✕
नए सिरे से आकार लेता राजग
By EditorialPublished on
जैसे - जैसे आम चुनाव का समय निकट आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक गोलबंदी भी तेज होती जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी को लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में आने से रोकने के लिए 23 जून को पटना में भाजपा (BJP) विरोधी दलों की बैठक प्रस्तावित है। राजनीतिक विमर्श में इस समय राष्ट्रीय स्तर पर संभावित गैर-भाजपाई मोर्चे का ही शोर है। इसकी तुलना में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग (NDA) को अनदेखा किया जा रहा है। नि:संदेह, भाजपा लगातार दो आम चुनावों में अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छूने में सफल रही है, लेकिन

x

राहुल वर्मा : जैसे - जैसे आम चुनाव का समय निकट आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक गोलबंदी भी तेज होती जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी को लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में आने से रोकने के लिए 23 जून को पटना में भाजपा (BJP) विरोधी दलों की बैठक प्रस्तावित है। राजनीतिक विमर्श में इस समय राष्ट्रीय स्तर पर संभावित गैर-भाजपाई मोर्चे का ही शोर है। इसकी तुलना में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग (NDA) को अनदेखा किया जा रहा है। नि:संदेह, भाजपा लगातार दो आम चुनावों में अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छूने में सफल रही है, लेकिन सहयोगियों पर उसकी निर्भरता कम नहीं हुई। 1989 के बाद भारतीय राजनीति की प्रकृति ही ऐसी हो गई है कि उसमें गठबंधन के बिना बात ही नहीं बनती। इसमें भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने सफलता एवं निरंतरता का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। संयोग से पिछले महीने ही राजग को आकार लिए 25 वर्ष भी पूरे हो गए हैं। इस समय भले ही राजग का कुनबा काफी सिमट गया हो, लेकिन कुछ हालिया संकेतों से यह लगता है कि उसे नए सिरे से संवारने की तैयारी हो रही है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान राजग के पाले से निकले कई दलों के अलगाव के पीछे अलग- अलग कारण रहे हैं। एक धारणा तो यही रही कि चूंकि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे से एक के बाद एक कई चुनाव जीतने में सफल रही तो गठबंधन में सहयोगी उपेक्षित होते गए। 2014 के बाद से राजग को लेकर भाजपा की रणनीति भी यही रही है 'उसने छोटे-छोटे सहयोगियों पर ध्यान केंद्रित किया, क्योंकि उनके साथ सियासी सौदेबाजी आसान होती है। राजनीतिक सफलता से उत्साहित भाजपा स्वयं के विस्तार में भी जुट गई । विस्तार की इस प्रक्रिया में उसने अपने ही सहयोगियों पर वर्चस्व बनाना शुरू किया। महाराष्ट्र का ही उदाहरण लें तो वहां भाजपा और पूर्ववर्ती शिवसेना के बीच एक अघोषित सहमति थी, जिसमें विधानसभा में शिवसेना तो लोकसभा चुनावों में भाजपा को लड़ने के लिए अधिक सीटें मिलतीं। फिर भाजपा राज्य की सत्ता पर भी अपना नियंत्रण चाहने लगी तो इसी टकराव में दोनों की राहें अलग हो गईं। कथित राजनीतिक असुरक्षा के चलते ही जदयू ने भी भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया ।
