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सीयेटल 07 : सामान नहीं आने की गहमा गहमी के बीच यात्रा पर निकले
By EditorialPublished on
खाने के बाद में तो लिखने बैठ गया और मुनीश व मयंक राजा को लेने एयरपोर्ट चले गये। उसके सामान को लेकर टेन्शन बना ही हुआ था। इन्हें गये। काफी देर हो गई थी. फ्लाईट लेट थी या और कोई नई मुसीबत आ गई के खयाल मन में आ रहे थे, तभी गाड़ी की आवाज आ गई।
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खाने के बाद में तो लिखने बैठ गया और मुनीश व मयंक राजा को लेने एयरपोर्ट चले गये। उसके सामान को लेकर टेन्शन बना ही हुआ था। इन्हें गये। काफी देर हो गई थी. फ्लाईट लेट थी या और कोई नई मुसीबत आ गई के खयाल मन में आ रहे थे, तभी गाड़ी की आवाज आ गई। उपर से देखा तो यहाँ लोग थे। सामान के बारे में पूछा तो मुनीश ने बताया कि सुबह आने वाली उड़ान में ही आयगा। मैंने कहा कि समय पर नहीं आया तो, इस पर राजा ने हस कर कहा कि नही आया तो एसे ही चलेंगे। सामान नहीं आने की चिन्ता की एक शिकन तक उसके चेहरे पर नहीं थी। उसकी एसी बेफिक्री पर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उ हांटा कि हवाई अड्डे समय पर पहुँच जाता तो एसी नोबत नहीं आती, तो उसे बताया कि वो तो बहुत पहले घर से निकल गया था मगर ट्राफिक इतना ज्यादा था कि एयरपोर्ट पहुँचते पहुँचते देर हो ही गई।
मुझे लाल-पीला होते देख उसे मजा आने लगा, अब वो सबको टोरन्टो की वह घटना बता कर मेरा मखौल उड़ाने लगा जब भयंकर बारिश के बीच मैं अकेला पड़ गया था। सबको उस वक्त का मेरे रूंआसे चेहरे की नकल उतार उतार हंसे करने लगा। मैं भी शर्मा कर झेंप गया और हल्का हो गया। यही सोच कर तसल्ली की कि सुबह जो होगा देखा जायगा सामान नहीं मिला तो जरूरी जरूरी चीजें नई खरीद लेंगे।
राजा को एक बात का ही दुख था, उसे ड्रिंक्स का शौक है इसलिये न्यूयार्क से दो बोतलें लेकर आया था, सामान नहीं आया तो ये उसी में रह जायेंगी। यह सुन मुनीश ने कहा कि वो तो वैसे भी जहाज में नहीं ले जाने देते हैं। क्रूज वालों के स्पष्ट निर्देश हैं कि सामान के साथ ड्रिंक्स की बोतलें लाने की अनुमति नहीं है, क्यूंकि ये सब जहाज पर बिकती हैं। यात्रियों को बाहर से लाने दें तो जहाज पर उनसे कौन खरीदेगा।
हमने सामान यहां खोला ही नहीं था इसलिये पेकिंग वगैरह की कोई झंझट थी ही नहीं। राजा ने सोने के लिये मयंक का पाजामा ले लिया। सुबह उठ कर नहाये धाये, नाश्ता किया। राजा का तो टायलेट किट भी सामान में ही रह गया था इसलिये उसने उंगली पर ही पेस्ट लेकर काम निपटा लिया, वैसे अतिरिक्त टूथ ब्रश थे मगर तब तक तो उसने मुँह धो लिया। यात्रा में हालांकि भारतीय भोजन मिलने वाला था फिर भी प्रीति और कादम्बरी ने मिलकर कुछ परांठे बना लिये थे, इन्हें मेरी चिन्ता लगी रहती थी। कादम्बरी इन्जीनियर है, बड़ी अधिकारी है, आधुनिका है फिर भी गृह कार्य में उसकी कुशलता देख में दंग रह जाता था। फुलके तो एसे फूल फूले बनाती थी कि भारत में भी खाने को नहीं मिलते थे।
घर से जल्दी ही निकल गये। निकलने से पहले हल्का खाना भी खा लिया था। जहाज में तो तीन-चार बजे तक मिलने वाला था इसलिये एहतियात के तौर पर अनिच्छा होते हुए भी थोड़ा थोड़ा सबने ले लिया। घर से सामान वगैरह गाड़ी में लाद कर सीधे एयरपोर्ट पहुँचे। राजा का सामान आया होगा कि नहीं इसी दुविधा में हमें छोड़ मयंक व राजा अन्दर डेल्टा के ओफिस में पहुँचे।
