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भोग से योग चेतना की ओर करें प्रस्थान
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भायंदर में तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) के वर्तमान अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि आत्मा संसार में परिभ्रमण करती रहती है। जन्म के साथ ही मृत्यु भी सुनिश्चित हो जाती है। आत्मा के इस परिभ्रमण का कारण क्या है? शास्त्रों में इसका उत्तर प्रदान करते हुए कहा गया है कि कषायों अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभ, लालसा, इच्छाओं के कारण आत्मा इस संसार में परिभ्रमण करती रहती है।

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मुम्बई : भायंदर में तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Sangh) के वर्तमान अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि आत्मा संसार में परिभ्रमण करती रहती है। जन्म के साथ ही मृत्यु भी सुनिश्चित हो जाती है। आत्मा के इस परिभ्रमण का कारण क्या है? शास्त्रों में इसका उत्तर प्रदान करते हुए कहा गया है कि कषायों अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभ, लालसा, इच्छाओं के कारण आत्मा इस संसार में परिभ्रमण करती रहती है।
आदमी के भीतर भोग चेतना और योग चेतना (Yoga Consciousness) होती है। आदमी पदार्थों के भोग की इच्छा करता है। यह भोग चेतना आत्मा की चेतना का पतन करने वाली होती है। भोग चेतना के साथ मनुष्यों में योग चेतना भी देखने को मिलती है। कई लोग पदार्थों के भोग का मोह छोड़कर साधुत्व को स्वीकार कर लेते हैं। आदमी साधु न भी बन सके तो कितने गृहस्थ जीवन में भी जैन शासन के अनुसार कोई बारहव्रती बन जाते हैं तो कोई सुमंगल साधना में लग जाते हैं या कोई प्रतिमा साधना में लग जाते हैं। भोग चेतना और योग चेतना मानों दो मार्ग हैं। योग का भी अपना स्तर होता है। भगवान महावीर ने योग साधना की और भी लोग अपने-अपने ढंग से योग साधना करते होंगे, साधु भी योग साधना करते हैं किन्तु योग साधना में अनेक तारतम्य होते हैं। योग करते-करते जहां आयोग की अवस्था आ जाती है, वह योग साधना का चरम हो जाता है। आदमी को इसके लिए पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। सम्यक् दृष्टिकोण, सम्यक् आस्था और सम्यक् दर्शन हो और विश्वास हो जाए तो योग की चेतना का विकास हो सकता है। जीवन में ईमानदारी हो, कार्यों में नैतिकता, प्रमाणिकता रहे तो भी आत्मा का कल्याण संभव हो सकता है। उनके प्रवचन से पूर्व साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशा ने भायंदरवासियों को उद्बोधित किया।
तपागच्छ आचार्य प्रेमसूरि के शिष्य ज्योतिषाचार्य वज्रतिलक महाराज ने आचार्य महाश्रमण की अभिवंदना में अपनी अभिव्यक्ति दी। गुरुदर्शन करने वाली साध्वी चन्दनबाला ने सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया तो आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। संसारपक्ष में भायंदर से संबद्ध मुनि सिद्धकुमार ने आशीर्वाद प्राप्त किया।

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