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बीतने लगा भारत - मिस्र दूरियों का दौर
By EditorialPublished on
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) का दो दिवसीय दौरे पर काहिरा पहुंचना और वहां मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह (Abdel Fatah) अल सिसी के साथ मिलकर आपसी रिश्ते को हर दिशा में मजबूत करने का वादा करना अस्वाभाविक नहीं है ।

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विवेक काटजू
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) का दो दिवसीय दौरे पर काहिरा पहुंचना और वहां मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह (Abdel Fatah) अल सिसी के साथ मिलकर आपसी रिश्ते को हर दिशा में मजबूत करने का वादा करना अस्वाभाविक नहीं है । अल सिसी इसी साल जनवरी में गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में भारत आए थे, जिसमें दोनों शीर्ष नेताओं ने कई अहम फैसले लिए थे, और द्विपक्षीय रिश्ते का स्तर ऊंचा करके सामरिक साझेदारी विकसित करने पर सहमति जताई थी । अल सिसी की भारत यात्रा (India Trip) के पांच महीने बाद ही प्रधानमंत्री मोदी मिस्र के राजकीय दौरे पर पहुंचे, और राष्ट्रपति को जी-20 के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए बतौर विशेष अतिथि आमंत्रित भी किया। यह सम्मेलन इसी साल सितंबर में भारत में होने वाला है।
दुनिया में मिस्र का एक विशेष स्थान है। वह न सिर्फ अरब देशों में सबसे बड़ी आबादी वाला मुल्क है, बल्कि उसकी सभ्यता, संस्कृति और साहित्य का व्यापक प्रभाव अरब दुनिया के सभी हिस्सों पर पड़ा है। इस्लाम के नजरिये से भी उसकी एक खास हैसियत है । अल - अजहर विश्वविद्यालय के फतवे का खासा आदर किया जाता है। बेशक, मिस्र में कट्टरपंथी विचारधारा भी पनपी, जिसको इख्वान अल-मुस्लमीन (मुस्लिम ब्रदरहुड) ने बढ़ावा दिया। मगर अल- सिसी की हुकूमत और इससे पहले 1950 व 1960 के दशक में वहां के मशहूर नेता गमाल अब्देल नासिर ने पूरी कोशिश की कि ऐसी विचारधारा जड़ न जमा सके। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि नासिर, नेहरू और टीटो ने ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन को प्रोत्साहित किया था। यह वह जमाना था, जब भारत और मिस्र के संबंध में विशेष गर्मजोशी थी, और दोनों देश इस प्रयास में थे कि वे विश्व में औपनिवेशिक व्यवस्था को खत्म करके स्वतंत्र घरेलू व विदेश- नीति की राह चलें। दोनों देशों ने तब द्विपक्षीय आर्थिक और रक्षा सहयोग बढ़ाने का भी प्रयास किया, लेकिन इसमें उनको विशेष सफलता नहीं मिली थी ।
सन् 1967 में इजरायल के साथ युद्ध में मिस्र पराजित हुआ, जिसके कारण नासिर और मिस्र की साख अरब दुनिया व विकासशील देशों में कम हुई। सन् 1970 में नासिर के देहांत के बाद अनवर अल-सादात ने उनकी जगह ली । सादात ने मिस्र की विदेश नीति को एक नया मोड़ दिया। पहले तो उन्होंने 1973 में इजरायल से युद्ध के जरिये मिस्र की कुछ भूमि और साख वापस पाने की कोशिश की। इसमें कुछ सफलता मिलने के बाद उन्होंने मिस्र के संबंध सोवियत संघ (अब रूस) से कम करके अमेरिका से बढ़ाना तय किया। 1977 में उन्होंने अरब दुनिया और विश्व को तब चौंका दिया, जब उन्होंने इजरायल का दौरा किया।
मुझे वह दिन व्यक्तिगत रूप से याद है, क्योंकि उस जमाने में काहिरा में भारतीय दूतावास में नियुक्त था । इन घटनाक्रमों के बाद जहां अन्य अरब देश और कई इस्लामी मुल्कों ने मिस्र का बहिष्कार किया, वहीं दो साल बाद 1979 में अमेरिका की मध्यस्थता से मिस्र और इजरायल के संबंधों को सामान्य बनाने की राह भी तैयार हुई ।
