Pratahkal - Suresh Goyal
अमेरिका का इतिहास भले ही 400 साल पुराना माना जाता रहे मगर वास्तविकता यह है कि हजारों सालों से यहां आदिवासी रह रहे थे। सत्रहवीं शताब्दी मैं यहां अंग्रेजी, फ्रान्स, स्पेन व डच लोगों द्वारा अपनी अपनी कोलोनियां स्थापित की गई।
1733 में कुल 13 कोलोनियां थीं। 1775 में इन कोलोनियों और अंग्रेजों के बीच लड़ाई शुरू हुई। 4 जुलाई 1776 को इन 13 कोलोनियों के लोगों ने स्वयं को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करते हुए स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। जार्ज वाशिंगटन ने अंग्रेजों के खिलाफ अमरीकियों के संघर्ष का नेतृत्व किया और विजय प्राप्त की। जार्ज वाशिंगटन इस नव सृजित देश- यूनाईटेड स्टेट्स ओफ अमेरिका का पहला राष्ट्रपति बना। जिस शहर में अमेरिका की स्वतन्त्रता की घोषणा की गई थी वह फिलेडेल्फिया ही था जिसके बाहरी हिस्सों की ओर हमारी ट्रेन बढती जा रही थी और इस एतिहासिक शहर की झलक मात्र से मैं रोमांचित हुआ जा रहा था।
1861 में इस यू.एस.ए. से कई राज्य अलग हो गये और अपना सी.एस.ए. बना लिया- कोन्फेड्रेट स्टेट्स ओफ अमेरिका। अभी तक यू.एस.ए. में 34 राज्य हो गये थे, इनमें से 7 राज्य अलग हो गये, ये सभी राज्य दक्षिणी थे। दोनों अमेरिकाओं में युद्ध छिड़ गया जो अमेरिकन सिविल वार के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सी.एस.ए. में 4 राज्य और मिल गए जिससे इनकी संख्या 11 हो गई। 1865 में सी.एस.ए. की हार के साथ ही युद्ध समाप्त हो गया।
इस गृह युद्ध का मूल कारण दास प्रथा थी। दक्षिणी राज्य नहीं चाहते थे कि दास प्रथा का उन्मूलन हो इसीलिये वे अमेरिका से अलग हुए। युद्ध में 7-8 लाख लोग मारे गये। इतने अमेरीकी तो प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध दोनों में मिलाकर भी नहीं मारे गये थे। युद्ध की समाप्ति के साथ ही सी.एस.ए. खत्म हो गया। यू.एस.ए. पुनः एक हो गया और समूचे देश में दास प्रथा की समाप्ति हो गई।
अमरीकी शहर सब एक जैसे हैं, डाउन टाउन इलाकों में एक दूसरे से होड़ करती हुई ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं। किसी का कोई विशेष स्थापत्य हो तो उन्हें पहचान कर शहर जाना जा सकता है वरना सब एक समान। फिलेडेल्फिया भी एसा ही शहर था।
अमरीकी स्वतन्त्रता के स्मारक के रूप में यहां इनडिपेन्डेन्स हॉल के बाहर एक बहुत बड़ा ताम्बे का घन्टा लगा हुआ है जिसे लिबर्टी बेल कहते हैं। यह 30 फुट ऊंचा व 12 फुट व्यास का है। इसका वजन 900 किलो है। न्यूयार्क से चलने के बाद अब 3 राज्य हमने पार कर लिये थे। चौथा राज्य डेलावेयर था। जिसके स्टेशन विल्मींगटन के बाद एक अन्य राज्य मेरीलेण्ड के बाल्टीमोर को हमने पार किया। अगला स्टेशन देश की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. था। यहां ट्रेन कुछ देर रूकी। कई नये यात्री चढ़े। अब तक जो सीटें खाली थी वे धीरे धीरे भरा गई।
अमेरिका के संविधान निर्माता देश की राजधानी एक एसे स्थान पर बनाना चाहते थे जिस पर किसी भी राज्य का नियन्त्रण नहीं हो। इसके लिये एक अलग से केपीटल डिस्ट्रिक्ट बनाई गई जो पूर्णतया कांग्रेस के नियन्त्रण में रखी गई। अमेरिका में द्विसदनीय संसद को कांग्रेस कहते हैं। हमारे यहां दिल्ली में केजड़ीवाल की सरकार द्वारा केन्द्र के लिये जो समस्याएं उत्पन्न की जा रही हैं, संविधान निर्माताओं ने शायद उसकी कल्पना 250 साल पहले कर ली थी।
