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एका से पहले ही बिखराव के संकेत
By EditorialPublished on
आगामी आम चुनाव से पहले भाजपा (BJP) के विरूद्ध राजनीतिक गोलबंदी की कवायदें तेज हो रही हैं। इसमें शरद पवार (Sharad Pawar) को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह इस दिशा में कोई खाका बनाने का प्रयास करें। भाजपा के विरूद्ध मोर्चाबंदी की तैयारी को लेकर हाल में पवार ने तीन महत्वपूर्ण बातें की हैं। एक, विपक्षी मोर्चे के पास प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी होना आवश्यक नहीं। दूसरे, हम भाजपा के विकल्प की तैयारी कर रहे हैं। तीसरे, 23 जून को पटना में विपक्ष की बैठक में रणनीति बनेगी, जिसमें विपक्षी खेमे की ओर से संयुक्त उम्मी

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अवधेश कुमार : आगामी आम चुनाव से पहले भाजपा (BJP) के विरूद्ध राजनीतिक गोलबंदी की कवायदें तेज हो रही हैं। इसमें शरद पवार (Sharad Pawar) को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह इस दिशा में कोई खाका बनाने का प्रयास करें। भाजपा के विरूद्ध मोर्चाबंदी की तैयारी को लेकर हाल में पवार ने तीन महत्वपूर्ण बातें की हैं। एक, विपक्षी मोर्चे के पास प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी होना आवश्यक नहीं। दूसरे, हम भाजपा के विकल्प की तैयारी कर रहे हैं। तीसरे, 23 जून को पटना में विपक्ष की बैठक में रणनीति बनेगी, जिसमें विपक्षी खेमे की ओर से संयुक्त उम्मीदवारी को लेकर विचार होगा। वैसे, ये तीनों बातें ऐसी नहीं हैं जिन पर भाजपा विरोधी किसी नेता ने पहले बयान न दिया हो। हां, एक साथ तीनों बातें पहली बार किसी बड़े नेता ने कही हैं। इससे पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar, Bihar) ने भाजपा से नाता तोड़ने के बाद से ही लगातार भाजपा के विरूद्ध विपक्ष का एक ही उम्मीदवार खड़ा करने पर जोर दिया है। पटना बैठक भी उन्हीं की पहल पर होने जा रही है। दरअसल, पहले हिमाचल प्रदेश और हाल में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय से विपक्षी दलों को आगामी आम चुनाव को लेकर उम्मीद बंधी है। उन्हें लगता है कि वे एक साथ मिलकर चुनाव लड़ें तो मोदी के नेतृत्व में भी भाजपा को परास्त किया जा सकता है। इन नेताओं को समझना चाहिए कि राजनीति और चुनाव कल्पना का नहीं, अपितु यथार्थ का विषय है। कोई नेता या नेताओं का समूह किसी समीकरण या राजनीतिक तस्वीर की कल्पना कर ले तो आवश्यक नहीं कि वे उसे यथार्थ में भी बदल पाएं।
विपक्षी एकता के इन प्रयासों के बीच एक बड़ा सवाल यही है कि इस खेमे की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार कौन होगा। इसे लेकर पवार ने आपातकाल के बाद हुए चुनाव का उदाहरण दिया कि तब भी विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं था, लेकिन जनता पार्टी चुनाव जीती और अंतत: मोरारजी देसाई (Morarji Desai) प्रधानमंत्री बने । हालांकि, 1977 का उदाहरण देने वाले भूल रहे हैं कि आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष में साथ आने, जेल में बंद रहने और यातनाएं भुगतने के कारण विपक्षी नेताओं का परस्पर संवाद और संबंध बहुत गहरा हो चुका था। दूसरे, आंदोलन में जयप्रकाश नारायण जैसे दलीय स्वार्थों से परे एक ऐसा विराट व्यक्तित्व था जिसके प्रति सबके मन में सम्मान का भाव था। वही विपक्षी एकता और जनता पार्टी के गठन के मुख्य कारक थे । दक्षिण भारत के परे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) और कांग्रेसी (Congress) नेताओं के विरूद्ध कई कारणों से व्यापक आक्रोश भी था जबकि वर्तमान राजनीतिक तस्वीर बिल्कुल अलग है।
