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आसान नहीं विपक्षी एकता की राह
By EditorialPublished on
फिल्म पूरब और पश्चिम का एक गीत है- कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पर तुमने किया । विपक्षी एकता प्यार का भी वही हाल है। सबकी इच्छा है कि भाजपा हार जाए और मोदी हट जाएं, पर कोई अपनी अंगुली कटवाने को तैयार नहीं है। सबके घर के दरवाजे दूसरों के लिए बंद हैं, लेकिन चाहते हैं कि दूसरों का दरवाजा हमारे लिए खुला रहे। समझना कठिन हो रहा है कि मिलने के लिए मिल रहे हैं कि अलग होने के लिए। इसी कड़ी में 23 जून को पटना में विपक्षी दलों की बैठक हो रही है। बैठक परस्पर अविश्वास के माहौल में हो रही है। क्षेत्रीय

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प्रदीप सिंह : फिल्म पूरब और पश्चिम का एक गीत है- कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पर तुमने किया । विपक्षी एकता प्यार का भी वही हाल है। सबकी इच्छा है कि भाजपा हार जाए और मोदी हट जाएं, पर कोई अपनी अंगुली कटवाने को तैयार नहीं है। सबके घर के दरवाजे दूसरों के लिए बंद हैं, लेकिन चाहते हैं कि दूसरों का दरवाजा हमारे लिए खुला रहे। समझना कठिन हो रहा है कि मिलने के लिए मिल रहे हैं कि अलग होने के लिए। इसी कड़ी में 23 जून को पटना में विपक्षी दलों की बैठक हो रही है। बैठक परस्पर अविश्वास के माहौल में हो रही है। क्षेत्रीय दल कांग्रेस की ओर संदेह की नजर से देख रहे हैं तो कांग्रेस (Congress) के मन से आवाज उठ रही है कि सिंहासन खाली करो कि कांग्रेस आती है। समस्या यह है कि यह एक ऐसी बारात है जिसमें कोई अपने को बाराती मानने को तैयार ही नहीं है। सबको लग रहा है कि दूल्हा तो हमें ही होना चाहिए। तो अघोषित रूप से तय हो चुका है कि जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) के विरोध में सबसे ज्यादा आक्रामक दिखेगा, वही दूल्हा बनने का हकदार होगा। इस चक्कर में मोदी को गाली देने की होड़ लगी है ।
विपक्षी दल (Opposition Party) अपने साथी दल के पर कतर कर आगे बढ़ना चाहते हैं। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। कर्नाटक जीतने के बाद वह अपने को 2024 का विजेता मानकर चल रही है। वह चाहती है कि बाकी दल उसकी पालकी के कहार बनें। इस चक्कर में कम से कम चार ऐसे दल हैं, जो कांग्रेस को अपने राज्य से बाहर रखना चाहते हैं। ये हैं- तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और भारत राष्ट्र समिति । विपक्षी एकता के लिए इनकी शर्त है कि कांग्रेस उनके राज्य में चुनाव न लड़े। अब जो बच जाते हैं, उनमें प्रमुख दल हैं- राष्ट्रीय जनता दल, जदयू, भाकपा (माले), माकपा, द्रमुक, राकांपा, शिवसेना (उद्धव बाल ठाकरे), झारखंड मुक्ति मोर्चा, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और अन्य छोटे- मोटे दल । इनमें से लगभग सभी का कांग्रेस से पहले से ही गठबंधन है।
किसी को कोई संदेह न रह जाए, इसलिए अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को चुनौती दे दी है। केजरीवाल ने दिल्ली सरकार (Delhi Government) की सेवाओं के संबंध में केंद्र सरकार के अध्यादेश के विरोध को भाजपा विरोध का लिटमस टेस्ट बना दिया है। जो इस अध्यादेश का विरोध करेगा, वही भाजपा (BJP) और मोदी विरोधी माना जाएगा। केजरीवाल ने यहां तक कह दिया कि विपक्षी एकता की बैठक का पहला एजेंडा ही यही होगा। बाकी दल कांग्रेस से सवाल पूछें कि वह इसके विरोध में है या समर्थन में? याद रहे कि कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर केजरीवाल को मिलने के लिए समय भी नहीं दिया। इस मुद्दे के जरिये केजरीवाल राहुल गांधी को घेरना चाहते हैं।
