Pratahkal - Lekh - Indian economy started flourishing
आलोक जोशी
पिछले महीने के आर्थिक आंकड़े देखें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार या बाजार में उछाल के संकेत साफ दिख रहे हैं। यह भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी राहत की खबर है। इसीलिए उसने इस बार भी ब्याज दरों में फेरबदल नहीं किया। यही नहीं, रिजर्व बैंक ने आर्थिक वृद्धिदर, यानी जीडीपी बढ़ने की दर का अनुमान भी कुछ ऊपर कर दिया है। हालांकि, इससे पहले ही पिछली तिमाही की जीडीपी बढ़ने का आंकड़ा लगभग सभी को चौका चुका था। जनवरी से मार्च के बीच भारत की जीडीपी पिछले साल के मुकाबले 6.1 प्रतिशत बढ़ी, जबकि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि यह आंकड़ा पांच फीसदी के आसपास रहेगा।
इस महीने की शुरूआत ऐसी अनेक खुशखबरियों से हुई है। उद्योगों के मूड का अंदाज लगाने वाला मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई या 'पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स' मई में 31 महीने की नई ऊंचाई पर पहुंच गया। ये वे लोग हैं, जो कारखानों या बड़े उद्योगों में खरीद के फैसले करते हैं, यानी अंदाज लगाते हैं कि कितने ऑर्डर हैं, कितना माल बनना है और उसके लिए कितने कच्चे माल की जरूरत होगी ? इसीलिए इनके मूड का इंडेक्स उस कारोबार का हाल बताने के लिए बिल्कुल मुफीद मीटर है।
दूसरा आंकड़ा था जीएसटी वसूली का । इसमें पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 12 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ। 1.57 लाख करोड़ रूपये की वसूली इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कई तरह के दबावों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती कायम है। चौपहिया वाहनों के कारोबार में मई महीने की अब तक की सबसे जबर्दस्त बिक्री दिखाई पड़ी और कुल 3,34,802 गाड़ियां फैक्टरियों से डीलरों तक पहुंचीं। जाहिर है, आगे बिक्री के लिए। इसमें एसयूवी की तगड़ी मांग और सेमीकंडक्टर, यानी इलेक्ट्रॉनिक चिप्स की आपूर्ति सुधरने का असर दिखाई पड़ा है। यह आंकड़ा भी पिछले साल के मुकाबले 13.5 फीसदी ऊपर है। दोपहिया गाड़ियों की बिक्री भी मई में बढ़ी है, जो एक अच्छा संकेत है, क्योंकि इसका अर्थ है कि निम्न मध्यवर्ग और उससे कम कमाई वाले लोग भी खरीदारी के लिए निकल रहे हैं।
खरीदारी और आपसी लेन-देन में नकदी की जगह यूपीआई का इस्तेमाल भी मई में नए रिकॉर्ड पर पहुंचा और यहां 14 लाख 30 हजार करोड़ का लेन-देन हुआ । यह भी ध्यान देने वाली बात है कि लंबी तकलीफ के बाद मई में महंगाई से काफी राहत मिली। थोक महंगाई का आंकड़ा तो शून्य से नीचे पहुंच गया, यानी वहां दाम बढ़ने के बजाय उनमें मामूली सी गिरावट दिखाई पड़ी। तीन साल में पहली बार थोक भाव में ऐसी कमी आई है। हालांकि, पिछले ग्यारह महीनों से थोक भाव बढ़ने की रफ्तार कम हो रही थी। लेकिन उसी दौरान खुदरा बाजार में जो महंगाई खाए जा रही थी, वह भी अप्रैल में पिछले डेढ़ साल के सबसे निचले स्तर 4.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। मई के आंकड़े आज आने वाले हैं । अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस बार इसमें और गिरावट दिखेगी। यह रिजर्व बैंक के चार प्रतिशत के लक्ष्य के और करीब पहुंच जाएगी।
