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आखिर कब तक चांदी काटेंगे डाटा चोर
By EditorialPublished on
कुछ साल पहले हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) की राजनीतिक अर्थशास्त्री शोशाना ज्यूॉफ (Political Economist Shoshana Geoff) ने एक किताब लिखी थी, द एज ऑफ सर्विलांस कैपिटलिज्म। इस पुस्तक में उन्होंने साइबर युग की अर्थसत्ता की एक नई व्याख्या दी थी। पूंजीवाद की ज्यादातर शुरूआती व्याख्याएं कहती हैं कि यह व्यवस्था मजदूरों का शोषण करके अपनी सत्ता का निर्माण करती है।

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हरजिंदर
कुछ साल पहले हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) की राजनीतिक अर्थशास्त्री शोशाना ज्यूॉफ (Political Economist Shoshana Geoff) ने एक किताब लिखी थी, द एज ऑफ सर्विलांस कैपिटलिज्म। इस पुस्तक में उन्होंने साइबर युग की अर्थसत्ता की एक नई व्याख्या दी थी। पूंजीवाद की ज्यादातर शुरूआती व्याख्याएं कहती हैं कि यह व्यवस्था मजदूरों का शोषण करके अपनी सत्ता का निर्माण करती है। इसे लेकर जो नैरेटिव तैयार हुआ था, वह आज भी जहां-तहां चलता है और उसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। शोशाना का कहना है कि नए पूंजीवाद को श्रमिकों के शोषण की जरूरत नहीं है । वह लोगों के डाटा, यानी उनकी निजता को जमा करके अपनी नींव मजबूत करता है । हो सकता है कि इसमें किसी को श्रमिकों के शोषण जैसी क्रूरता न दिखाई दे, पर नए चलन ने बहुत से आधुनिक कारोबार को इतना मजबूत आधार दिया है, जितनी मजबूती क्लासिकल पूंजीवाद वाले दौर में भी किसी उद्यम को नहीं मिली थी।
इसका एक उदाहरण है गूगल, जो किसी वस्तु का उत्पादन किए बिना ही सिर्फ डाटा के कारोबार से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हो गई। वैसे, यह बात शोशाना की किताब से पहले से कही जा रही है कि आधुनिक दुनिया में डाटा ही सबसे बड़ी पूंजी है। इस दौर में जो डाटापति है, उसके आगे बड़े-बड़े पूंजीपति भी पानी भरते हैं। पिछले सप्ताह कोविन वैक्सीन लगवाने वालों का डाटा लीक होने की जो खबर आई, उसे इसी संदर्भ में देखना होगा। यह ठीक है कि सरकार की ओर से इसका खंडन आ गया है। मगर हम इस खंडन को अगर सही भी मान लें, तब भी इस पर विश्वास करना थोड़ा कठिन है कि सरकारी तंत्र में जनता का डाटा या लोगों की निजता पूरी तरह सुरक्षित है। भारत ही नहीं, दुनिया भर में कहीं भी यही स्थिति है । अन्य देशों की तरह हमारे यहां भी डाटा लीक होने की खबरें इससे पहले भी आई हैं और कई मामलों में डाटा की चोरी साबित भी हुई है।
साल 2017 में यह पता लगा था कि सरकार की ही 210 ऐसी वेबसाइट हैं, जिन पर लोगों का आधार से जुड़ा डाटा उपलब्ध है। बात उजागर होने पर ये सारी वेबसाइट पहले बंद की गई और फिर उनसे आधार का डाटा हटाया गया। उसी साल अगस्त में बेंगलुरू से एक इंजीनियर को गिरफ्तार किया गया। उसने एक ऐसा स्मार्टफोन एप बनाया था, जो विभिन्न सरकारी वेबसाइट से आधार का डाटा चुरा सकता था । और यह तकनीक उसने एक एप से चलने वाली टैक्सी सेवा को बेच भी दी थी। वैसे, उसी महीने विकीलीक्स की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि आधार का सारा डाटाबेस अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पास पहुंच चुका है।
