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हम अमेरिका से कैसे लें अधिकतम लाभ
By EditorialPublished on
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अमेरिका (America) यात्रा पर सबकी नजरें टिकी हैं। 21 जून से शुरू हो रहे उनके राजकीय दौरे को न सिर्फ सामरिक, बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक नजरिये से भी काफी अहम माना जा रहा है । सवाल यह भी है कि अमेरिका से लाभ लेकर चीन ने जिस तरह खुद को विकसित किया और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उपलब्धि हासिल की, क्या भारत भी अपने लिए ऐसी राह बना सकता है? किंतु-परंतु कई हैं, लेकिन यह अमेरिका के हित में है कि भारत मजबूत बने और इसके लिए उसे नई दिल्ली को हरंसभव मदद क

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अरूण कुमार : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अमेरिका (America) यात्रा पर सबकी नजरें टिकी हैं। 21 जून से शुरू हो रहे उनके राजकीय दौरे को न सिर्फ सामरिक, बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक नजरिये से भी काफी अहम माना जा रहा है । सवाल यह भी है कि अमेरिका से लाभ लेकर चीन ने जिस तरह खुद को विकसित किया और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उपलब्धि हासिल की, क्या भारत भी अपने लिए ऐसी राह बना सकता है? किंतु-परंतु कई हैं, लेकिन यह अमेरिका के हित में है कि भारत मजबूत बने और इसके लिए उसे नई दिल्ली को हरंसभव मदद करनी चाहिए।
चीन (China) को अमेरिकी साथ का फायदा इसलिए मिला था, क्योंकि दोनों सोवियत संघ (अब रूस) के खिलाफ 'सामरिक साझेदार' बने। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए 1972 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर अपने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का संदेश लेकर चुपचाप चीन गए थे, और फिर बाद में निक्सन व माओ का मिलना तय हुआ था। आज भारत और अमेरिका, दोनों के लिए ठीक इसी तरह की स्थिति है। दोनों देशों के लिए चीन एक बड़ा खतरा है। लिहाजा, दोनों के बीच सामरिक साझेदारी मौजूदा वक्त की बड़ी जरूरत है ।
आज यूक्रेन युद्ध के कारण रूस और चीन एक-दूसरे के काफी करीब आ रहे हैं, क्योंकि दोनों देशों को पश्चिमी ताकतें किनारे करने पर आमादा हैं। इससे एक अलग तरह का शीतयुद्ध शुरू हो गया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो शीतयुद्ध चला था, उसमें एक तरफ सोवियत संघ था, तो दूसरी तरफ अमेरिका, यानी वह टकराव साम्यवाद बनाम पूंजीवाद का था । मगर आज दोनों तरफ पूंजीवादी राष्ट्र हैं। इसमें भारत के लिए स्थिति कहीं ज्यादा शोचनीय हो जाती है, क्योंकि हम न रूस का साथ छोड़ सकते हैं और न अमेरिका का । आज भी हमारी 60 फीसदी सैन्य सामग्री मॉस्को से आती है, शेष अमेरिका व फ्रांस जैसे देशों से। इसी कारण, हमने निरपेक्ष (गुटनिरपेक्ष) रूख अपना लिया है।
अमेरिका हमारी मजबूरी जानता है। उसे पता है कि नई दिल्ली और वाशिंगटन, दोनों के सामरिक हित जुड़े हुए हैं। चूंकि चीन काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है, इसलिए बीजिंग को घेरने के लिए वाशिंगटन कई तरह की रणनीति बना रहा है। क्वाड जैसे गुट का निर्माण, हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए अलग नीति और चीन के पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने जैसी कवायद इसी रणनीति का हिस्सा है। जाहिर है, उसकी यह मंशा तभी पूरी होगी, जब दक्षिण एशिया में कोई देश चीन के बरअक्स खड़ा होगा, और यह ताकत फिलहाल भारत के पास ही है। चीन इसी कारण भारतीय सीमाओं पर अतिक्रमण करने जैसे प्रयास करता रहता है, ताकि वह हमें अलग-अलग मामलों में उलझा सके।