बीते महीने की अच्छी तस्वीर दिखाने वाले आंकड़ों के साथ अब सवाल उठता है कि आगे की राह कैसी होगी? कुछ संकेत तो ये आंकड़े दे रहे हैं। मगर इसके साथ कुछ अन्य संकेत भी हैं। खबर है कि फ्रिज, टीवी, वॉशिंग मशीन और ऐसी दूसरी चीजें बनाने वाली कंपनियों में हलचल फिर तेज हो रही है। पिछली दिवाली के बाद से इस कारोबार में काफी मंदी का माहौल था और अलग-अलग चीजों की बिक्री में 15 से 30 फीसदी तक की गिरावट दर्ज हुई थी, लेकिन अब करीब-करीब सभी सेक्टर में कंपनियां उत्साह में हैं। त्योहारी सीजन में उनको जोरदार बिक्री की उम्मीद है।
इन कंपनियों की बिक्री बढ़ने का मतलब है, जरूरी सामान बनाने वाली कंपनियों का काम पहले से बेहतर होना । दुनिया भर के बड़े निवेशक भारतीय शेयर बाजार पर एक के बाद एक जोरदार रिपोर्ट निकाल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज नोमुरा ने कहा है कि चीन को अब साइड देनी पड़ेगी, क्योंकि भारत का वक्त आ रहा है। उनका कहना है, आने वाला दशक भारत का होगा।
जेफ्रीज के निवेश रणनीतिकार और दिग्गज निवेशक क्रिस वुड का कहना है, सेंसेक्स का एक लाख पर पहुंचना अब बस कुछ वक्त की बात है। उनका कहना है, भारतीय बाजार सभी चिंताओं और बाधाओं को पार करता जाएगा। गोल्डमैन सैक्स का कहना है, भारतीय शेयर बाजार में शेयरों के दामों को महंगा नहीं कहा जा सकता। इसके पीछे उसका तर्क है कि पिछले पांच साल में यहां बहुत सी कंपनियां 'मल्टीबैगर' बनी हैं, यानी उन्होंने अपने निवेशकों के पैसे को कई गुना करके दिखाया है। इसीलिए इस बाजार में फिलहाल बहुत संभावनाएं हैं।
पिछले दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में रही मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट। इसमें कहा गया है पिछले 25 साल से भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार दुनिया में दूसरे नंबर पर है और शेयर बाजार दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में है। इसके बावजूद पश्चिमी दुनिया के निवेशकों में भारत के प्रति बेरुखी दिखती है । उनका कहना है कि भारत अपनी क्षमता का पूरा नहीं इस्तेमाल करता, और यहां शेयर काफी महंगे हैं। रिधम देसाई और उनकी टीम ने इस धारणा को गलत बताया है और कहा कि ऐसे लोग पिछले दस साल में भारत में हुए बदलावों को अनदेखा करते हैं।
अर्थशास्त्री विवेक कौल ने मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट को एकतरफा बताते हुए लिखा कि ऐसा लगता है, यह सिर्फ शेयरों के भाव बढ़ाने के लिए लिखी गई रिपोर्ट है। उन्होंने अनेक तर्कों का खंडन किया है। हालांकि, वह भी मानते हैं कि तमाम चिंताओं के बावजूद अर्थव्यवस्था में सुधार के कई संकेत दिख रहे हैं, और यह भी कि अगर पश्चिमी देशों में ब्याज दरें कम होने का सिलसिला शुरू हुआ, तो एक बार फिर बड़ी मात्रा में विदेशी पैसा भारत आता हुआ दिखेगा।
अब मानसून कुछ देरी से भारत में प्रवेश कर चुका है। लेकिन आगे जिन चीजों से अर्थव्यवस्था का हाल तय होना है, उनमें यह भी एक बड़ा सवाल है कि पूरे देश में कब और कितनी बारिश होती है?
Editorial

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