Pratahkal - Mumbai News Update - Ganga of knowledge started flowing in Nandanvan
मुंबई : तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) के आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने नन्दनवन के तीर्थंकर समवसरण में शुक्रवार को पाथेय प्रदान देते कहा कि आत्मा के भीतर राग-द्वेष के संस्कार भी होते हैं। राग और द्वेष समस्त कर्मों के बीज हैं। पाप कर्म का बन्ध राग-द्वेष के कारण ही होता है। प्राणी का किसी के प्रति या तो राग होता है, अथवा द्वेष होता है। साधना और अभ्यास से द्वेष का भाव चला भी जाए तो राग की भावना अवश्य होती है। अध्यात्म जगत में राग-द्वेष क्षीण करने अथवा उसे समाप्त करने की साधना होती है। राग-द्वेष को यदि एक शब्द में कहें तो मोह कह सकते हैं अथवा कषाय भी कह सकते हैं। आदमी को अपने जीवन में मोह का त्याग करने का प्रयास करना चाहिए। मोह को त्याग समता की साधना की दिशा में आगे बढ़ने वाले को कभी मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है। ध्यान, स्वाध्याय, जप, तप आदि से राग-द्वेष के भावों को क्षीण करने का प्रयास करना चाहिए। राग-द्वेष पर विजय प्राप्त करने वाला ही अर्हत, तीर्थंकर बन सकते हैं। उन्होंने चातुर्मास के दौरान धर्म, ध्यान, जप, तप से आत्मा का कल्याण करने की प्रेरणा प्रदान की। इस अवसर पर मुनि अनुशासनकुमार, जैन विश्व भारती के महामंत्री सलिल लोढ़ा व सरला भूतोड़िया ने अपने विचार रखे। मुंबई महिला मण्डल ने गीत का संगान किया।
Editorial

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