Pratahkal-Article-Uniform Civil Code is the need of the hour

हृदयनारायण दीक्षित : कानून निजी नहीं हो सकते। किसी पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में विश्वास आधारित सांप्रदायिक समूहों के लिए निजी कानूनों का कोई औचित्य नहीं है। संविधान निर्माताओं ने प्रत्येक नागरिक के लिए समान नागरिक संहिता का कर्तव्य राष्ट्र राज्य को सौंपा है । राष्ट्र राज्य का यह कर्तव्य संविधान के नीति निदेशक तत्वों में है। नीति निदेशक तत्व न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। ऐसी संहिता राष्ट्रीय एकता के लिए भी अनिवार्य है। विधि आयोग ने हाल में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) के संबंध में देश के सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों से सुझाव मांगे हैं। विधि आयोग का यह कार्य प्रशंसनीय है, पर कांग्रेस ने इसका विरोध करते हुए इसे मोदी सरकार का ध्रुवीकरण एजेंडा बताया। जबकि तुष्टीकरण कांग्रेस की अपनी नीति है। ध्रुवीकरण का आरोप इसी का विस्तार है। कांग्रेस दीर्घ काल तक सत्तारूढ़ रही है । उसे बताना चाहिए कि उसने समान नागरिक संहिता लागू करने के संवैधानिक कर्तव्य पालन की दिशा में क्या कदम उठाए ?
समान नागरिक संहिता बहुत पहले से राष्ट्र का स्वप्न रही है। सांप्रदायिक निजी कानून महिला अधिकारों और सशक्तीकरण में बाधा हैं । स्वाधीनता संग्राम के समय राष्ट्रवादी नेता वैकल्पिक सरकार और उसके संचालन के लिए नए संविधान को लेकर सजग थे। तब देश का संचालन भारत शासन अधिनियम, 1919 से होता था। ब्रिटिश सरकार ने नवंबर, 1927 में इस अधिनियम की उपयोगिता और प्रभाव पर रिपोर्ट देने के लिए 'साइमन कमीशन' बनाया था । आयोग में कोई भी भारतीय नहीं था । राष्ट्रवादी आंदोलनकारी इससे क्षुब्ध थे । ब्रिटिश सत्ता ने इस असंतोष को दूर करने के बजाय आंदोलनकारियों से पूछा कि, 'क्या वे अपने देश के लिए कोई संविधान बना सकते हैं?" यही सवाल 1925 में भारत सचिव विरकेनहेड ने इंग्लैंड की लार्ड सभा में उठाया था । राष्ट्रवादी नेताओं ने चुनौती स्वीकार की। कांग्रेस के मद्रास सम्मेलन में एक सर्वदलीय सम्मेलन को वैकल्पिक संविधान बनाने का काम सौंपा गया। सम्मेलन ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, अली इमाम, तेज बहादुर सप्रू और सुभाष चंद्र बोस सहित नौ वरिष्ठ नेता थे । इसे 'नेहरू समिति' कहते हैं। समिति ने 19 मौलिक अधिकार बनाए। इनमें महिलाओं को समान अधिकार देने का मौलिक अधिकार चर्चित था । राज्य को मजहब-रिलीजन से मुक्त रखने की बात भी थी। नेहरू रिपोर्ट के तमाम अंश समान नागरिक संहिता से भी जुड़े हैं। कांग्रेसी नेतागण अपने वरिष्ठों की भावनाओं के भी विरोधी हैं। राष्ट्रवादी आंदोलन का मौलिक विचार जाति, पंथ, लिंग और मजहब के भेद का विरोधी था । संविधान सभा का भी केंद्रीय विचार यही था। 