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सरकारी नियंत्रण से मुक्त किए जाएं मंदिर
By EditorialPublished on
सनातन आस्था (Sanatan Astha) का केंद्र और भरतनाट्यम नृत्य (Bharatanatyam Dance) की उद्भव स्थली के रूप में विख्यात तमिलनाडु (Tamil Nadu) का चिदंबरम स्थित नटराज मंदिर सरकारी हस्तक्षेप के कारण एक बार फिर समाचारों में है । गत माह मंदिर में पुलिसकर्मियों के प्रवेश और पुजारियों के साथ धक्कामुक्की का मामला सामने आने के बाद राज्य के 'हिंदू धर्म दान एक्ट' यानी एचआरसीई मंत्री पी. शेखरबाबू ने धमकी दी है कि मंदिर को राज्य सरकार (State Government) अपने नियंत्रण में ले लेगी ।

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विकास सारस्वत
सनातन आस्था (Sanatan Astha) का केंद्र और भरतनाट्यम नृत्य (Bharatanatyam Dance) की उद्भव स्थली के रूप में विख्यात तमिलनाडु (Tamil Nadu) का चिदंबरम स्थित नटराज मंदिर सरकारी हस्तक्षेप के कारण एक बार फिर समाचारों में है । गत माह मंदिर में पुलिसकर्मियों के प्रवेश और पुजारियों के साथ धक्कामुक्की का मामला सामने आने के बाद राज्य के 'हिंदू धर्म दान एक्ट' यानी एचआरसीई मंत्री पी. शेखरबाबू ने धमकी दी है कि मंदिर को राज्य सरकार (State Government) अपने नियंत्रण में ले लेगी ।
चिदंबरम मंदिर तमिलनाडु के उन 38,000 मंदिरों में से एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद 2014 में सरकारी कब्जे से मुक्त कराया गया । वर्तमान विवाद तब उत्पन्न हुआ जब मंदिर के पोधु दीक्षितर पुजारियों ने 24 से 27 जून तक आणि तिरूमंजनम पर्व के मौके पर कनकसभा मंडप से दर्शनों को रोक कर इस आशय का बोर्ड मंदिर के भीतर टांग दिया। इसकी शिकायत पर बोर्ड हटाने के लिए पुलिस मंदिर में घुसी। पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में एक पुजारी के कपड़े फट गए और जनेऊ टूट गया। यह घटना तब घटी जब मंदिर में विशेष पूजा हो रही थी। राज्य सरकार का दावा है कि वह पुजारियों की मनमर्जी और भेदभावपूर्ण आचरण के खिलाफ श्रद्धालुओं के हित में खड़ी है। वास्तव में यह पूरा प्रकरण राज्य की द्रमुक सरकार के दुराग्रह को दर्शाता है। दरअसल, जिन चार दिनों के लिए कनकसभा मंच से दर्शनों को रोका जाता है उसके धार्मिक और व्यावहारिक कारण हैं। 1,100 वर्ष पुरानी यह परंपरा मंदिर की स्थापना से लेकर अब तक चली आ रही है। इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना के लिए पुजारियों को इस मंच की आवश्यकता पड़ती है।
हाल में सरकार ने कनकसभा मंच से सभी श्रद्धालुओं को दर्शन उपलब्ध कराने के आदेश दिए, परंतु मंदिर प्रबंधन ने पुरानी परंपरा को कायम रखने का निर्णय लिया। ऐसे निर्णय के लिए दीक्षितरों के पास वह कानूनी आधार है जिसके तहत प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप को सर्वोच्च न्यायालय ने वर्जित किया हुआ है। व्यावहारिक रूप से भी आणि तिरुमंजनम पर्व के दौरान इस मंच पर सभी श्रद्धालुओं को दर्शनों की अनुमति इसलिए असंभव है, क्योंकि इस छोटे से मंच पर मात्र दस-बारह व्यक्ति ही आ सकते हैं। वैसे भी मंच के बगल से श्रद्धालुओं को दर्शन की सुविधा हर समय रहती है और ऐसा नहीं कि विशिष्ट व्यक्तियों को मंच से दर्शन कराए जाते हों । यह प्रवेश सभी के लिए निषिद्ध होता है।
