Pratahkal-Whose agenda is Rahul Gandhi fulfilling?
विकास सारस्वत : कांग्रेस (Congress) नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) लंबे समय तक अपनी विदेश यात्राओं को गोपनीय रखने के लिए आलोचना झेलते रहे हैं। वहीं, सार्वजनिक दायरे में रहीं उनकी यात्राएं निरंतर विवादों में घिरी रही हैं। ऐसा ही उनकी हालिया अमेरिका यात्रा के साथ भी हुआ । विदेशी धरती पर देसी मुद्दे उठाकर राहुल पारंपरिक राजनीति की मर्यादा को लांघ चुके हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी, अदाणी या सेंगोल (Sengol) पर उनकी टिप्पणियों के स्तर पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लेकिन अमेरिका यात्रा के दौरान सहभागियों के चुनाव ने एक बार फिर कांग्रेस और राहुल गांधी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। चार जून को न्यूयार्क में राहुल के कार्यक्रम के आयोजनकर्ताओं में तंजीम अंसारी और जवाद अहमद शामिल थे। फेक न्यूज का पर्दाफाश करने को समर्पित संस्था डिसिन्फोलैब के अनुसार तंजीम और जवाद इस्लामिक सर्कल आफ नार्थ अमेरिका (आईसीएनए) नामक संस्था से जुड़े हुए हैं। यह संस्था पाकिस्तानी आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी के साथ संबद्ध है। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि हिजबुल और लश्कर का समर्थन करने वाली आईसीएनए कश्मीरी अलगाववाद की भी समर्थक है । कार्यक्रम के दो अन्य समन्वयक मोहम्मद असलम और मिनहाज खान भी क्रमशः आईसीएनए और इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल संबद्ध थे। इन संस्थाओं को आईएसआई से मदद मिलती है और ये पैसे खर्च करके अमेरिका में भारत विरोधी प्रचार और भारत विरोधी नीतियां बनवाने के लिए प्रयासरत रहती हैं। याद रहे कि सिमी और आईएसआई से संबंध रखने वाली कुख्यात संस्था आईएएमसी ने कई बार झूठ फैलाकर भारतीय मुसलमानों को भड़काने का प्रयास किया है। उसने त्रिपुरा में मस्जिद पर हमले की झूठी खबर फैलाई थी और दिल्ली दंगों में सभी मृतकों के मुस्लिम होने का दावा किया था। भारत में मुसलमानों के नरसंहार जैसे ऊलजलूल दावे करने वाली यह संस्था इतनी बदनाम है कि अधिकांश अमेरिकी नेता उससे दूरी बनाकर रखते हैं। ऐसे में यह संभव ही नहीं कि इंडियन ओवरसीज कांग्रेस को आयोजनकर्ताओं के बारे में जानकारी न हो। वह भी तब जब कार्यक्रम से एक सप्ताह पहले ही इन लोगों की इस्लामी कट्टरवाद के प्रति निष्ठा के बारे में व्यापक ब्योरा इंटरनेट मीडिया पर डाल दिया गया था। बावजूद इसके कांग्रेस ने न केवल इन कट्टरपंथियों का सहारा लिया, बल्कि राहुल ने उनकी मौजूदगी में भारत में लोकतंत्र पर हमले होने के आरोप भी लगाए। इसी तरह वाशिंगटन डीसी में थिंक टैंक्स से राहुल की मुलाकात के दौरान जार्ज सोरोस की सहयोगी सुनीता विश्वनाथ मौजूद थीं। सुनीता अमेरिका में भारत एवं हिंदू विरोधी कार्यक्रम आयोजित कराती रही हैं। वह 'डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व' की आयोजक मंडली में भी शामिल थीं और उन्होंने आईसीएनए और सीएआईएआर जैसे कट्टर इस्लामी संगठनों के साथ कार्यक्रम भी किए हैं। वह कश्मीरी अलगाववाद की भी समर्थक हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है जब राहुल ने टीम सोरोस के साथ खुलकर मुलाकात की है । सोरोस के एक अन्य साथी सलिल शेट्टी ने राहुल की भारत जोड़ो यात्रा में सहभागिता की थी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस तरह भारत एवं हिंदू विरोधी लोगों को अपने साथ लेकर कांग्रेस और राहुल आखिर किसके हित की राजनीति कर रहे हैं? क्या राहुल की विदेशी सभाओं में प्रतिभागियों और व्यवस्थापकों का ऐसा अकाल है कि वह किसी भी व्यक्ति या संगठन का सहयोग लेने को तैयार हैं? क्या राहुल मुस्लिम तुष्टीकरण की कवायद में इस हद तक जा चुके हैं कि विदेशी धरती पर जिहादपरस्त संस्थाओं का साथ लेने में भी संकोच नहीं कर रहे?
