Pratahkal - Article Update - The destiny of political familyism
शशि शेखर
महाराष्ट्र (Maharashtra) के सियासी प्रहसन में फिलहाल अजीत पवार ने बाजी मार ली है। क्या यह भारतीय राजनीति (Indian Politics) में अपराजेय माने जाने वाले शरद पवार (Sharad Pawar) के राजनीतिक (Political) अवसान का आरंभ है? उनकी सहयोगी शिवसेना पहले से इस दंश को भोग रही है। परिवार विशेष द्वारा संचालित राजनीतिक दलों की नियति में जैसे यह दुर्गति स्थायी तौर पर दर्ज होती है !
देवीलाल, मुलायम सिंह, नेहरू-गांधी, एनटी रामाराव, करूणानिधि आदि के परिवार इसके उदाहरण हैं। महाराष्ट्र की घटनाएं इस अंतहीन गाथा की नवीनतम कड़ियां भर हैं।
पहले शिवसेना की बगावत की बात कर लेते हैं। हर पार्टी में विद्रोह होते हैं, पर शिवसेना का बंटवारा अनूठा था। 1966 में स्थापना के समय से बाला साहेब ठाकरे के निवास स्थान, यानी 'मातोश्री' का दबदबा अलग मुकाम रखता था । सिर्फ शिवसेना से जुड़े लोग ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के तमाम गणमान्य लोग मदद की आस में मातोश्री पहुंचते थे। इस लंबी सूची में संजय दत्त और उनके पिता सुनील दत्त का नाम भी शामिल है। कांग्रेसी होने के नाते सुनील दत्त वैचारिक तौर पर बाला साहेब का विरोध करते आए थे, मगर मातोश्री को मना करने की आदत नहीं थी। आयु अधिक होने पर बाला साहेब ने अपना उत्तराधिकारी पुत्र उद्धव ठाकरे को चुना जबकि उनके भतीजे राज ठाकरे उनकी कार्यशैली के अधिक करीब थे। पुरानी रीति है कि पिता की गद्दी पर पुत्र विराजता है। यही वजह है कि शिवसेना के बड़े तबके ने उद्धव की अगुवाई मंजूर कर ली। राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली, पर मातोश्री का वर्चस्व कायम रहा।
इस अलगाव से काफी पहले वर्ष 1995 में शिवसेना को जब पहली बार सरकार बनाने का अवसर मिला, तब बाला साहब ने खुद कुरसी पर बैठने के बजाय मनोहर जोशी और नारायण राणे जैसे 'वरिष्ठ शिवसैनिकों' को अवसर दिया । यह समझदारी से उपजा फैसला था, ताकि गैर-जरूरी विवादों से बचा जा सके और अपना दबदबा भी अंतिम सांस तक कायम रह सके। उद्धव ठाकरे ने इसका उल्टा किया। भारतीय जनता पार्टी से मनमुटाव होने के बाद उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई। यहीं से मातोश्री के मालिक पर विवादों की छाया पड़नी शुरू हो गई कि उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे से समझौता कर लिया है।
दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद एकनाथ शिंदे सहित तमाम शिवसैनिकों को लगने लगा कि अब हमारा क्या होगा ? अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की हवा निकलती देख उन्होंने पहले से घात लगाकर बैठी भारतीय जनता पार्टी की ओर आकर्षित होना शुरू कर दिया। पिछले साल समूची दुनिया उस वक्त आश्चर्यचकित रह गई, जब 40 विधायकों ने विद्रोह कर दिया। उस समय शरद पवार की यह टिप्पणी वायरल हुई थी कि उद्धव में अनुभव की कमी है। वह इस बगावत को समय रहते जान न सके। समय का सिला देखिए, आज शरद पवार वही अभिशाप झेल रहे हैं। सन् 2019 में भी अजीत पवार ने उनसे छिटककर अलसुबह शपथ ली थी। बुजुर्ग पवार उस वक्त इस विद्रोह को नाकाम करने में कामयाब रहे थे, पर इस बार उनके दांव बेदम साबित हुए। परिवारवाद की दुर्गति की यह दूसरी मिसाल है।