परंपरा का अतिक्रमण कर प्रबंध और व्यवस्था की दृष्टि से एक विकट स्थिति बनाने वाले शासनादेश की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पंचभूत मंदिरों में से एक चिदंबरम नटराज मंदिर को सरकारी कब्जे में लेने की जिद द्रविड़ विशेषकर द्रमुक राजनीति के उस द्वेष को परिलक्षित करती है जो ब्राह्मण एंव हिंदू विरोध की दुर्भावना से प्रेरित है । द्रविड़ आंदोलन ने प्रदेश में ब्राह्मण विरोध को एक प्रबल राजनीतिक भाव बना दिया है। चिदंबरम नटराज मंदिर पूरे प्रदेश में ब्राह्मण प्रबंधन वाला एकमात्र मंदिर है। ऐसे में इस मंदिर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई बड़ी आसानी से ब्राह्मण विरोधी भावनाओं को भुनाने में सहायक है । सनद रहे कि अंग्रेजी शासन में लाए गए मद्रास हिंदू धर्म दान एक्ट के बाद भी इस मंदिर को विशिष्ट संप्रदाय का प्रतिष्ठान मान सरकारी कब्जे से मुक्त रखा गया। वर्ष 1951 में भी इसे सरकारी नियंत्रण में लाने के प्रयासों को मद्रास हाई कोर्ट ने विफल कर दिया, लेकिन 2009 में करूणानिधि सरकार में यह मंदिर सरकारी प्रभुत्व में आ गया। हालांकि 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर के पुजारी और प्रबंधक पोधु दीक्षितर समाज को एक अति सूक्ष्म धार्मिक संप्रदाय मानकर उनके धार्मिक अधिकारों को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखने का आदेश दिया। दो वर्ष पूर्व सत्ता में आने के बाद से ही द्रमुक सरकार अलग-अलग हथकंडे अपना कर मंदिर प्रशासन को हथियाने की फिराक में लगी है। पिछले दो वर्षों में एचआरसीई मंत्रालय ने मंदिर प्रबंधन को आडिट के लिए बीस नोटिस भेजे हैं । विधिक बाध्यता न होने पर भी प्रबंधन तृतीय पक्ष आडिट के लिए तैयार है, परंतु सरकार सिर्फ विभागीय आडिट पर अड़ी है। अपने समक्ष पंद्रह लाख आडिट आपत्तियों को दरकिनार कर एचआरसीई केवल चिदंबरम मंदिर के पीछे पड़ा है। यही नहीं, मात्र 1,400 की आबादी वाले दीक्षितर समूह को बदनाम करने के लिए उन पर बाल विवाह और छुआछूत फैलाने के आरोप लगाए गए। कुछ माह पहले बाल विवाह के आरोप लगाकर दीक्षितर बच्चियों के कौमार्य परीक्षण के लिए प्रशासन पर अवैध और अपमानजनक परीक्षण कराए जाने के आरोप लगे थे। हालांकि प्रशासन ऐसे किसी परीक्षण से इन्कार कर रहा है, परंतु राज्यपाल और केंद्रीय बाल आयोग की टीम ने इन आरोपों की पुष्टि की है। सरकारी दुराग्रह की स्थिति यह है कि अखबार में विज्ञापन देकर लोगों से मंदिर प्रबंधन के खिलाफ शिकायतें मांगी गई हैं।
एचआरसीई के नियंत्रण वाले मंदिरों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। इन मंदिरों से मूर्ति, आभूषण, चंदन के पेड़ों आदि की चोरी की खबरें आती रहती हैं। मंदिरों से लगभग 1,200 मूर्तियां चोरी हो गई हैं और 50,000 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जे हो चुके हैं। मरम्मत और रखरखाव के अभाव में हजारों मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुके हैं। 1976 के बाद विभागीय खातों का बाह्य एजेंसी द्वारा आडिट नहीं हुआ है। वीआइपी दर्शन के नाम पर एचआरसीई ने स्वयं दर्शनार्थियों के बीच भेदभाव की स्थिति उत्पन्न की हुई है।
मंदिर कुप्रबंधन का पर्याय बन चुके इस विभाग द्वारा अन्य मंदिरों को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का उपहास है।
चिदंबरम मंदिर के संबंध में यह मंशा उन दीक्षितरों के संपूर्ण अस्तित्व को रौंदने का प्रयास है जिनका जीवन सिर्फ इस मंदिर की पूजा एवं प्रबंधन के इर्द-गिर्द घूमता है । यह विवाद यही दर्शाता है कि सत्ता का द्वेषपूर्ण हठ हिंदू मंदिरों को कभी भी अपने निशाने पर ले सकता है। इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब केंद्र सरकार समवर्ती सूची में निहित अधिकारों का उपयोग कर एक केंद्रीय कानून के माध्यम से मंदिरों को न सिर्फ सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करे, बल्कि कुप्रबंधन की स्थिति में उनके अस्थायी अधिग्रहण की मियाद भी तय करे ।

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