Pratahkal - Lekh Update - Ties of politics in the bondage of power
राज कुमार सिंह
संसद के नए भवन का विवादों के बीच हुआ उद्घाटन देश में नए राजनीतिक ध्रुवीकरण के संकेत भी दे गया । बेशक बहिष्कार करने वाले 20 दलों की संख्या कम नहीं आंकी जा सकती, पर उससे ज्यादा दल उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। बहिष्कार करने वाले दल वे ही थे, जो अक्सर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार और भाजपा की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन शामिल होने वाले दलों में वे भी शामिल रहे, जो तटस्थ नीति अपनाते रहे हैं। तर्क दिया जा सकता है कि इन दलों ने देश में लोकतंत्र के नए मंदिर के उद्घाटन के अवसर की गरिमा को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया होगा, पर सत्ता केंद्रित राजनीति में विशुद्ध राजनीति से इतर कारणों से कहां कुछ होता है ? विपक्षी एकता के दूत के रूप में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश भर में घूम रहे हैं। अब आगामी 23 जून को पटना में विपक्षी दलों की एक बैठक होने जा रही है, जिसमें उन सभी दलों के शामिल होने की उम्मीद है, जो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरूद्ध समान विचारधारा वाले दलों की एकता पर जोर देते रहे हैं। हालांकि, एकजुटता दिखाने का मौका पिछले दिनों कर्नाटक के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के दौरान भी मिला था, लेकिन उस पर इन दलों के अंतर्विरोधों का साया पड़ने से नहीं रह सका। आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तेलंगाना के मुख्यमंत्री एवं बीआरएस मुखिया के. चंद्रशेखर राव को उसमें बुलाया नहीं गया तो बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी गई नहीं ।
बीजू जनता दल, जनता दल सेक्युलर, बसपा, शिरोमणि अकाली दल, टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने का यह अर्थ निकालना गलत तो नहीं होगा कि वे भाजपा विरोधी मोर्चे का हिस्सा नहीं बनेंगे। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि भाजपा से मुकाबले के लिए सभी गैर भाजपा या गैर राजग दलों की जरूरी एकता संभव नहीं दिखती। यह भी कि जिन दलों में एकता संभव लगती है, उनमें भी अंतर्विरोध से कहीं ज्यादा परस्पर दुराग्रह हैं, जिसके चलते भाजपा से निपटने से पहले एक-दूसरे को निपटाने की कोशिशें भी जारी हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी से केंद्रीय जांच एजेंसियों की पूछताछ पर आम आदमी पार्टी के नेताओं के बोल किसी से छिपे नहीं हैं, लेकिन शराब घोटाले से लेकर दिल्ली सरकार के अधिकारों तक के मुद्दों पर अब जब खुद संकट में हैं तो उन्हें कांग्रेस का समर्थन चाहिए। तमाम विपक्षी नेताओं से समर्थन मांग रहे अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मिलने का समय मांगा, लेकिन इस मामले में कांग्रेस किसी जल्दी में नहीं लगती ।
दलगत राजनीति की ऐसी ही गांठों का दूसरा संकेत यह है कि नीतीश-ममता- शरद पवार सरीखे क्षत्रप चाहते हैं कि तेलंगाना, आंध्र, केरल और दिल्ली को छोड़कर कांग्रेस अपनी भूमिका पिछले लोकसभा चुनाव में जीती और दूसरे नंबर पर रही सीटों तक ही सीमित रखते हुए अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए मैदान खुला छोड़ दे। यह रणनीति लोकसभा की कुल 543 में से 474 सीटों पर भाजपा के विरूद्ध एक ही साझा विपक्षी उम्मीदवार उतारने से प्रेरित बताई जा रही है, पर इस गणित के हिसाब से कांग्रेस के हिस्से मात्र 244 सीटें ही आएंगी। उनमें से कांग्रेस कितनी जीत पाएगी और शेष सीटों पर उसके संगठन नेता-कार्यकर्ताओं का क्या होगा? कर्नाटक में जीत के बाद तो कांग्रेस इस फार्मूले पर कतई नहीं मानेगी, लेकिन इससे क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के प्रति सोच का संकेत तो मिल ही जाता है। ये दल भाजपा से लड़ना चाहते हैं, उसमें कांग्रेस के सहयोग के महत्व का अहसास भी उन्हें है, पर वे इस प्रक्रिया में कांग्रेस को उसका खोया हुआ जनाधार वापस पाते नहीं देखना चाहते, क्योंकि उनका राजनीतिक भविष्य कांग्रेस की कमजोरी पर टिका है। ऐसा नहीं है कि गठबंधन राजनीति की जरूरत सिर्फ गैर भाजपा खेमे को महसूस हो रही है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली भाजपा को भी राजग की याद उसके स्वर्ण जयंती वर्ष में आ गई है, जिसे नए सिरे से संवारने की तैयारी हो रही है।
नए संसद भवन के उद्घाटन में कुछ ऐसे भी राजनीतिक दल शामिल हुए, जो अतीत में राजग का हिस्सा रह चुके हैं और भविष्य में फिर बन सकते हैं। शिरोमणि अकाली दल से भाजपा का रिश्ता कृषि कानूनों पर टूटा था, जो अंततः वापस भी हो गए। अलग-अलग चुनाव लड़कर दोनों ही दलों को अपनी सीमाओं का अहसास हो चुका है। इसलिए अगले लोकसभा चुनाव से पहले इनकी दोस्ती की संभावना प्रबल है। जनता दल सेक्युलर सुप्रीमो एवं पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री मोदी की जैसी प्रशंसा की है - वह बहुत कुछ कह देती है। चंद्रबाबू नायडू ने राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं में राजग छोड़ मोदी के विरूद्ध मोर्चा खोला था, पर युवा जगनमोहन रेड्डी के हाथों आंध्र की सत्ता भी गंवा बैठे। हाल में उनकी अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकात फिर दोस्ती का संकेत दे रही है । जगन की वाईएसआर कांग्रेस वक्त - जरूरत मोदी सरकार का साथ देती रही है, पर चुनावी राजनीति के इन दो परस्पर विरोधी ध्रुवों का एक साथ राजग में हो पाना तो संभव नहीं लगता । तब जगनमोहन रेड्डी क्या करेंगे? देखना दिलचस्प होगा। पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने नवीन पटनायक को ओडिशा की राजनीति में किसी गठबंधन की जरूरत नहीं। हां, राष्ट्रीय राजनीति में उनकी जरूरत दोनों खेमों को होगी। बसपा की स्थिति तो बिल्कुल ही अबूझ है। पिछला लोकसभा चुनाव वह अपनी धुर विरोधी सपा से मिलकर लड़ी थी, अगले चुनाव में क्या होगा? यह कोई नहीं जानता ।
Editorial

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