Pratahkal - News Update - Helping hand of BJP's Shalkari students
विभुति नारायण राय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) की हालिया अमेरिका (America Yatra) यात्रा किस हद तक सफल रही और इसके फलस्वरूप दोनों देशों, खासतौर से भारत ने क्या खोया- क्या पाया, इसका दुनिया भर के मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा भिन्न दृष्टिकोणों से आकलन हो रहा है। इन सबके बीच एक पाकिस्तानी यू- टटूबर वजाहत एस खान का वी-लॉग (वीडियो ब्लॉग) मुझे कई अर्थों में इतना उल्लेखनीय लगा कि मैं इस यात्रा का आकलन उसके द्वारा रेखांकित की गई भारतीय उपलब्धि को केंद्र में रखकर करना चाहूंगा। इस वी-लॉग पर बात करने से पहले वजाहत की पृष्ठभूमि को जान लेना उपयोगी होगा। वह एक पाकिस्तानी पत्रकार हैं, जो फ्रीलांसिंग करते हुए अमेरिका के एक थिंक टैंक के साथ जुड़े हुए हैं। वह पाकिस्तानी फौज, खासतौर से पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ से अपनी निकटता के लिए जाने जाते थे। फिलहाल इमरान खान से सहानुभूति के चलते सेना के वर्तमान नेतृत्व से उनकी खटपट चल रही है और देश में उनके खिलाफ मुकदमे कायम हो गए हैं।
स्वाभाविक था कि वजाहत ने पाकिस्तानी हितों को ध्यान में रखकर यह वी-लॉग किया है, और उनकी चिंता के केंद्र में मोदी की यात्रा से अमेरिका में बढ़ता भारतीय प्रभाव और उसके फलस्वरूप अमेरिकी नीति-निर्धारकों के लिए पाकिस्तान का सिकुड़ता स्पेस था, पर इन सबके पीछे उन्होंने जो कारण तलाशा, वह बहुत महत्वपूर्ण है। वजाहत के अनुसार, इसके पीछे लोकतंत्र था और जिसका इस दौरे में नरेंद्र मोदी और जो बाइडन, दोनों ने भरपूर इस्तेमाल किया । यात्रा के दौरान लगभग हर मौके पर दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र का जिक्र आया यहां तक कि जब प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री को एक मुस्लिम पत्रकार ने उनकी सरकार द्वारा मुसलमानों के साथ की जाने वाली 'ज्यादती' को लेकर घेरने की कोशिश की, तो उनके बचाव में भी यही लोकतंत्र काम आया।
यात्रा के दौरान बार-बार दोहराया गया कि भारत और अमेरिका के डीएनए में ही लोकतंत्र है। डीएनए में लोकतंत्र का सबसे सरलीकृत अर्थ यह होना चाहिए कि दोनों समाज उठते-बैठते लोकतंत्र बरतते हैं। मगर क्या ऐसा है? यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि शासक जनता द्वारा चुने और बदले जाएं, मगर लोकतंत्र का मतलब सिर्फ एक निश्चित अवधि के बाद होने वाला चुनाव नहीं है। लोकतंत्र तो सत्ता की सबसे छोटी इकाई परिवार के अंदर से होते हुए सड़क से गुजरकर सत्ता के केंद्र संसद तक दिखना चाहिए। इस मामले में दोनों समाज अद्भुत विरोधाभासों से ग्रस्त नजर आते हैं। कोई शक नहीं कि ढाई सौ सालों से अधिक समय से क्रियाशील अमेरिकी लोकतंत्र सबसे पुराना है, पर यह भी सच है कि दुनिया भर में लोकतांत्रिक सरकारों को उखाड़ फेंकने और सैन्य तानाशाही को स्थापित करने में भी इसका योगदान जबर्दस्त रहा है। लगातार असुरक्षा बोध से ग्रस्त इसने हथियारों की दौड़ में दुनिया भर को मुब्तिला कर रखा है। जरूरत न होने पर भी केवल परीक्षण करने के लिए इसने आणविक हथियारों तक का इस्तेमाल किया। इंग्लिश, डच, फ्रेंच या स्पैनिश उपनिवेशवादियों की तरह भले इसने सुदूर भू-भागों में कॉलोनियां नहीं कायम कीं, मगर नव-उपनिवेशवादी