सुखद है कि अमेरिका के साथ हमारा व्यापारिक संबंध बहुत अच्छा है। वह हमारा सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी है। साल 2021 - 22 में आपसी व्यापार में हमें 32.8 अरब डॉलर का 'सरप्लस' हासिल हुआ था। यह संकेत है कि द्विपक्षीय व्यापार भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतरी में मददगार साबित हो रहा है। फिर, अमेरिका में सूचना प्रौद्योगिकी, विशेषकर सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में कई भारतीय काम करते हैं, जो आपसी संबंधों को मजबूती दे रहे हैं। उनसे काफी मात्रा में डॉलर भी भारत आ रहा है। फिर भी, दोनों देश एक-दूसरे के सामरिक साझेदार नहीं बन सके हैं। हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु समझौता करके इसकी बुनियाद रख दी थी, लेकिन बाद में वाशिंगटन ने उतनी पहल नहीं की, जितनी नई दिल्ली को जरूरत थी । अमेरिका की तुलना में भारत की स्थिति कमजोर है, जिसका ख्याल व्हाइट हाउस को रखना चाहिए। आखिर किन-किन क्षेत्रों में अमेरिका हमारी सहायता कर सकता है? हमारी सबसे बड़ी कमजोरी तकनीक है। अमेरिका इस मामले में दुनिया में सबसे आगे है, इसलिए उससे हमें तकनीकी व प्रौद्योगिकी मदद हासिल करनी चाहिए। विशेषकर रक्षा व औद्योगिक क्षेत्र में हमें अधिकाधिक प्रौद्योगिकी की जरूरत है। उम्मीद है, प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा में इस पर गंभीर विचार होगा। खबर है कि जीई - 414 इंजन को लेकर दोनों देशों में सहमति बन सकती है। इससे हमारे हल्के लड़ाकू विमानों की इंजन क्षमता बढ़ जाएगी। इससे विमान निर्माण क्षेत्र को फायदा मिल सकता है। ऐसे समझौते हमारे स्थानीय सैन्य उद्योग को भी मजबूती दे सकेंगे, जिससे हमारी आंतरिक ताकत में इजाफा होगा।
इसी तरह, एच1बी वीजा नियमों में ढील लेने के प्रयास भी हमें करने चाहिए। अमेरिका यदि इस पर राजी होता है, तो न सिर्फ वहां के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को मदद मिलेगी, बल्कि हमारे नौजवानों को भी रोजगार मिल सकेगा। द्विपक्षीय निवेश भी एक अन्य मोर्चा है, जिस पर अमेरिका को आगे बढ़ना होगा। पिछली सदी के आखिरी दशकों में चीन इसलिए तरक्की कर सका क्योंकि अमेरिका से काफी निवेश वहां गया था। अमेरिका ने न सिर्फ उसे नई-नई तकनीक दिए, बल्कि उसके उत्पादों के लिए अपने बाजार भी खोल दिए । हमें भी कुछ ऐसा ही प्रयास करना होगा। तकनीक, बाजार, श्रम हस्तांतरण जैसे तमाम मोर्चों पर अमेरिका को हमारी सहायता करनी चाहिए।
यह सर्वविदित तथ्य है कि दुनिया का सबसे बड़ा असंगठित क्षेत्र भारत में है। जब तक यह समर्थ नहीं होगा, भारत मजबूत नहीं हो सकता। यहीं से सबसे ज्यादा मांग भी पैदा होती है। इसके लिए कृषि, लघु व मंझोले उद्योगों में हमें नई-नई तकनीक की दरकार है। इससे भारत के बड़े उद्योगों को भी परोक्ष रूप से फायदा होगा। कोविड ने हमारी अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अमेरिका में बेशक आर्थिक सुस्ती है, पर उसने कोरोना से महज छह महीने में पार पा लिया और आज भी उसकी अर्थव्यवस्था सबसे मजबूत है, जबकि हम पिछले साल अपने पुराने स्तर को छू सके हैं। जाहिर है, निवेश, तकनीक हस्तांतरण, व्यापार, वित्त जैसे तमाम क्षेत्रों में हमें अमेरिका से सहयोग हासिल करना होगा । हम इससे कोविड, यूक्रेन संकट, वैश्विक सुस्ती जैसे हालात से पार पा सकेंगे व अधिक मजबूती से विश्व मंच पर स्थापित हो सकेंगे । इसके लिए पहल अमेरिका को ही करनी होगी, क्योंकि इस 'एकतरफा' रिश्ते में फायदा उसे ही है। मजबूत भारत ही चीन के खिलाफ अमेरिका की मदद कर सकता है।

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