Pratahkal-YatraVrutant-Rail Yatra 7: Stuck in the bathroom at the Chicago railway station, lost consciousness
ट्रेन का टिकिट लिया था तब बताया गया था कि समूची ट्रेन में वाई फाई की सुविधा उत्पन्न है, मगर कन्डक्टर ने मना कर दिया था। मैंने उसे जब बताया कि आपकी वेब साईट पर तो यह सुविधा बताई गई है तो वह बोला- सुविधा तो है मगर सिग्नल ही नहीं मिलते तो क्या फायदा। मैं भारत से इन्टरनेशनल सिम लेकर चला था, उसमें भी सिग्नल नहीं आ रहे थे मगर जब कभी कोई बड़ा स्टेशन आने वाला होता तो सिग्नल शुरू हो जाते। इस दौरान मैं अपना ट्विटर वगैरा का काम निपटा लेता।
शिकागो स्टेशन पर भी मुफ्त वाई फाई सेवा जरूर होगी इसकी भी पूछताछ करनी ही थी। जब हमारे यहां के स्टेशनों तक में फ्री वाई फाई उपलब्ध किया जा रहा है तो यहां भी होना ही था। पूछताछ काउन्टर पर लाईन लम्बी थी, ट्रेन में गन्दे बाथरूमों के कारण सुबह से गया भी नहीं था, प्रेशर भी था, इसलिये पहले बाथरूम की तरफ कदम बढाए। बाथरूम के बाहर स्पष्ट संकेत नहीं थे या गहमा गहमी थी, मैं स्त्रियों के बाथरूम में घुस गया, यहां स्त्रियों की लम्बी लाईन देख कर अपनी भूल का अहसास हुआ और सौरी सौरी करता हुआ बाहर निकला। बाहर आ कर देखा तो एक स्त्री का चित्र स्पष्ट बना हुआ था, गलती मेरी ही थी, भगवान को धन्यवाद अदा किया कि किसी मुसीबत में नहीं फंसा। पास ही पुरुषों का बाथरूम था, इसमें कोई भीड़ नहीं थीं। हाथ में बैग था, उसे साथ लेकर ही एक स्टाल में बैठ गया। यह बात मैंने कनाडा में घूमने के दौरान विभिन्न पर्यटक स्थलों पर भी गौर की कि स्त्रियों के बाथरूमों में हमेशा पुरुषों की बनिस्पत ज्यादा लम्बी लाइनें थीं।
वापस जाकर में पूछताछ की लाईन में लग गया। लाईन लम्बी थी काउन्टर चार पांच थे इसलिये सब जल्दी जल्दी निपट रहे थे। एक काउन्टर एक ही व्यक्ति खड़ा था, बाकी सब वही 5 फुट दूरी पर, ज्यू ही कोई काउन्स खाली होता, सबसे आगे खड़ा व्यक्ति वहां चला जाता। शीघ्र ही मेरा भी गया। टेग बताये तो तसल्ली हो गई कि सामान लोस एन्जलेस में ही लेना है नहीं ट्रेन किस ट्रेक से जायगी इसकी घोषणा बाद में होगी, तब तक मुझे पास है स्थित प्रतीक्षालय में बैठने को कहा गया।
शिकागो यूनियन स्टेशन अमेरिका का बहुत पुराना रेल्वे स्टेशन है। यह देश का तीसरा सबसे व्यस्त स्टेशन है। पहले दोनों स्टेशन न्यूयार्क के पेन और ग्राम सेन्ट्रल हैं। यहां के बड़े बड़े हॉल और चमचमाते मार्बल के फर्श बरबस ही मन मे लेते थे। प्रतीक्षालय एसे ही बहुत बड़े हॉल में था जिसका नाम हेड हाउस था। प्रतीक्षालय यात्रियों से भरा पड़ा था। कई लोग सीटों पर सोये थे कई अपना सामान सीटों पर रख कर बैठे थे।
में खाली सीट की तलाश करते हुए एक कोने पर पहुँचा तो यहां एक और हॉल था मगर छोटा था, यहां काफी कुर्सियां व सोफे खाली थे, मैं अन्दर जाने लग तो वहां खड़े एक व्यक्ति ने मेरा टिकिट मांगा। मैंने टिकिट दिया तो बोला मैं इसमें नहीं जा सकता क्यूंकि मेरा टिकिट इकोनोमी क्लास का है। यह स्थान एक लाउन्ज था। मैं लौटने लगा तो उसने कहा कि अगर आप यहां की सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हो तो 20 डालर का टिकिट लेना होगा। मैंने पूछा क्या सुविधाएं मिलेंगी तो उसने वहां एक तरफ लगे बफे टेबल की तरफ इशारा करते हुए कहा कि खाने पीने की चीजें, फ्री वाई फाई तथा आपको आपकी ट्रेन में हमारा आदमी ले जाकर सबसे पहले बिठाएगा।
वाई फाई मुझे चाहिये ही था, खाने पीने का भी बहुत सामान था, 20 डालर तो आसानी से वसूल होने वाले थे, नहाने धोने की भी सुविधा थी। मैंने 20 डालर निकाल कर दे दिये। उसने कहा टिकिट आपको टिकिट खिड़की से लेना होगा, • सामान लेकर जाने लगा तो उसने कहा कि सामान आप यहां रख सकते हो। मैं अब मैं टिकिट खिड़की ढूंढने लगा। स्टेशन से लोकल ट्रेने भी चलती थी, इन्हें मेट्रो कहा जाता है। मैं इसकी खिड़की पर पहुंच गया तो मुझे एम ट्रैक की खिड़की पर जाने को कहा, वो कहीं नजर नहीं आई तो वापस पूछताछ की लाईन में ही लग गया। गनीमत हुई कि लाउन्ज का टिकिट यहीं मिल गया।