नीतियों पर चलते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिये अपने आर्थिक उपनिवेश कायम किए। उसके सैन्य उत्पादन कॉरपोरेशन दुनिया भर की सरकारों की आर्थिक और विदेश नीतियां संचालित करते हैं। इन सबके बावजूद अमेरिका का आंतरिक लोकतंत्र उसके सबसे मुखर विरोधी रूस या चीन जैसे देशों के लिए बड़ी ईर्ष्या का विषय हो सकता है। इस देश का सत्ता - प्रतिष्ठान वियतनाम पर 'कार्पेट बॉम्बिंग' करता है, लेकिन जनता को यह सुविधा भी हासिल है कि वह लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरकर अपनी सरकार की युद्ध नीतियों का विरोध करे और उसे अपनी नीतियां बदलने को विवश कर सके। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि दुनिया में अमेरिका के धुर विरोधी दर्शन मार्क्सवाद और इस्लाम के पुरोधाओं की आमतौर से इच्छा होती है कि उन्हें या उनके परिजनों के अमेरिका में बसने के रास्ते खुल जाएं। इस तथ्य से भी कौन इनकार कर सकता है कि नोम चोमस्की भी अमेरिका में ही खुलकर काम कर सकते हैं, रूस या चीन में तो उनकी जगह जेल ही हो सकती थी । यही आंतरिक अंतर्विरोध अमेरिका की ताकत है। भारतीय लोकतंत्र ने भी अंतर्विरोधों से भरा डगमगाता सफर तय किया है। इसने हमें एक अद्भुत संविधान दिया, जिसने आधुनिक अर्थो में समानता की परिकल्पना की है। पहली बार सारे भारतीय धर्म, जाति, लिंग या संपत्ति के बावजूद कानून के सामने बराबर घोषित हुए। यह भाषिक सौंदर्य के लिए कहा जरूर गया, पर यह पूरी तरह से सच नहीं हो सकता कि भारत के डीएनए में लोकतंत्र है। लोकतंत्र की पहली शर्त नागरिकों की समानता है और वर्ण-व्यवस्था से संचालित समाज में यह संभव ही नहीं था। हां, यह जरूर उल्लेखनीय है कि असमानता की गहरी जड़ों के बावजूद बिना खून-खराबे के हमने नागरिक समानता लागू करने वाला संविधान स्वीकार कर लिया और पिछले 75 वर्षों में मंथर गति से ही सही, असमानता कम करने में लगे हुए हैं।
लोकतंत्र का एक चमत्कार अल्पसंख्यकों और राज्य के रिश्तों पर भी दिखता है। आरएसएस के पूर्व प्रमुख और भाष्यकार गुरू गोलवलकर ने अपनी पुस्तक विचार नवनीत में जिन तीन शत्रुओं की शिनाख्त की थी, उनमें दो- मुसलमान और ईसाई थे। मौजूदा संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान उनकी राय से मेल नहीं खाता । भागवत ने तो मस्जिदों में शिवलिंग ढूढ़कर तनाव पैदा करने की प्रवृत्ति की निंदा की है।
यह सही है कि भाजपा के मौजूदा सांसदों में एक भी मुसलमान नहीं, पर यह भी सही है कि लोकतंत्र ने पार्टी को प्रेरित किया है कि वह मुसलमानों व ईसाइयों में अपनी पहुंच बनाए। यह सब लोकतंत्र की ही देन है। लोकतंत्र सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं हो सकता, चुनावों के बीच भी उसे हमारे जीवन का अंग बनना जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका यात्रा में कई बार बहुलता, सहिष्णुता और सबका साथ-सबका विश्वास जैसे शब्द इस्तेमाल किए। वजाहत ने अपने वी-लॉग में माना है कि ये शब्द अमेरिकी कानों को बड़े मीठे लगते हैं और इसी जगह पाकिस्तान भारत से मात खा गया। मगर हमें उनका यह कथन भी याद रखना चाहिए कि इस ग्लोबल दुनिया में हमारे हर दावे को बड़े करीब से जांचा-परखा जाता है और हमें अपने कारनामों से भी उन्हें साबित करना होगा ।
Editorial

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