डाटा लीक होने का सबसे दिलचस्प मामला है महेंद्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni) का । वह एक आधार सेवा केंद्र पर अपना आधार कार्ड बनाने गए। इस केंद्र ने अति उत्साह में आधार बनवाते हुए धौनी की तस्वीर के साथ ही फॉर्म पर दर्ज उनकी सारी जानकारियों को ट्वीट कर दिया। इस ट्वीट को लाइक करने वालों में कुछ केंद्रीय मंत्री भी थे। वे सब इस बात से अनभिज्ञ थे कि इससे धौनी जैसी सेलेब्रिटी की बहुत सारी निजी जानकारियां सबके पास पहुंच रही हैं। बाद में जब उनकी पत्नी साक्षी धोनी ने गुस्से में ट्वीट किया कि इस देश में किसी की निजता बची भी है या नहीं, तब जाकर अधिकारियों को होश आया। इसके बाद उस ट्वीट तो डिलीट कर दिया गया, पर तब तक नुकसान हो चुका था ।
शुरू में जब आधार की योजना बनी थी, तब इसके सीमित उपयोग बताए गए थे। मगर अब इसे बहुत ज्यादा विस्तार दे दिया गया है। आप आधार के बिना न तो पासपोर्ट बनवा सकते हैं और न ड्राइविंग लाइसेंस । पहले आयकर के लिए सिर्फ पैनकार्ड काफी होता था, पर अब इससे आधार को जोड़ना जरूरी बना दिया गया है। कोविड महामारी फैली, तो वैक्सीन लगवाने की एक जरूरी शर्त थी आधार कार्ड । सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी इसी को आधार बना दिया गया है। इसी से मनरेगा की दिहाड़ी मिलती और मुफ्त राशन का कार्ड बनवाने के लिए भी इसी की जरूरत पड़ती है। अब बैंक खाता भी इसी से खुलता है और वेतन- पेंशन भी इसी से आती है। होटल वाले भी पहचान के तौर पर आधार ही मांगते हैं। रेलवे टीटी भी आधार देखकर ही यह तय करना चाहते हैं कि जिसके नाम से आरक्षण है, वही यात्री है कि नहीं?
एक देश एक चुनाव, एक देश एक राशनकार्ड जैसी बातें तो अभी महज राजनीतिक नारा हैं, लेकिन एक देश एक पहचान-पत्र को हकीकत में बदल दिया गया है । यह माना जाता है कि किसी भी तरह के डाटा को जितना विस्तार मिलेगा या जितनी जगह या जितने सर्वरों पर उसकी उपस्थिति दर्ज होगी, उसके लीक होने की आशंका भी उतनी ही ज्यादा होगी। सवाल यह नहीं है कि डाटा चोरी हुआ या नहीं, बात यह है कि इसका आवागमन इतने दरवाजों से हो रहा कि सेंधमारों के विकल्प बढ़ गए हैं। उस दौर में, जब डाटा ही संपत्ति है, उसके चोर भी बढ़ रहे हैं, जो चोरी की नित नई तकनीक भी विकसित कर रहे हैं। यह खतरा तकरीबन पूरी दुनिया में है, और हर दूसरे दिन डाटा लीक की खबरें कहीं न कहीं से आती ही हैं। इसीलिए कहा जाने लगा है कि सरकारों को अपने डाटा के चरणचिह्न, यानी 'फुटप्रिंट' कम और विकेंद्रित करने चाहिए। लेकिन हम न सिर्फ अपने फुटप्रिंट बढ़ा रहे हैं, बल्कि उनको और एकीकृत कर रहे हैं। आम लोगों के लिए नौकरशाही अब आधारशाही में बदलती जा रही है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मूल अधिकार कहा है, लेकिन अगर यह अधिकार भंग होता है, तो क्षतिपूर्ति हासिल करने के प्रावधान हमारे यहां नहीं हैं। देश के डाटा सुरक्षा कानून में डाटा चोरी या उसका दुरूपयोग करने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों या व्यक्तियों को सजा देने का प्रावधान तो है, लेकिन अगर यह डाटा किसी सरकारी व्यवस्था की खामी या भ्रष्ट आचरण की वजह से लीक हुआ है, तो उनके लिए यह कानून उतना सख्त नहीं है। डाटा को लेकर गंभीर होने का वक्त आ गया है।

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