Pratahkal - Article Update - Modi creating new standards abroad
शशि शेखर
21 जून, 2015, 2023 के 21 जून, बीच क्या फर्क है? आठ साल पहले जब योग दिवस के तहत देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने हजारों लोगों के साथ योगाभ्यास किया था, तब कुछ लोगों ने इसे एक सिया सी ‘शोमैन' का 'शो' बताकर हाथ झाड़ लिए थे। राजनीति, कूटनीति और सार्वजनिक जीवन में ऐसी 'शोमैनशिप' की कितनी अहमियत होती है, इसका नजारा इस वर्ष की इसी तारीख को न्यूयॉर्क (New York) में देखने को मिला।
उस दिन संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के मुख्यालय से सटे प्रांगण में मोदी ने 183 देशों के नुमाइंदों के साथ योगाभ्यास किया। यमुना किनारे बसी दिल्ली से हडसन के तीर पर स्थित इस प्रांगण तक की यात्रा निराली है। पहले के भारतीय प्रधानमंत्री अपने देश में राजनीति चमकाने के लिए विदेश का सहारा लेते थे। मोदी ने भारतीय अप्रवासियों और हिन्दुस्तानी परंपराओं के जरिये संसार के अन्य लोकतंत्रों की अंदरूनी राजनीति पर असर डालना शुरू कर दिया है। इस ताकत को आज तक उनके किसी पूर्ववर्ती ने नहीं पहचाना था ।
इसके आसार तभी दिखने लगे थे, जब 22 सितंबर, 2019 को अमेरिका के टेक्सास में 'हाउडी मोदी' का आयोजन किया गया था। बड़बोले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में हजारों भारतीयों को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली बार समूची दुनिया को जताया था कि यह भारतीय आकांक्षाओं की उड़ान के दिन हैं। मोदी जानते थे, अमेरिका में अप्रवासी भारतीयों की संख्या 45 लाख के करीब है। ये लोग वहां के सियासी, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में अहम भागीदारी निभाते हैं। यही वजह है कि पहले ट्रंप और अब बाइडन मोदी के जरिये इन मतदाताओं में अपनी दखल और मजबूत बनाने की इच्छा जताते हैं। लोकतंत्र में मतदाता और उनके मतदान से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं। इस नाते भारत और भारतवंशी अमेरिका सहित तमाम ताकतवर पश्चिमी देशों के लिए महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। अफ्रीका में भारतीय - अप्रवासी पहले से काफी मजबूत थे।
अमेरिका संसार का सबसे ताकतवर और हम सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। यह कहना आसान है कि विश्व के बदलते 'जियो पॉलिटिकल' परिदृश्य में अमेरिका को भारत की और भारत को अमेरिका की जरूरत है। ये रिश्ते लोकतांत्रिक मूल्यों ने नहीं, बल्कि वक्त की जरूरतों ने तय किए हैं, पर क्या अफगानिस्तान या रूस से अमेरिका के ऐसे संबंधों की तुलना की जा सकती है? सिर्फ जरूरतें जज्बातों के अभाव में अच्छे रिश्ते नहीं रच सकतीं।
मैं यहां पाकिस्तान का उदाहरण देने की इजाजत चाहूंगा । हमने इस मुल्क से चार युद्ध लड़े। उसने अभी भी हम पर छाया युद्ध थोप रखा है और हर बरस अरबों रूपये व बेशकीमती इंसानी जीवन इस जंग में होम होते हैं। इसके बावजूद इस मुल्क से हमारे सामाजिक रिश्ते खत्म क्यों नहीं हुए? भाषा, आचार-व्यवहार, खान-पान और इंसान से इंसान की नातेदारी हमेशा कायम रहती है। इसी तरह, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड सहित तमाम देशों में भारतवंशियों ने जिस तरह अपनी स्थिति मजबूत की है, उससे नई दिल्ली की हुकूमत और उनके हुक्मरानों के बीच बातचीत आसान हो गई है।