हमारे यहां भी दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश ही है, मगर इसे राज्य का दर्जा देने की मांग उठने के बाद वोटों की खातिर राजनीतिक संतुष्टिकरण करते हुए इसे विधान सभा और मुख्यमंत्री दे दिये गये। एक केन्द्र सरकार कभी भी किसी राज्य सरकार के शासन में नहीं रह सकती इसलिये दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। अगर किसी दबाव में एसा होता भी है तो नई दिल्ली सहित एक बहुत बड़े हिस्से को केन्द्र शासित क्षेत्र घोषित करना पड़ेगा। ऐसे में जो दिल्ली रह जायगी उसमें बचेगा ही क्या ? उसे तो यू.पी. या हरियाणा में विलीन करना ही बेहतर रहेगा। अगर फिर भी अलग से दिल्ली राज्य बनाना ही है तो यू.पी. व हरियाणा के सीमावर्ती हिस्सों को इसमें मिलाने से ही संभव हो पायगा।
अलग से केपीटल डिस्ट्रिक्ट बनाने के लिये मेरीलेण्ड तथा वर्जीनिया, दोनों राज्यों ने थोड़ी थोड़ी जमीन दान दी जिसे डिस्ट्रीक्ट ओफ कोलम्बिया नाम दिया गया तथा अमेरिका के संस्थापक व सिविल वार में अमरीकी सेना के नायक जार्ज वाशिंगटन के नाम पर वाशिंगटन कहा गया।
वाशिंगटन को ज्यादातर डी.सी. कहकर ही पुकारा जाता म्यूनिसीपलीटी है जिसका संचालन चुना गया मेयर करता है। इसके बावजूद संसद यह एक का शहर पर पूर्ण अधिकार है तथा म्यूनिसीपालीटी द्वारा पारित किसी भी कानून को यह उलट सकती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजड़ीवाल को यदि इस तथ्य से अवगत कराया जाय तो शायद केन्द्र के खिलाफ उनके तेवर कुछ पहें। दिल्ली की तरह वाशिंगटन से भी निचले सदन हाउस के लिये प्रतिनिधि चुना ढीले जाता है मगर उच्च सदन सीनेट के लिये कोई नहीं चुना जाता। दिल्ली की तरह ही शासन के तीनों अंगों व्यवस्थापिका (कांग्रेस), कार्यपालिका (राष्ट्रपति) तथा न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) के कार्यालय वाशिंगटन में हैं।
वाशिंगटन में अब तक मेरी बाजू में खाली पड़ी सीट पर एक महिला आकर बैठ गई। उसे सिनसिनाटी जाना था जो देर रात तक आने वाला था। मैंने उससे बातचीत करके वक्त काटने की सोची मगर मेरी बात उसके पल्ले बिल्कुल भी नहीं पड़ रही थी, मैं भी उसकी बात कुछ कुछ ही समझ पा रहा था।
अब हम एक अन्य राज्य वर्जीनिया में प्रवेश कर गये। ट्रेन के दोनों तरफ पहाड़ ही पहाड़ देख कर बरबस ही उदयपुर की याद आ जाती थी। रास्ता बहुत दुर्गम था फिर भी पहाड़ों को चीर कर रेल लाइनें डाली गई थी। हमारे यहां पहाड़ आये नहीं कि रेल योजना के प्रस्ताव ही नहीं बनते। समूचा मेवाड़ पहाड़ों से घिरा हुआ है इस कारण रेलों का संजाल है ही नहीं ये तो महाराणा फतह सिंह जी की दूरदृष्टि थी इसलिये उदयपुर तक रेल लाइन आ भी गई, वरना वर्तमान नेताओं की कुव्वत देखते हुए तो बांसवाड़ा की तरह उदयपुर आज भी रेल लाईन को तरस रहा होता। उदयपुर को ब्रोडगेज द्वारा अहमदाबाद से जोड़ने के वादे पिछले 40 सालों से सुन रहा हूं मगर दुर्गम मार्ग के कारण इसे आज भी अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। नेता लोग डींगें तो बड़ी बड़ी हांकते हैं मगर किसी में इतना दम नहीं कि इस योजना को शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण कराए। कांग्रेस वादे पूरे नहीं करती तो भाजपा आ जाती है, भाजपा भी पूरे नहीं करती तो फिर कांग्रेस आ जाती है। दोनों पार्टियां जनता को मूर्ख बनाते हुए सिवाय अपनी गोटियां फिट करने के कोई अन्य काम नहीं करती।
एक के बाद एक स्टेशन निकलते रहे। वर्जीनिया के शारलोटविल में गाडी थोड़ी देर रुकी और फिर दो स्टेशनों के बाद वेस्ट वर्जीनिया में प्रवेश कर गई।

Editorial

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