Pratahkal-As is the action, so is the result: Acharya Mahashraman

मुम्बई । नन्दनवन में तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) के आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने भगवती सूत्र आगम के माध्यम से प्रेरणा प्रदान करते कहा कि प्रश्न किया गया कि पाप कर्म पाप फल विपाक से संयुक्त होते हैं क्या? उत्तर दिया गया कि हां पाप कर्म पाप फल विपाक शक्ति से सम्पन्न होते हैं। इसी प्रकार पुण्य कर्म भी पुण्य फल विपाक शक्ति से सम्पन्न होते हैं। इन कर्मों के गूढ़ सिद्धांत को उन्होंने सरल दृष्टांत के माध्यम से कहा कि बहुत मनोज्ञ पदार्थ बना हो और उसमें विष मिला जाए, खाने में वह स्वादिष्ट तो है, लेकिन कुछ ही देर में उसका परिणाम आएगा कि उसे खाने वाले का प्राणांत हो गया। उस भोजन में मारने की क्षमता वाला विष मिला दिया गया तो वह स्वादिष्ट होते हुए भी प्राणघातक बन गया। इसी प्रकार उसी मनोज्ञ भोजन में विष के स्थान पर शरीर के समस्त विकारों का नाश करने वाली औषधि मिला दी जाए। औषधि के मिश्रण से मनोज्ञ पदार्थ को खाने में भले स्वाद न आए, किन्तु खाने के बाद शरीर के विकास दूर हो जाएं, शरीर में ऊर्जा का संचार हो जाता है। उसी प्रकार कर्म फल में ऐसी शक्ति सन्निहित होती है जो आदमी जैसा कर्म करता है, उसे कर्मों का विपाक होकर वैसा ही फल प्राप्त होता है। कोई झूठ बोल दे, छल कर ले, चोरी कर ले, एक बार तो उसे भले अच्छा लग सकता है, किन्तु उसका मूल परिणाम तो बुरा ही होता है। इसी प्रकार सत्कर्म, अहिंसा, सेवा, मैत्री, धर्म-ध्यान आदि कर्म के विपाक का फल भी सुखदायी होता है। अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही होता है। इसलिए आदमी को अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। 18 पाप रूपी कर्मों का परित्याग कर आदमी सत्कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। सत्कर्मों से आत्मा का कल्याण संभव है। पुण्य की पूंजी होती है तो आगे भी सुख की प्राप्ति संभव हो सकती है। इसके बाद उन्होंने ‘कालूयशोविलास’ का सरस शैली में संगान और आख्यान से लाभान्वित कराया। मुनि राजकुमार ने गीत के माध्यम से उपस्थित जनता को प्रेरित किया।

Editorial

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