पिछले सप्ताह मैं सिंगापुर और मलेशिया में था। पांच दिनों के इस संक्षिप्त प्रवास में मेरा चार दुभाषियों से वास्ता पड़ा। सिंगापुर में जो लोग साथ चले, वे चीनी मूल के थे । उन्होंने बार-ब जोर देकर कहा कि हमारे यहां नौ फीसदी से अधिक तमिल हैं और उनका हमारे देश में बड़ा योगदान है। वे बातचीत में बार-बार प्रधानमंत्री मोदी का जिक्र ले आते थे। ऐसा पहले नहीं होता था। दरअसल, भारत या बाहर रहने वाले भारतवंशियों के मन में इस समय हिन्दुस्तान को लेकर गहरे आत्मविश्वास का भाव है। अगर भरोसा न हो, तो गुजरे गुरूवार की खबरें उठा देखिए । प्रधानमंत्री मोदी के योगाभ्यास के साथ दो खबरें और प्रमुखता से छपी थीं। भारतीय शेयर बाजार ने नया शिखर रचा था और सोने के भाव 360 रूपये गिर गए थे। पिछले तीन साल के आंकड़े गवाह हैं कि कोविड और रूस-यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। महंगाई व बेरोजगारी के आंकड़ों के बावजूद भारतीय बाजार और खरीदार आत्मविश्वास से लबरेज हैं। याद करें। 2008 में लेहमन ब्रदर्स के क्षरण के साथ कैसा हाहाकार मचा था? तमाम लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ी थीं। आशंकाएं थीं कि थमने का नाम नहीं लेतीं थीं। इन दिनों कोविड-19 के बाद भड़के रूस- यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को मंदी के मुंह में धकेल दिया है, पर भारतीय बाजारों में रौनक की वापसी हो गई है।
मलेशिया में स्थिति थोड़ी अलग है। क्वालालंपुर और मेकान में तमिल मूल के दुभाषिए मिले। मेकान में सागर नाम के गाइड ने रोचक किस्सा बताया। उन्होंने कहा कि एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा साथ- साथ आए थे। उस दौरान ओबामा ने प्रेस से बातचीत में कहा कि मोदी मुझसे ज्यादा ताकतवर और लोकप्रिय हैं। बहुतों ने इसे हंसी-ठिठोली मान लिया, लेकिन मलेशिया के तत्कालीन गृह मंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति से इस वक्तव्य के पीछे का मंतव्य पूछ लिया। ओबामा ने बताया कि मैं जिधर से गुजर रहा हूं, वहां मोदी के कट-आउट और तस्वीरें मिल रही हैं। मलेशिया के गृह मंत्री का जवाब था कि भारतीय मूल के लोगों ने अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए ऐसा किया है। यही वह कारगर 'शोमैनशिप' है, जिसकी चर्चा मैंने शुरू में की थी ।
कोई आश्चर्य नहीं कि कई अर्थशास्त्री आने वाले पंद्रह साल भारत के मानते हैं।
यकीनन, भारत और भारतीय मूल के लोगों ने यहां तक पहुंचने के लिए लंबी यात्रा तय की है। मुझे वे दिन आज भी याद हैं। वर्ष 1999 में भारतीय मूल के महेंद्र पाल चौधरी फिजी में प्रधानमंत्री चुन लिए गए थे। वह बड़ी मुश्किल से साल भर अपनी हुकूमत चला सके थे। अपनी सत्ता की पहली वर्षगांठ, यानी 19 मई के तुरंत बाद 27 मई, 2000 को उन्हें तथा उनके अधिकांश मंत्रियों को विपक्षी नेता जॉर्ज स्पेठ ने बागी फौजियों के साथ मिलकर बंदी बना लिया था। आप चाहें तो याद कर सकते हैं, तब तक आर्थिक उदारीकरण दुनिया में पैर फैला चुका था, पर भारतीयों को वाजिब सम्मान मिलना बाकी था। यही वजह है कि जब ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चुने गए, तो समूची दुनिया के भारतवंशियों को गर्व की अनुभूति हुई । जो देश 75 साल पहले हमें आर्थिक तौर पर कंगाल छोड़कर रूखसत हुआ था, उसकी बागडोर एक भारतवंशी के हाथ में है। आज दुनिया की शीर्ष 500 कंपनियों में से 25 के सीईओ भारतीय मूल के हैं। हर महाद्वीप की महत्वपूर्ण संसदों, मंत्रिमंडलों और महाकाय संस्थानों में भारतवंशियों का दखल है। जो 'इंडिया स्टोरी' कभी मनमोहन सिंह ने गढ़ी थी, उसे नई उड़ान देने का इससे बेहतर वक्त कोई नहीं हो सकता ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस काम को बखूबी कर रहे हैं।







Editorial

Editorial

Next Story