ये संस्थाएं न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिकी वीजा या व्हाइट हाउस में निमंत्रण का विरोध करती रही हैं, बल्कि भारत के विरूद्ध प्रतिबंधों की भी मांग करती हैं। 22 जून से शुरू होने वाली प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा से ठीक पहले अमेरिका पहुंचकर राहुल गांधी ने सरकार और प्रधानमंत्री पर जैसे आरोप लगाए हैं, वे इन संस्थाओं के एजेंडे को ही आगे बढ़ाते हैं । सांता क्लारा की सभा में राहुल का वक्तव्य कि 'भारत में सिख, ईसाई और दलितों- वनवासियों पर मुसलमानों की तरह हमले हो रहे हैं' निरा झूठ और वास्तविकता के उलट है। इसी तरह वाशिंगटन में सीएए को मुसलमानों की नागरिकता खत्म करने वाला कानून बताकर मांगी गई प्रतिक्रिया पर राहुल ने साक्षात्कारकर्ता की जानकारी दुरूस्त करने के बजाय प्रश्न को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ओर घुमा दिया। राहुल और कांग्रेस भलीभांति जानते हैं कि ऐसी प्रतिक्रियाओं और वक्तव्यों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि खराब होती है और इस्लामिक - वाम वैश्विक गठजोड़ को अपने एजेंडे के लिए ईंधन मिलता है। निरंतर रसातल में जाती कांग्रेस के कारण राहुल गांधी एक ऐसी लोकसभा सीट के मोहताज बन गए हैं, जहां हार-जीत मुस्लिम समाज तय करता है। आ राहुल की पूरी राजनीति भी अल्पसंख्यकों की राजनीति बनकर रह गई है। अमेरिका में भी वह अल्पसंख्यकों से घिरे हुए और उन्हीं की बात करते दिखे। ऐसे मंचों पर मुस्लिम लीग जैसी सांप्रदायिक पार्टी का बचाव और हिंदू विरोधी तत्वों से मेल राहुल की तुष्टीकरण की नीति और कहीं न कहीं बहुसंख्यक हिंदुओं के प्रति उनकी भड़ास को ही दर्शाता है। उनकी मानसिक अवस्था इसी से समझी जा सकती है कि उन्होंने सेना और डीआरडीओ की जासूसी के आरोपित पत्रकार विवेक रघुवंशी की गिरफ्तारी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया। इन सबसे अधिक चिंताजनक राहुल का टीम सोरोस के रूप में सत्ता परिवर्तन माफिया से बेझिझक मुलाकात करना है। कुछ समय पहले लंदन में भी वह भारतीय मामलों में विदेशी हस्तक्षेप की मांग कर चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा करने के प्रयास एवं सत्ता परिवर्तन माफिया के साथ मेल-मिलाप राहुल और कांग्रेस के मंसूबों पर संदेह पैदा करता है। राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा ने दर्शा दिया कि 2024 का चुनाव न सिर्फ बेहद कड़वाहट भरा एवं द्वेषपूर्ण होने वाला है, बल्कि उसमें विदेशी दखल की भी प्रबल आशंका है।
Editorial

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