23 नवंबर, 1948 को सभा में समान नागरिक संहिता पर तीखी बहस हुई थी। मोहम्मद इस्माइल ने कहा कि, 'देश में समन्वय के लिए यह अपेक्षित नहीं है कि लोगों को उनके निजी कानून छोड़ने के लिए बाध्य किया जाए।' नजीरूद्दीन अहमद ने कहा कि, 'प्रत्येक धार्मिक समुदाय के विशेष धार्मिक कानून एवं विशेष व्यवहार विषयक कानून भी होते हैं। धार्मिक विश्वासों एवं आचरण से उनका संबंध होता है। एक विधि बनाते समय इन धार्मिक कानूनों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए । संप्रदाय विशेष के धार्मिक कानूनों को उस संप्रदाय की सहमति के बिना नहीं बदला जा सकता।' महमूद अली बेग ने कहा कि, 'हिंदुओं में विवाह एक संस्कार होता है। यूरोप में यह स्थिति भिन्न है । मुसलमानों में कुरान के अनुसार संविदा जरूरी है। ऐसा नहीं किया जाता तो विवाह वैध नहीं होगा । मुसलमान 1350 वर्षों से इस कानून पर चलते रहे हैं। यदि विवाह की कोई अन्य प्रणाली बनाई जाए तो हम उसे मानने से इन्कार कर देंगे।' इस पर केएम मुंशी ने कहा कि संहिता को अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय बताया जा रहा है। क्या यह वास्तव में न्याय है? किसी भी उन्नत मुस्लिम देश में अल्पसंख्यक जाति के निजी कानूनों को इतना अटल नहीं माना जाता कि समान नागरिक संहिता बनाने का निषेध हो ।
तुर्की अथवा मिस्र में किसी अल्पसंख्यक को ऐसे अधिकार नहीं दिए गए। कुछ हिंदू भी समान नागरिक संहिता नहीं चाहते। उत्तराधिकार आदि के निजी कानून उनके धर्म का भाग हैं। तरह आप महिलाओं को समानता नहीं दे सकते। मुंशी ने मुसलमानों से कहा कि 'पूरे देश के लिए एक समान संहिता क्यों न हो? मुस्लिम मित्र समझ लें कि जितना जल्दी हम अलगाववाद की भावना को भूल जाएंगे। उतना ही देश के लिए अच्छा होगा।' अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कि जब अंग्रेजों ने इस देश पर अधिकार किया तब उन्होंने कहा, 'हम इस देश में एक ही आपराधिक कानून बना रहे हैं। यह सभी नागरिकों पर लागू होगा। क्या मुसलमानों ने अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया?' डा. आंबेडकर ने कहा, 'यहां दंड विधान में एक विधि है । संपत्ति हस्तांतरण कानून भी पूरे देश में लागू है। यह कहने का कोई लाभ नहीं कि मुस्लिम कानून अटल हैं। 1935 तक पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में शरीयत कानून नहीं था । उत्तराधिकार आदि में हिंदू कानूनों का अनुसरण होता था। 1937 पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के अलावा शेष भारत- जैसे संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और बंबई में उत्तराधिकार संबंधी हिंदू कानून मुस्लिमों पर लागू था।' विविधता की बातें बहुत होती हैं। विविधता में एकता राष्ट्र की प्रकृति है । गोवा में ईसाई पंथ मानने वालों की संख्या काफी है, पर यहां समान नागरिक संहिता लागू है। अमेरिका में विश् व के तमाम पंथिक समूहों के नागरिक रहते हैं। वहां समान नागरिक संहिता लागू है।
किसी भी सांप्रदायिक समूह (Communal Group) को इससे आपत्ति नहीं है । खाड़ी देशों के संपन्न मुसलमान अमेरिका-यूरोप में जाकर रहने के लिए लालायित रहते हैं। हमारे देश में कांग्रेस अल्पसंख्यकवाद के नाम पर मुसलमानों में भय पैदा करती है। क्या यह पक्षपात नहीं है कि एक समुदाय के निजी कानूनों को संहिताबद्ध कर दिया गया है, लेकिन अन्य समुदायों को निजी कानूनों पर चलने की छूट है। समान नागरिक संहिता के विषय को अब और नहीं टाला जा सकता । विधि आयोग ने देश के लोगों से सुझाव मांगे हैं। इसका स्वागत करना चाहिए। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)
Editorial

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