कांग्रेस को घेरने में केजरीवाल अकेले नहीं हैं । ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) अगर आएंगी तो कांग्रेस से ही सवाल करेंगी। यह कि बंगाल में उनके खिलाफ लड़कर कांग्रेस भाजपा की मदद क्यों करना चाहती है? अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) आजकल दीदी की अंगुली पकड़ कर चल रहे हैं, इसलिए उन्हें भी समस्या कांग्रेस से ही है। वह भी चाहते हैं कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश से दूर रहे। यही मांग चंद्रशेखर राव (K. Chandrashekar Rao) की भी थी। हालांकि वह पटना की बैठक में नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस इनकी बात मान ले तो 139 सीटों पर तो उम्मीदवार ही न खड़े करे। आंध्र, ओडिशा, दिल्ली और पूर्वोत्तर (असम को छोड़कर) से वह साफ ही है। बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में वह गठबंधन की जूनियर पार्टनर है। तो कांग्रेस के लिए वही राज्य बचते हैं, जहां उसकी भाजपा से सीधी टक्कर है। मतलब - गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम । इसके अलावा कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, पंजाब और हरियाणा । प्रश्न है कि क्या कांग्रेस इस कीमत पर विपक्षी एकता के लिए तैयार है। कर्नाटक की जीत के बाद उसका उत्साह सातवें आसमान पर है। वह कह रही है कि क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के लिए जगह खाली करनी चाहिए। यानी दोनों एक-दूसरे से जगह खाली करने को कह रहे हैं। कोई जगह देने की बात ही नहीं कर रहा ।
यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब लगभग सभी दल भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे हैं। ताजा शिकार उद्धव ठाकरे हुए हैं। सीएजी की रिपोर्ट कह रही है कि मुंबई नगर महापालिका में उद्धव के मुख्यमंत्री रहते वित्तीय अनियमितता हुई। महाराष्ट्र सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं। केजरीवाल के शीशमहल की जांच तेज हो गई है। तमिलनाडु में द्रमुक के एक मंत्री सेंथिल बालाजी प्रवर्तन निदेशालय के चंगुल में है तो दूसरे मंत्री और उनके बेटे को जांच में मद्रास हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली ।
विपक्षी दलों की जैसी बैठक पटना में हो रही है, उस तरह की पहले शायद ही कभी हुई हो । इससे पहले जब भी विपक्षी दल एकता के उद्देश्य से मिलते रहे हैं तो एक बात तय रहती थी कि सब कुछ न कुछ लेन-देन के लिए तैयार हैं। यहां जो लोग जुट रहे हैं, उनके मन में सिर्फ लेने की बात है, देने की नहीं। पहले की विपक्षी एकता गैर कांग्रेसवाद की राजनीति से संचालित होती थी । उस समय व्यक्ति से बड़ी पार्टी होती थी । अब जो पार्टियां और नेता मिल रहे हैं, उन्हें भाजपा से ज्यादा समस्या नहीं है।
उन्हें लगता है कि भाजपा से लड़ने में वे सक्षम हैं, पर उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लड़ने का तरीका समझ में नहीं आ रहा। विपक्षी दलों का यह सम्मेलन एक व्यक्ति से लड़ने की ताकत जुटाने के लिए हो रहा है, क्योंकि राजनीतिक लड़ाई से बड़ी समस्या हो गई है मोदी की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम । यह ऐसी समस्या है जिसका सामना भारत के विपक्ष ने कभी नहीं किया था । भ्रष्टाचार का मुद्दा हमेशा सरकार के खिलाफ बनता है। पहली बार दिखाई दे रहा है कि नौ साल बाद भी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप ही नहीं है। बहुत लोगों को उम्मीद थी कि जैसे संप्रग के समय दूसरे कार्यकाल में घोटाले पर घोटाला सामने आने लगा था, वैसा ही मोदी सरकार के साथ भी होगा, पर इस मोर्चे पर भी निराशा हाथ लगी।

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