याद करें, कुछ हफ्ते पहले शरद पवार ने इस्तीफा देने की घोषणा की थी और उसके बाद उनकी उम्मीद के अनुरूप भूचाल उठ खड़ा हुआ था । बाद में उन्होंने पुत्री सुप्रिया सुले और पुराने सहयोगी प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया था। अजीत पवार, जो कि शुरू से उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी होते थे, मन मसोसकर रह गए थे, पर गुजरी 3 जुलाई को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर उन्होंने एक बार फिर सबको चौंका दिया। गए बुधवार को वह यह साबित करने में सफल रहे कि प्रफुल्ल पटेल सहित पार्टी का सबसे बड़ा धड़ा उनके साथ है। इस फैसले से शिवसेना (शिंदे) के विधायकों में हड़कंप है। इनमें से एक भरत गोगावले की टिप्पणी गौरतलब है कि कल तक हम पूरी रोटी खा रहे थे, अब आधी से गुजारा करना होगा। तय है, महाराष्ट्र के सियासी अंतःपुर में हलचल मची रहेगी। राजनीति के रसियों को नई उठा-पटक के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए।
सवाल उठ रहा है कि क्या महाराष्ट्र के बाद बिहार की बारी है ?
बिहार में 9 अगस्त, 2022 को नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर एक बार फिर अपने पुराने साथी लालू यादव की पार्टी के साथ सरकार बनाने का फैसला किया था। वहां भी मामला बहुत कुछ महाराष्ट्र जैसा है, पर भारतीय जनता पार्टी के नुमाइंदे कह रहे हैं कि हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं है। क्या भगवा दल ने 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव सीधे अपने और अपने सहयोगियों के दम पर लड़ने का प्रण कर लिया है ? उत्तर प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी ने सीधी लड़ाई के जरिये यह मुकाम हासिल किया है। वर्ष 2012 के चुनाव में भगवा दल ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से सीधा मोर्चा लिया था। उस वक्त कुल 47 सीटें जीतकर उसे तीसरे स्थान पर सिमटना पड़ा था । आज उसके पास 255 विधायक हैं। पिछले लोकसभा चुनाव की कुल 80 में से 62 सीटें उसने जीती थीं, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए पार्टी ने अथक परिश्रम किया है।
बिहार संबंधी मूल प्रश्न पर लौटते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र जैसी घटनाओं की आवृत्ति संभव नहीं दिखती। वजह ? विधानसभा में एनडीए के पास कुल 82 विधायक हैं, यानी बहुमत के लिए उसे 40 सदस्यों के समर्थन की दरकार है। इसके लिए राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यू) के दो तिहाई सदस्यों को तोड़ना होगा। मौजूदा हालात में ऐसा मुमकिन नहीं लगता । मंडलवादी राजनीति में नीतीश कुमार और लालू यादव के कद और विधानसभा अध्यक्ष पद पर राजद से आने वाले अवध बिहारी चौधरी की मौजूदगी ऐसे किसी भी प्रयास को लगभग असंभव बना देती है।
यहां भूलना नहीं चाहिए कि नीतीश कुमार ने हमेशा असंभव को संभव कर दिखाया है। वह अलग-अलग संभावनाओं पर एक साथ काम करते हैं और उनमें से सर्वाधिक सटीक राह पर चल पड़ते हैं। हालांकि, वहां एक नई स्थिति पैदा हो रही है। दिल्ली की सीबीआई अदालत में पिछले सप्ताह लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और उनकी बहन मीसा भारती, रागिनी यादव सहित दर्जन से ज्यादा लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल हो गया है। कानूनन अब इन लोगों को अदालत में हाजिर होना होगा। अगर उन्हें तत्काल जमानत न मिली, तो राष्ट्रीय जनता दल की कमान वक्ती तौर पर कौन संभालेगा ? तेजस्वी यादव की पत्नी रेचल, भाई तेजप्रताप या कोई और ?
इस सवाल के जवाब में तमाम राजनीतिक प्रश्नों के उत्तर छिपे हुए हैं।

Editorial

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