Pratahkal-India message to the world from the forum of Shanghai Cooperation
डॉ. रहीस सिंह : विश्व व्यवस्था बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही है और अभी यह सुनिश्चित नहीं हो पाया है कि यह बदलाव दुनिया को किस दिशा में लेकर जाएगा। कुछ देशों के साथ-साथ उन अंतरराष्ट्रीय मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं । यद्यपि विश्व को देखने, उसे समझने व उसे आगे ले जाने के सभी दृष्टिकोण भिन्न हैं, फिर भी अमेरिका, भारत, चीन और रूस जब एक मंच पर होते हैं, तब हम यह मान सकते हैं कि भारत (India) की विचारधारा और दृष्टिकोण सुरक्षा, समृद्धि और एकता की दृष्टि से अधिक प्रभावी होती है।
इसमें कोई संशय नहीं है कि आज के इस दौर में भारत ही है जो दुनिया को 'वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश दे सकता है, जो शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना को आगे रखकर इस क्षेत्र को 'विस्तारित परिवार' (एक्सटेंडेड फैमिली) के रूप में स्वीकार कर सकता है । पर क्या चीन ऐसा कर पाएगा? भारत दुनिया के बीच संयोजन एवं सहकार का उद्देश्य लेकर आगे बढ़ना चाह रहा है, लेकिन चीन और पाकिस्तान की भी ऐसी ही मंशा है ? भारत ग्लोबल साउथ के साथ प्रमुख पहलों के माध्यम से व्यापारिक सहमतियों से लेकर रणनीतिक साझेदारियों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, परंतु क्या चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) भी ऐसे उद्देश्यों को समेट पाएगी ? भारत 'सिक्योर' सिद्धांत के जरिये सुरक्षा (सिक्योरिटी), आर्थिक सहयोग ( इकोनमिक कोआपरेशन), संबद्धता जुड़ाव (कनेक्टिविटी), एकता ( यूनिटी), संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का आदर (रेस्पेक्ट फार सावरेंटी एंड टेरिटोरियल इंटीग्रिटी) तथा पर्यावरण (एनवायरनमेंट) के जरिये संवेदनशील बांडिंग पर फोकस कर रहा है। ये वे विषय हैं जो दुनिया को एक 'कामन फैमिली' की ओर ले जाना चाहते हैं। लेकिन क्या चीन भी?
वर्तमान में क्षेत्रीय संगठन विश्व को दिशा देने में कहीं अधिक निर्णायक साबित हो रहे हैं। यह एक तरफ वैश्विक बहुध्रुवीयता को ताकत प्रदान कर रहे हैं और दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था का विकेंद्रीकरण करते हुए क्षेत्रीय विकास का सशक्त प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यही कारण है कि दुनिया के छोटे-छोटे देशों से लेकर महाशक्तियों तक, सभी इन्हें उम्मीदों के मंच के रूप में देख रहे हैं। शंघाई सहयोग संगठन ऐसे क्षेत्रीय संगठनों में एक बेहद प्रभावशाली संगठन है जो अब दक्षिण एशिया, मध्य-पूर्व और यूरेशिया में प्रभावी भूमिका निभाता हुआ दिख रहा है। यह आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन तो है ही ( क्योंकि लगभग आधी मानव पूंजी से संपन्न होने के कारण शक्ति और बाजार की दृष्टि से यह दुनिया में सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हो रहा है), साथ ही यह भू- राजनीतिक (या भू-सामरिक ) तथा सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि भारत इस संगठन में अपनी संभावनाओं को किस प्रकार से तलाशता है और उन्हें पूरा करने की रणनीति अपनाता है? क्या भारत एससीओ के मंच से एकलदिशीय प्रगतिपथ पर आगे बढ़ता जाएगा या फिर इसे संतुलन और पुनर्संतुलन (बैलेंसिंग एंड रिबैलेंसिंग) से भी गुजरना पड़ेगा ?
भारत इस 23वीं बैठक के जरिये अपने संदेश देने में सफल रहा है। भारत ने विश्व यह विश्वास दिलाया कि पिछले दो दशकों में शंघाई सहयोग संगठन पूरे एशियाई क्षेत्र में शांति, समृद्धि और विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म के रूप में उभरा है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र में भारत के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक और 'पीपल-टू-पीपल' संबंध, हमारी साझा विरासत के जीवंत प्रमाण हैं । हम इस क्षेत्र को विस्तारित पड़ोसी (एक्सटेंडेड नेबरहुड) के रूप में ही नहीं, बल्कि विस्तारित परिवार (एक्टेंडेड फैमिली) के रूप में देखते हैं । इस संदेश के साथ ही भारत स्पष्ट किया कि उसने शंघाई सहयोग संगठन के पांच नए स्तंभ निर्मित किए हैं- स्टार्टप्स एंड इनोवेशन, ट्रेडिशनल मेडिसिन, यूथ एंपावरमेंट, डिजिटल इन्क्लूजन तथा शेयर्ड बुद्धिस्ट हेरिटेज । वास्तव में ये स्तंभ आज के विश्व के शांतिपूर्ण विकास के लिए प्रगतिशील स्तंभ की तरह हैं।
प्रधानमंत्री ने इस मंच का इस दिशा में भी ध्यान आकर्षित किया कि जब दुनिया के अन्य देश इस प्लेटफार्म से जुड़ने में दिलचस्पी ले रहे हों, तब यह आवश्यक हो जाता है कि शंघाई सहयोग संगठन का मूल फोकस मध्य एशियाई हितों और आकांक्षाओं पर केंद्रित रहना जरूरी हो जाता है। इस दृष्टि से कनेक्टिविटी बेहद महत्वपूर्ण है जो आपसी विश्वास में वैल्यू एडीशन करती है। इसे देखते हुए भारत ने ईरान की एससीओ सदस्यता का स्वागत करते हुए चाबहार पोर्ट के बेहतर उपयोग के लिए काम करने की इच्छा जताई। ध्यान रहे कि यदि चाबहार बंदरगाह (ईरान) के एक्सेस का अधिकार भारत को प्राप्त होता है तो यह भारत के लिए यूरेशियाई आर्थिक क्षेत्र हेतु प्रवेश द्वार (गेट-वे) का काम करेगा। भारत इसके जरिये इंटरनेशनल नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कारिडोर जुड़कर यूरेशियाई क्षेत्र के साथ सीधा कनेक्ट हो जाएगा। इससे भी आगे बढ़कर भारत ने मध्य एशिया के भू-आवेष्ठित (लैंड लाक्ड) देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय उत्तर - दक्षिण ट्रांसपोर्टी कारिडोर, हिंद महासागर तक पहुंचाने और इसकी पोटेंशियल को पहचानने की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।
एससीओ यदि भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का मंच बन रहा है तो साथ ही यह तमाम विरोधाभासी हितों का जमावड़ा है, जिसमें भारत को अपने रणनीतिक उद्देश्य निर्धारित कर अपने हितों को आगे ले जाना है। साथ ही यह भी सच है कि आज के समय में भारत 'इंडिया फर्स्ट' के साथ आगे बढ़ने का कौशल विकसित कर चुका है।
Editorial

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