इस कारणवश मिस्र और भारत के रास्ते जुदा होने शुरू हुए। यह वह दौर था, जब पश्चिम एशिया में भी बड़ा बदलाव आया, जिसके चलते सऊदी अरब व खाड़ी के देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बदल गई । ओपेक की स्थापना हुई और कच्चे तेल के दाम बढ़े। इन देशों को अपने निर्माण के लिए भारत की जरूरत महसूस हुई, और भारतीय व भारत की कंपनियां 1970 के दशक से ज्यादा से ज्यादा संख्या में वहां जाने लगीं। जाहिर है, इन सबके कारण भारत के हित स्वाभाविक तौर पर पश्चिम एशिया में मिस्र से कहीं ज्यादा सऊदी अरब, अमीरात, कुवैत व अन्य खाड़ी देशों के साथ जुड़े। निस्संदेह, गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक प्रकार से चलता रहा, लेकिन पहले जो करीबी भारत और मिस्र में थी, वह कम हो गई। इसी का नतीजा है कि 1997 के बाद नरेंद्र मोदी ही पहले प्रधानमंत्री हैं, जो मिस्र की द्विपक्षीय यात्रा पर गए।
अब कोविड महामारी और चीन की नीतियों के चलते विश्व व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ रहा है। बीते तीन दशकों से भारत की अर्थव्यवस्था का काफी विस्तार हुआ है, और हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का यह भी अनुमान है कि जल्द ही भारत की अर्थव्यवस्था तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगी। उद्योग के कई क्षेत्रों में भारत का लोहा अब दुनिया मानने लगी है। सूचना प्रौद्योगिकी में तो हमने एक विशेष स्थान बनाया है। भारतीय कंपनियां अब दुनिया के विभिन्न भागों में निवेश कर रही हैं। चूंकि मिस्र को अपनी बढ़ती आबादी के कारण निवेश की दरकार है, इस कारण भी अल-सिसी सरकार ने भारत की ओर फिर से देखना शुरू किया है। हालांकि, वहां आज भी इख्वान अल-मुस्लमीन का काफी प्रभाव है, लेकिन न सिर्फ अल-सिसी की हुकूमत, बल्कि वहां की कई राष्ट्रवादी संस्थाएं भी इसके खिलाफ हैं।
भारत चूंकि करीब तीन दशकों से इस्लामी कट्टरवादी तंजीमों के निशाने पर है, इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत और मिस्र की खुफिया सेवाओं व विदेश मंत्रालयों के बीच इन मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदा होगा । उन पर सहमति बनी होगी कि इस कट्टरपंथ को कैसे रोका जाए और इस्लामी कट्टरपंथी गुटों पर कैसे लगाम लगाई जाए? जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जमाने में भारत व मिस्र ने औपनिवेशिक व्यवस्था के खिलाफ और विकासशील देशों की उन्नति के लिए आवाज उठाई थी, वैसा ही कुछ आने वाले दिनों में भी हो सकता है। आज भारत वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है, और यहां के देश भी भारत की क्षमता को समझने लगे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने की एक चुनौ भारत और मिस्र के सामने है।
मिस्र का उत्तरी अफ्रीकी भूभाग में एक विशेष स्थान है। अरब और इस्लामी दुनिया में भी वह खास हैसियत रखता है। वह एक विकाशील देश भी है, और विकासशील देशों की प्रगति, जो भारत चाहता है, उस रास्ते पर वह हमारा सहयोग कर सकता है। दोनों देशों के रिश्तों में अब जो गहराई और तीव्रता आ रही है, उससे प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अल-सिसी निस्संदेह एक-दूसरे का सहयोग करना चाहते हैं। अब लग रहा है कि रिश्तों में दूरियों का दौर खत्म हो रहा है। दोनों देश, जो प्राचीन सभ्यताओं के भी प्रतीक हैं, एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।

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