संसदीय चुनाव की आहट के साथ ही भाजपा को भी सहयोगियों की आवश्यकता महसूस होने लगी है। इसका एक प्रमुख कारण है कि पिछले दो आम चुनावों में भाजपा कई राज्यों में अपने प्रदर्शन में चरम की स्थिति प्राप्त कर चुकी है और उस सफलता को दोहराना आसान नहीं होगा साथ ही, भाजपा को दस साल के सत्ता विरोधी रूझान का भी सामना करना होगा। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा रूझान कितना प्रभावी दिख रहा है, लेकिन फ्लोटिंग वोटर्स पर ऐसे रूझान का असर होता है और अक्सर यही वर्ग जनादेश निर्धारित करने में निर्णायक होता है। इसलिए भाजपा अपनी संभावनाओं को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है । सहयोगी दलों को लुभाने के लिए उसकी ओर से प्रयास भी शुरू हो गए हैं, तो अस्तित्व के संकट से जूझ रहे कई क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा से हाथ मिलाना ही सही दिख रहा है। जैसे कर्नाटक के हालिया विधानसभा चुनाव में हाशिये पर चले गए जनता दल सेक्युलर ने भाजपा के साथ आने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देसम पार्टी यानी तेदेपा भी फिर से राजग के खेमे में आने की तैयारी कर रही है। शिरोमणि अकाली दल के समक्ष भी अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है । प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद अकाली दल की डगर और कठिन हो गई है। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और लोक जनशक्ति के दोनों धड़ों को राजग का हिस्सा बनने में शायद ही कोई संकोच हो ।
भाजपा (BJP) के लिए भी सभी पार्टियों से गठबंधन कर पाना आसान नहीं होगा। आंध्र में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते सहज रहे हैं । ऐसे में यदि भाजपा चंद्रबाबू नायडू को जोड़ती है तो वह जगन मोहन रेड्डी को भी नाराज नहीं करना चाहेगी । तेदेपा के साथ बढ़ती नजदीकियों के बीच केंद्र ने जगन सरकार के लिए पोलावरम परियोजना की राह आसान बनाई है। वहीं तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भाजपा की राज्य इकाइयां गठबंधन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व की दुविधा बढ़ा रही हैं, क्योंकि राज्य स्तरीय नेतृत्व को लगता है कि गठबंधन से उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं होगा। उलटे जमीनी स्तर पर की गई उनकी मेहनत जाया हो जाएगी। खासतौर से तमिलनाडु की भाजपा इकाई के अध्यक्ष अन्नामलाई के आक्रामक तेवर यही संकेत करते हैं कि आंतरिक संघर्ष से जूझ रही अन्नाद्रमुक के किसी भी धड़े के साथ गठजोड़ न किया जाए। महाराष्ट्र (Maharashtra) में भी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (CM Eknath Shinde) द्वारा लोकप्रियता को लेकर जारी एक हालिया विज्ञापन के बाद राज्य की भाजपा इकाई में भी असंतोष की खबरें हैं। इसके बावजूद भाजपा और उसके वर्तमान सहयोगी एवं संभावित साथी जुड़ाव की अहमियत समझते हैं। जुड़ाव की ये कड़ियां मुख्य रूप से तीन पहलुओं से तय होंगी। पहली वैचारिक साम्यता, दूसरी सामाजिक-आर्थिक वर्गों को लेकर संवेदनशीलता और तीसरे संसाधनों की साझेदारी। भाजपा की वैचारिक स्पष्टता जगजगाहिर है। साथ ही, मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने नए-नए सामाजिक-आर्थिक वर्गों में अपनी पैठ बनाई है। वहीं, संसाधनों के स्तर पर भी भाजपा समृद्ध है। ऐसे में ये तीन पहलू सहयोगियों को भाजपा के साथ सहजता और राजग से जुड़ाव में अहम भूमिका निभाएंगे। वहीं भाजपा के दृष्टिकोण से राजग को देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में उसका पहला प्रारूप सरकार चलाने के लिए संख्याबल की व्यवस्था से जुड़ा था, जिसमें सहयोगी दल प्रभावी भूमिका में थे । मोदी के दौर में राजग के दूसरे स्वरूप में भाजपा ने उन क्षेत्रों को चिह्नित किया जहां वह उपस्थित तो थी, लेकिन ताकतवर नहीं । इस दौर में भाजपा को मिश्रित सफलता मिली। अब राजग के तीसरे पड़ाव पर भाजपा की दृष्टि मुख्य रूप से उन क्षेत्रों पर जहां कभी उसका राजनीतिक वजूद ही नहीं रहा । इस लिहाज से दक्षिण की ओर भाजपा के कदम बढ़ते दिख रहे हैं।

Editorial
Next Story
Related News
X