टिकिट लेकर मैं लाउन्ज में गया तो मुझे वाई-फाई का पास वर्ड दे दिया। थोड़ी देर आई पेड पर काम किया, इस दौरान लोगों को बफे से सामान ला ला कर खाते हुए देखा, एक महिला की ट्रेन का वक्त हो गया तो उसने दो तीन बिस्कुट के पैकेट, दो तीन कोक-सोडा की केनें अपने बेग में डाली और चल पड़ी। मैंने सोचा यह तो अच्छा है, 20 डोलर मंहगे नहीं पड़ेंगे। मैं भी डाइट कोक की एक केन, एक सेण्ड विच और आलू चिप्स का एक पेकेट उठा कर ले आया और इनका आनन्द लेते हुए काम करने लगा।
ट्रेन में तो नहाने को नहीं मिला था, यहां सुविधा थी तो नहा कर ताजा होने की सोची। लाउन्ज के बाथरूम एक तरफ बने हुए थे जहां अन्य कोई जा नहीं सकता था। मैं यहां पहुँचा तो कोई अन्य मौजूद नहीं था। मैं एक स्टाल में घुस गया, शावर भी इसी में था। निपट-नहा कर तैयार हुआ तो बाहर निकलने हेतु चिटकनी खोलने लगा, मगर चिटकनी खुले ही नहीं। मैंने फिर प्रयास किया - फिर वही हाल । नहा धो कर तैयार हुआ ही था मगर माथे पर पसीने की बून्दें उभर आई। एक बार फिर प्रयास किया मगर चिटकनी थी कि खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी।
मैंने स्टाल का दरवाजा जोर जोर से भड़भड़ाया मगर वहां कोई हो तो जवाब मिले। अब तो मैं बुरी तरह घबरा गया, बाहर नहीं निकल पाया तो क्या होगा। मैंने अपने आपको तसल्ली दी, स्टाल के दरवाजे के नीचे दो फीट तक का हिस्सा खुला होता है, ज्यादा से ज्यादा कुछ नहीं हुआ तो इस स्थान से ही लेटे लेटे बाहर निकल जाउंगा। मैंने आपको संयत किया - घबरा मत, शांति से एक बार और कोशिश कर वरना नीचे से सरक कर निकलना तो है ही। मैंने धीरे धीरे कोशिश की तो चमत्कार हो गया, चिटकनी फटाक से खुल गई। बाहर निकला तो उसी समय तीन चार लोगों ने अन्दर प्रवेश किया। मेरा तो काम हो गया था, मैं इन्हें मुस्कुराहट फेंकते हुए बाहर निकल गया। यहां यही शिष्टाचार है, इतने दिनों में यह सब सीख हुए गया था। कोई मिले तो उससे हंस कर वतराओ, कैसे हो पूछो, शुभकामना दो। अपने यहां विमान में पास पास बैठे यात्री तक सूमड़े बने रहते हैं और एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते तक नहीं, वतराना तो बहुत दूर की बात है।
दोपहर होने को आई थी, मेरे पास पूडी साग थे, मगर यहां इतना सब प्रचुरता से निशुल्क उपलब्ध था तो इसी पर हाथ साफ करने की सोची। केक, पेस्ट्रीयां, बिस्कुट, सेण्डवीच, पीज्जा वगैरा कई तरह की चीजें थी जो मैं खा सकता था। कई तरह के फलों के रस तथा संतरे, केले, सेब जैसे फल भी थे। पैसे वसूलने के चक्कर में डायबीटीज की चिन्ता किये बिना में कुछ जरूरत से ज्यादा ह गया। कैरी बैग के अलावा मेरे पास एक हाथ का झोला भी था, दो तीन कोक केने कुछ फल और चिप्स के ड़के सबके सामने ही इसमें डाल लिये मना करेगा तो निकाल कर रख दूंगा, किसी ने मना नहीं किया वरन देखने वालों मुस्करा कर सिर ही हिलाया।
लोस एजलेस की ट्रेन साढ़े तीन बजे रवाना होने वाली थी। हमें तीन यहां से प्रस्थान होने के लिये तैयार रहने को कहा गया। मैं तो तैयार ही था, थोड़ देर टी.वी. देखकर वक्त गुजारा, टी.वी. पर ओलम्पिक खेलों की तैयारियों को लेकर कोई कार्यक्रम आ रहा था। यहां अखबार तथा पत्रिकाएं भी पड़ी थी, जो चाहे उ कर ले जा सकते थे।
तीन बजते ही हमें एक तरफ एकत्र होने को कहा गया। मेरी ट्रेन में चढ़ने वाले अन्य यात्री भी यहीं थे। वृद्ध जनों के लिये एक बेट्री कार भी आ गई, मैं पेस्ट शर्ट पहने था इसलिये उतना बूढा नजर नहीं आ रहा था जितना पाजामा कुर्ते में नजर आता हूं इसलिये मुझे किसी ने कार्ट में बैठने को कहा ही नहीं। कुछ स्त्री-पुरुष जरूर उसमें बैठ गये। अब एक व्यक्ति हम सबको उसके पीछे पीछे आने के लिये कह कर आगे बढ़ गया।
Editorial

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