Pratahkal - Suresh Goyal
निरन्तर जल संकट के कारण जलदाय विभाग नागरिकों को अपनी पानी की खपत में 25 प्र.श. कमी करने के निर्देश देता है, कोई इसकी पालना नहीं करे तो भारी दंड भुगतना पड़ता है। विभाग का यह भी आग्रह रहता है कि घर के बाहर लगे लॉन को हटा कर वहां का निर्माण करवा लिया जाये। इसके लिये वे नागरिकां को निशुल्क सेवा देने के लिये भी तत्पर रहते हैं।
कपड़े सिर्फ हफ्ते में दो बार धोने, डिश वासर में कम पानी इस्तेमाल करने, शावर की गति कम रखने आदि के निर्देश जारी होते हैं मगर लोग आदत से मजबूर होकर इनकी ज्यादा परवाह नहीं करते जो पालन करते हैं उन्हें विभाग पानी के बिलों में केश रिकाड देकर प्रोत्साहित करता है।
चार सालों से सूखा पड़ रहा है तो चार सालों से केलिफोर्निया जंगल की आग के दावानल में भी धधक रहा है। इस साल तो जबर्दस्त अल नीनो की भविष्यवाणी से उम्मीद थी कि यह आग बुझ जायगी मगर सुपर अल नीनो नाम देने के बावजूद औसत से आधी वर्षा भी नहीं हुई। यहां इन दावानलों को भी समुद्री तूफानों की तरह नाम दिये गये हैं। गेय, रे, सीहार और सोबारेनीवाल आज भी धधक रहे हैं कि गूज, कोल्ड, क्लेटन जैसे दावानलों पर काबू पाया जा चुका है। ये सभी दावानल इसी साल के हैं। 27 अग तक इस साल राज्य में 4 हजार से ज्यादा जंगल की आग लग चुकी है जिनसे साढ़े सात सौ वर्ग कि.मी. वन क्षेत्र जल कर भस्म हो चुका है। इनमें 6 नागरिकों तथा एक अग्निशमन अधिकारी की मौत हो चुकी है।
जंगल के आस पास रहने वाली कई बस्तियां इस आग में स्वाहा हो जाती हैं। आग से क्षेत्र की मिट्टी भी नष्ट हो जाती हैं जिससे किसी भी प्रकार की खेती की संभावना नही रहती। बड़ी संख्या में पशु पक्षी भस्म हो जाते हैं। जब तेज हवाएं चलती हैं तो जंगल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आगाह किया जाता है कि वे कहीं भी जलती हुई आग नहीं छोड़ें आग लगने के भी कुछ संभावित क्षेत्र होते हैं. यहां विशेष धानी बरती जाती है।
दावानल पूरी दुनिया में धधकते हैं। हमारे यहां भी इस वर्ष उत्तराखंड के कई हिस्सों में कई दिनों तक जंगल धधकते रहे। हिमालय की तलहटी में लगे देवदार के वृक्ष जल्द आग पकड़ लेते हैं जिससे यह देखते ही देखते फैल जाती है। उत्तराखंड में समय पर अच्छी वर्षा हो गई इसलिये आग शांत हो गई। इससे पूर्व आपदा प्रबन्धन ने भारतीय वायुसेना के हेलीकोप्टरों में केनवास की बड़ी बड़ी बाम्बी बाल्टियां लटका कर अग्निशमन के भरपूर प्रयास किये।
ट्रेन में नहाने की कोई व्यवस्था नहीं थी स्लीपर क्लास में जरूर अलग से बाथरूम थे मगर इकोनोमी क्लास में नहीं। 3 दिन से नहाया नहीं था इसलिये थोड़ी देर आराम करने के बाद जी भर कर नहाने का आनन्द लिया। यह तो ध्यान ही नहीं रहा कि यहां पानी की कटौती है इस बीच पता चला कि जेट ब्लू एयर लाइन्स की एक ई मेल आई पड़ी है। खोल कर देखा तो प्रसन्न हो गया। एयर लाइन्स ने 31 जुलाई को हमारी बफेलो से न्यूयार्क उड़ान लेट हो जाने के मुआवजे के रूप में 225 डालर के कूपन भेजे थे। इस कूपन का उपयोग इन्हीं की विमान सेवा का टिकिट बुक कराने में हो सकता था। मेरा 12 अगस्त को लॉस एंजलेस से सीयाटल जाने और वहां से वापस 24 अग. को लौटने का टिकट पहले ही बुक हो चुका था। 28 अग को वापस भारत वापसी थी इसलिये कूपन एक तरह से बेकार ही था। 225 डालर मिलने की प्रसन्नता क्षणिक रही फिर भी यह संभावना थी कि इस कूपन का उपयोग अगर किसी अन्य के नाम से टिकिट बुक कराने के काम आ जाए तो मुनीश इसका उपयोग कर सकता है। विमान सेवा को इस आशय की मेल वापस भेज दी।
