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मुम्बई ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने स्वीकार की मंत्र दीक्षा
By EditorialPublished on
रविवार को नन्दनवन परिसर में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सम्मुख मंत्र दीक्षा कार्यक्रम के चलते मुम्बई की सभी ज्ञानशालाओं (Mumbai Gyanshala) के ज्ञानार्थी, प्रशिक्षक व प्रशिक्षिकाएं उपस्थित थे।

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मुम्बई । रविवार को नन्दनवन परिसर में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सम्मुख मंत्र दीक्षा कार्यक्रम के चलते मुम्बई की सभी ज्ञानशालाओं (Mumbai Gyanshala) के ज्ञानार्थी, प्रशिक्षक व प्रशिक्षिकाएं उपस्थित थे।
आचार्य महाश्रमण ने अपने प्रवचन में कहा कि चार गतियां बताई गई हैं। नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव - इन चार गतियों में संसारी जीव परिभ्रमण करता रहता है। सिद्ध जीव जन्म-मरण की परंपरा से मुक्त होकर परमात्मा बन गए हैं। मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर किसी भी गति में जा सकता है। नारकीय गति के जीव दस प्रकार की वेदना अनुभूत करते हैं। ये हैं- सर्दी, गर्मी, धूप, प्यास, खुजली, परवशता, ज्वर, दाह, भय और शोक। ऐसे में आदमी को मानसिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। चित्त शांत रहेगा तो कोई रास्ता भी प्राप्त हो सकता है। जो कार्य अपने वश में न हो, उसके लिए परेशान नहीं होना चाहिए। कोई समस्या हो भी जाए तो उसे समता भाव से सहन करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य तुलसी को श्वास की तकलीफ हो गई थी। उन्होंने मानों उससे मित्रता-सी कर ली। समस्या भी रही, उनका कार्य भी चलता रहा। श्वास की समस्या के बाद भी उन्होंने कितनी यात्राएं की। वेदना को शांति से सहन करने का प्रयास हो तो कर्म निर्जरा भी हो सकती है। आध्यात्मिक चिंतन और भगवती सूत्र से प्रेरणा लेकर परेशानी और कठिनाइयों में समता रखने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के बाद उन्होंने मुम्बई व आसपास की ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों को मंत्र दीक्षा प्रदान की। उन्होंने ज्ञानार्थियों को विविध प्रेरणाएं भी प्रदान करते हुए महाप्रयाण ध्वनि का प्रयोग कराया। ज्ञानार्थियों ने विधि अनुसार वंदन किया। आंचलिक संयोजिका अनिता परमार ने विचार रखे। साध्वीप्रमुखा ने विद्यार्थियों को अपने जीवन में बेस्ट बनने को प्रेरित किया। साध्वीवर्या ने भी उद्बोधित किया।
इसके बाद प्रवास व्यवस्था समिति द्वारा ट्रान्सफार्म कार्यक्रम का आयोजन हुआ। समिति अध्यक्ष मदनालाल तातेड़, कार्यक्रम के संयोजक डॉ. सौरभ जैन व डॉ. दिलीप सरावगी ने अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने अपनी प्रवृत्ति को असत् से सत् की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर तथा अच्छे चिंतन की ओर ट्रान्सफार्म करने की प्रेरणा प्रदान की। मुनि मोहजितकुमार ने आचार्यश्री ने नौ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

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