतीजों के बाद ऐसी कोई मांग नहीं सुनाई दी, क्योंकि इन राज्यों के नतीजे ईवीएम का विरोध करने वाले दलों के अनुकूल रहे।
इसे भूला नहीं जा सकता कि मतपत्रों के जरिये होने वाले चुनावों में अराजकता और नतीजों में देरी के बाद भी किस तरह विभिन्न दलों का मतपत्र प्रेम रह-रहकर जागता रहता है। पिछले साल अगस्त में कांग्रेस समेत 11 विपक्षी दलों ने एक बैठक कर ईवीएम के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया था। इन दलों ने ईवीएम को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर खतरा बताया था। आपको शायद वह प्रसंग भी याद होगा, जब दिल्ली विधानसभा में खुद को इंजीनियर बताने वाले एक विधायक ने एक नकली ईवीएम के कलपुर्जे निकालकर यह सिद्ध करने की हास्यास्पद कोशिश की थी कि उसमें छेड़छाड़ की जा सकती है।
विधानसभा के भीतर यह हरकत इसीलिए गई थी ताकि चुनाव आयोग की कानूनी कार्रवाई से बचा जा सके। यह भी याद करते चलिए कि जब चुनाव आयोग ने ईवीएम में छेड़छाड़ कर सकने की चुनौती दी थी तो किस तरह किसी भी दल ने उसे स्वीकार करने का साहस नहीं दिखाया था। हालांकि चुनाव आयोग ने ईवीएम में छेडछाड़ की हरसंभव आशंका को खत्म करने के प्रयत्न किए हैं और वे कसौटी पर खरे भी साबित हुए हैं, लेकिन ऐसे दलों की कमी नहीं, जो जब-तब मतपत्रों के जरिये चुनाव कराने का राग अलापते रहते हैं। वास्तव में इन दलों का रवैया देश को बैलगाड़ी युग में ले जाने वाला है और वह भी तब, जब आज के युग में तकनीक के बगैर गुजारा असंभव सा है ।
चुनावी हिंसा के मामले में बंगाल आज वहीं खड़ा है, जहां तब था, जब वहां वाम दल शासन करते थे और इस अघोषित नीति पर चलते थे कि राजनीतिक विरोधियों को हर हाल में कुचल देना है। इस कुचलने में हत्या करना भी शामिल था । वाम दलों को हटाकर सत्ता में आईं ममता ने उनसे सबक सीखने के बजाय उन्हीं के तौर- तरीके अपना लिए । यही कारण है कि चुनावी हिंसा के मामले में बंगाल देश को लज्जित कर रहा है। हर किसी को यह याद होना चाहिए कि बंगाल विधानसभा के पिछले चुनाव के बाद ममता के पक्ष में नतीजे आने शुरू होने के साथ तृणमूल कांग्रेस समर्थक पुलिस की उपस्थिति में किस तरह राजनीतिक विरोधियों और यहां तक कि उन लोगों पर भी टूट पड़े थे, जिनके बारे में उन्हें संदेह था कि उन्होंने विरोधी दल को वोट दिया है। ऐसे लोगों के घर-दुकान जला दिए गए थे या लूट लिए गए थे। कई को तो मौत के घाट तक उतार दिया गया था। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की महिलाओं से छेड़छाड़ भी की गई थी। ऐसा भीषण आतंक मचाया गया था कि कई पीड़ित लोग जान बचाने के लिए असम भाग गए थे। इनमें से कुछ अभी तक अपने घरों को लौट नहीं सके हैं। ऐसा तो वहीं हो सकता है, जहां शासक ही कानून के शासन की धज्जियां उड़ा रहे हों ।
Editorial

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