थोड़ी देर बाद जब दोनों को खाली हाथ लौटते हुए देखा तो हम धक्क रह गये। जरूर सामान नहीं आया है। अब क्या करेंगे। राजा ने पास आकर मुनीश से कहा कि उसका बोर्डिंग पास व सामान का टेग जो रात को उसने मुनीश को दिया था मांगा, बोला बिना इनके वो सामान नहीं दे रहा। सामान आ गया हैं मगर ये चीजें देनी पड़ेगी। सामान आ गया है, यह सुन कर सबने राहत की सांस ली। मुनीश गाड़ी से उतरा और कहा कि ये दोनों चीजें तो रात को ही उसने दे दी थी। मुनीश अब उन दोनों के साथ अन्दर गया।
थोड़ी देर बाद वे हाथों में सामान ले कर लौटे। मयंक ने बताया कि पहले जब हम सामान लेने गये थे तो हमसे सामान का टेग और बोर्डिंग पास मांगा। राजा ने अपनी जेबें सम्हाली तो ये थे नहीं, तभी याद आया कि ये दोनों चीजें तो रात को ही उसने मुनीश को दे दी थी। मुनीश ने बताया कि सामान के बारे में पता करने गये थे तब जिस अधिकारी ने कहा था कि सामान सुबह आयेगा उसी ने दोनों चीजें ले ली थी। उस अधिकारी ने सामान घर तक पहुँचाने को कहा था तभी बोर्डिंग पास व ग ले लिये थे।
सामान किस वक्त पहुँचायेगा इसका निश्चित समय नहीं बता पाया और अपन को समय पर निकलना था इसलिये उसे सामान भेजने को मना कर कह दिया था कि सामान हम ही आकर ले लेंगे। जल्दी जल्दी में बोर्डिंग पास सारी बात बताई तो उसने इधर उधर दराजे संभाली, एक जगह ये दोनों मिल तो उसने क्षमा मांगते हुए सामान हमारे हवाले किया।
यहा से हम सीधे बन्दरगाह पहुंचे। एक के बाद एक गाड़ियों की कार की कतार हमें उधर ही जाती मिली। पास पहुंचे तो देखा कि एक साथ चार किनारे से लगे हुए थे। किसी का नाम रूबी तो किसी का कुछ और था। हमारे जहाज का नाम एम्सटर्डम था और इसकी जहाज कम्पनीका नाम होलेण्ड अमेरिका क्रूज लाईन। यह जहाज अन्य जहाजों की अपेक्षा थोड़ा छोटा प्रतीत हो रहा था। अन्य जहाज तो 13-14 मंजिले नजर आ रहे थे मगर यह शायद 10-12 मंजिला ही था। मुझे जलन हो गई कि हमारा जहाज इतना ऊंचा क्यू नहीं दूसरे जहाज घेरे में भी हमारे जहाज से छेड़ से अधिक थे। उनमें यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा होती होगी।
बंदरगाह पर जगह जगह गाड़े खड़े थे, वे जहाज का नाम पूछ कर उसके लिए निर्दिष्ट मार्ग की तरफ भेज रहे थे। हम उसी तरफ बढ़े तो आगे एक जगह सभी उतर उतर कर अपना अपना सामान बाहर निकाल रहे थे। हमारे सामान के टैग और बोर्डिंग पास पहले ही मेल पर आ गये थे जो मुनीश ने प्रिन्ट कर हमारे सामन पर बांध दिये थे। टेग पर हमारा नाम, जहाज का नाम, डेक नम्बर, कमरा नं. वगैरह सब लिखा था। राजा के सामान के टैग मुनीश के पास थे जो बांधने थे। हमारी गाड़ी रुकते ही एक बड़ा सा अश्वेत आदमी सामान लादने की ट्रोली लेकर हमारे पास आया हमारा सामान उतार कर वह अपनी गाड़ी में लादने लगा। हम समझे कि यह सामान अन्दर तक पहुँचाने में मदद कर रहा है पर उसने सामान पर लगे टेग चेक करते हुए कहा कि सामान जहाज से सीधे आपके कमरों में पहुँच जायगा आपका चेक इन हो चुका है इसलिये वापस करवाने की जरूरत नहीं। नियमों की एसी सरलता देख मैं प्रसन्न हो गया।
उसे थोड़ी देर रुकने को कहा। राजा के सामान पर टेग भी लगाना था और उसके सामान में पड़ी ड्रिंक्स की बोतलों का क्या करना है यह भी सोचना था। राजा ने कहा कि हाथ के सामान में किसी को पता नहीं चलेगा इसलिये उसी में डाल देते हैं। इधर सामान ले जाने वाला जल्दी कर रहा था, उसकी ट्रोली बड़ी थी इसलिये अन्य यात्रियों का सामान भी उसे लेना था। जल्दी जल्दी में राजा की अटेची से दोनों बोतलें निकाली और दोनों दो अलग अलग हाथ के सामानों में डाल दी।

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