शाम हो गई थी। प्रीति कुत्ते को घुमाने ले जा रही थी, मुझ से पूछा तो मैं भी उसके साथ चल पड़ा। कुत्ते को घुमाने का तात्पर्य उसे शौच कराने ले जाने से है। कोलोनी में हर मकान के बाहर छोटे छोटे लॉन लगे थे। आस पास छोटे पार्क भी थे। यहीं घूमते घूमते कसे शोध कर देते थे। कोलोनी पुच कर प्लास्टिक की थैलीयां बंधी रहती हैं ज्यूं ही कुत्ता शौच करे, यहां से एक थैली निकाल उसमें मल भर लिया जाता है जिसे कचरा पात्र में डाल देते हैं। सभी कोलोनीवासी इस अनुशासन का पालन करते हैं मगर कोई कोई ढीठ भी होते है जो इसकी परवाह नहीं करते।
प्रीति ने बताया कि एक महिला अक्सर अपने कुत्ते को कोलोनी के अन्य घरी के बाहर बिठा देती थी और उसका मल वहीं छोड़कर आगे बढ जाती थी। एक बार कोलोनी की एक अन्य महिला ने उसका एसा करते हुए वीडियो बना लिया और सबको प्रेषित कर दिया तो लापरवाह महिला को बहुत लज्जित होना पड़ा। उसने आगे से ऐसा नहीं करने का वादा किया। यदि यह वीडियो अधिकारियों तक पहुँच जाता तो महिला को भारी दण्ड भुगतना पड़ता।
शीघ्र ही हम वापस घर लौट आये। शाम को प्रीति ने गरम गरम फुलके और उड़द की दाल का भोजन कराया तो उदयपुर की यादों में लौट गया। दाल तो वहां हर शाम हर घर का आवश्यक खाद्य है ही। इतने दिनों की थकान भी थी इसलिये जल्दी ही सोने चला गया। एल.ए. हमारे यहां से साढ़े ग्यारह घंटे पीछे है इसलिये रात को 3 बजे उसने का अलार्म लगा कर सो गया। ट्विटर लिखने का यही समय था।
अगले दिन रविवार था। सुबह नाश्ता वगैरह करके हम लोग समीप ही स्थित एक जैन मन्दिर में दर्शन करने गये। यह लॉस एंजलेस का सबसे पुराना जैन मंदिर है। यहां श्वेताम्बर तथा दिगम्बर दोनों ही धर्मावलम्बियों की मूर्तियां लगी हुई हैं तथा बड़ी संख्या में दूर दूर से धर्म प्रेमी दर्शन करने यहां आते हैं। मन्दिर विशाल प्रांगण में बना हुआ है। गर्भ गृह दूसरी मंजिल पर है जहां दोनों सम्प्रदायों की मूर्तियां दो तरफ लगी हुई हैं। गर्भ गृह की छत की नक्काशी एकदम दिलवाड़ा मंदिर की प्रतिलिपी है। इसे निहारते हुए एक पल भी यह महसूस नहीं होता कि हम भारत में नहीं वरन लॉस एंजलेस में हैं।
मन्दिर के निचले भाग में विशाल सभागृह है जहां आये दिन भारतीय समुदाय के कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। हम जिस वक्त मन्दिर में गये उस वक्त गुरू माई का प्रवचन चल रहा था। वे अपनी अमरीका यात्रा के दौरान कुछ दिनों से यहां प्रवचन कर रही थी। बाहर की तरफ उनके संस्थान का साहित्य, सोडीयां आदि प्रदर्शित थे जो खरीदे जा सकते थे।
मन्दिर के प्रशासकों में प्रीति की बड़ी बहन शशि के पति शैलेश जैन भी शामिल हैं। उन्होंने हमें चारों तरफ घुमाया और मन्दिर की गतिविधियों से अवगत कराया। शैलेश यहां पिछले 18 सालों से यूथ सेन्टर चला रहे हैं और बच्चों से तक की पाठशाला संचालित करते हैं। पाठशाला में बच्चों को धर्म तथा संस्कृति की आधारभूत बातें बताई जाती हैं जबकि युवाओं को जैन दर्शन व हिन्दू युवाओं दर्शन के बारे में बताया जाता है। ये कक्षाएं हर हफ्ते चलती हैं। इसके अतिरिक्त पब्लिक स्पीकींग की कक्षाएं अलग से चलती है जिनमें किशोर किशोरिया उत्साह से भाग लेते हैं और उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित होती है।
दोनों सम्प्रदायों के पर्युषण पर्वो के दौरान प्रतिदिन भारी संख्या में श्रावक एकत्र होते हैं। कई बार भारत से आये मुनियों या साध्वियों के प्रवचनों का लाभ भी इस दौरान मिल जाता है। महावीर जयंती भी यहां बहुत धूम से मनाई जाती है। इस अवसर पर एक परेड भी निकाली जाती है। परेड में आगे किसी प्रतिष्ठित जैन या हिन्दु संत को बिठाया जाता है। अधिकांश लोग अमेरिका के नागरिक बन चुके हैं इस कारण उनके बच्चों में किसी तरह के अलगाव की भावना विकसित नहीं हो इसलिये अमेरिका के स्वतन्त्रता दिवस 4 जुलाई तथा क्रिसमस पर भी यहां कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं जो खास कर के बच्चों के लिये ही होते हैं।


Editorial

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