आज का राजनीतिक सच यही है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के समानांतर विपक्ष के पास कोई एक सर्वस्वीकार्य चेहरा नहीं। यहां तक कि जिन राज्यों में भाजपा का जनाधार मजबूत नहीं और उसे वोट नहीं मिलता वहां भी लोगों का बड़ा समूह प्रधानमंत्री मोदी को ही अपनी पसंद बता देता है। दूसरे, संगठन और जनाधार के स्तर पर भी भाजपा देश की इतनी बड़ी राजनीतिक शक्ति है, जिसके मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर कुछ दलों के गठजोड़ का टिकना आसान नहीं। भाजपा विरोधी दलों और नेताओं को इस जमीनी यथार्थ का आभास है, तभी वे अपने मतभेदों को परे रखकर एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद 1977 की तरह पार्टियों का विलय कर एक पार्टी बनाने की बात तो दूर अभी तक उनमें आरंभिक सहमति बनती भी नहीं दिख रही, जिससे लगे कि मोदी और भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त विपक्ष की कड़ी चुनौती मिलने वाली है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म- इतिहास और राष्ट्र आदि को लेकर जिस तरह का जागरण हुआ है, विपक्ष की कोई पार्टी भाजपा की तुलना में उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर सकती है। देश के बड़े समूह की मानसिकता यही है कि व्यक्तिगत जीवन में थोड़े कष्ट भी उठाने पड़ें तो हिंदुत्व, राष्ट्रीयता और धर्म-संस्कृति आदि के मुद्दों पर समझौता नहीं कर सकते। ऐसी घनीभूत मानसिकता वालों के समक्ष वर्तमान राजनीति में भाजपा ही एकमात्र विकल्प है। इसी कारण कर्नाटक में सत्ता विरोधी रूझान और असंतोष के बावजूद भाजपा के मतों में कोई कमी नहीं आई। राज्यों के स्तर पर कुछ पार्टियां, नेता और गठबंधन भले ही मजबूत दिखाई पड़ सकते हैं, लेकिन स्मरण रहे कि लोकसभा चुनाव के मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकता सर्वथा भिन्न होती है। मोदी सरकार ने हिंदुत्व (Hindutva) के मुद्दे पर मुखर होकर काम करने के साथ-साथ सामाजिक न्याय पर ऐसे ठोस काम किए हैं, जिनसे एक बड़ा समर्थक वर्ग तैयार हुआ है। आदिवासियों से लेकर दलितों में भाजपा की गहरी होती पैठ इसका सशक्त उदाहरण है।
इसकी तुलना में विपक्ष कहां खड़ा है? राज्यों में किसी क्षेत्रीय दल का राजनीतिक रास्ता कांग्रेस काट रही है तो कहीं कांग्रेस का क्षेत्रीय दल | किसी सहमति बनने से पूर्व ही तृणमूल (All India Trinamool Congress) ने एलान कर दिया है कि यदि कांग्रेस चुनाव में वामपंथी दलों (left wing) के साथ गठजोड़ करती है तो वह उसका समर्थन भूल जाए। आम मतदाताओं को भी इसका आभास है कि विपक्षी नेताओं के भीतर एक दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान का अभाव है। इसी कारण वे किसी को प्रधानमंत्री पद के रूप में अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। जनता ने गठबंधन वाली अस्थिर सरकारों का दौर भी देखा है और उसके दुष्परिणाम भी भुगते हैं। ऐसे में राजनीतिक स्थिरता भी एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे में क्या विपक्षी दलों का कोई नेता जनता को यह विश्वास दिलाने में सक्षम होगा कि वे राष्ट्रीय स्तर पर स्थिर एवं टिकाऊ सरकार देने में सक्षम होंगे?

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