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रेलयात्रा 9 : गोरों के लिये भारतीयों से बढ़िया पड़ौस कोई नहीं
By EditorialPublished on
तीन चार स्टेशनों तक इलीनोई राज्य चला, उसके बाद हम मिडवेस्ट के एक और लहलहाते राज्य आयोवा में प्रविष्ठ हुए। यह अमेरिका की दो प्रमुख नद मिसीसीपी और मिसौरी के बीच अवस्थित है। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव हेतु राजनैतिक पार्टियों के प्रत्याशियों के चयन हेतु आयोजित प्राइमरी व क चुनावों का सिलसिला आयोवा से ही प्रारम्भ होता है।

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रेलयात्रा : तीन चार स्टेशनों तक इलीनोई राज्य चला, उसके बाद हम मिडवेस्ट के एक और लहलहाते राज्य आयोवा में प्रविष्ठ हुए। यह अमेरिका की दो प्रमुख नद मिसीसीपी और मिसौरी के बीच अवस्थित है। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव हेतु राजनैतिक पार्टियों के प्रत्याशियों के चयन हेतु आयोजित प्राइमरी व क चुनावों का सिलसिला आयोवा से ही प्रारम्भ होता है।
शिकागो से निकले तीन घन्टे होने आये थे। इस बीच में सारी ट्रेन में चक्कर। लगा आया। यह ट्रेन पिछली ट्रेन से बहुत बहतर थी। इसमें एक बहुत लम्बा डिब्ब दर्शक दीर्घा जैसा बना हुआ था। डिब्बे की दोनों तरफ बड़ी बड़ी खिड़कियां थी और उनकी तरफ ही मुँह किये कुर्सियां लगी हुई थीं। इन कुर्सियों पर कई यात्री बैठे हुए थे और बाहर के नजारे का आनन्द ले रहे थे। ट्रेन के कई यात्री यहां आकर बैठ गए थे। तो ट्रेन खाली खाली सी लगने लगी थी। इसी से जुड़ा डाइनिंग रूम भी था जिसमें टेबलें लगी थी। इन टेबलों पर बैठकर खाना खाते, नाश्ता करते लोग भी बाहर का दृश्यावलोकन कर रहे थे। यहीं एक स्त्री-पुरुष भी बैठे थे जो बाहर के नजारे पर रनिंग कमेन्ट्री कर रहे थे। यहीं नीचे के डेक पर केके था जिसमें से सामान खरीद कर लोग यहीं बैठ कर खा रहे थे। डाइनिंग टेबलें लिखने के लिये भी अच्छी जगह थीं। एक महिला अपना लेप टोप बिछा काफी देर से इसी काम में लगी हुई थी।
शीघ्र ही हम एक अन्य राज्य मिसौरी में आ गये। यह भी अमरीकी धान के कटोरे का अंग है। यहां बूंद बूंद सिंचाई की तकनिक प्रचुरता से इस्तेमाल होती नजर आई। खेतों में चार चार-पांच पांच फुट ऊंचे डण्डे लगे हुए थे जिन पर प्लास्टिक के पाईप बिछे हुए थे, इन पाईपों पर छेद किये हुए थे। कई खेतों में जेसीबीयां भी खड़ी नजर आईं। हर खेत में अनाज भण्डारण के बड़े बड़े लोहे के गोलाकार खलिहान बने हुए थे। सर्वत्र मक्की ही मक्की नजर आ रही थी। तमाम पौधे एक ही ऊंचाई के एसी सघनता से नजर आ रहे थे जैसे मशीन से निकाले गए हों। यह खेती की उन्नत और यांत्रिक विधियों के भरपूर प्रयोग का परिणाम था।
मिसौरी नदी के नाम पर ही इस प्रदेश का नाम पड़ा। रात के 9 बजे तक भी बाहर का नजारा अच्छे प्रकाश में दिखाई देता था। रात्रि 10 बजे हम केन्सास सिटी पहुँचे। यह भी मिसौरी प्रदेश में ही है मगर मजे की बात यह है कि इसके नाम पर बना केन्सास प्रदेश अलग है जो मिसौरी से सटा हुआ है। केन्सास सिटी का भी कुछ भाग केन्सास प्रदेश में शामिल हैं। अन्धेरा हो गया तो बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा था, धीरे धीरे लोग इस डिब्बे जिसे ओब्जर्वेशन डेक के नाम से जाना जाता है से उठ उठ कर अपनी अपनी सीटों पर आकर बैठ गए।
मेरे पास बैठा व्यक्ति लगातार नींद निकाल रहा था। में ओब्जर्वेशन डेक में बैठा था तब पीछे से उसने हमारी अगली सीट पर बैठे एक दिव्यांग व्यक्ति को दे दिया था जिससे सभी उसकी थू थू कर रहे थे। मेरे सामने की तरफ बैठी हॉट की युवती निरन्तर इसकी आलोचना किये जा रही थी। मैंने अपने झोले से डिया और सब्जी निकाली और खाने का काम पूरा किया। लाउन्ज से उठाई सामग्री भी काम में आ गई। ठंड तो थी। मेरे पास जो जेकेट था उसकी जीप पूरी बन्द करके पिछली ट्रेन में खरीदी कम्बल तान ली और कुर्सी को लम्बी कर सो गया।
रात में केन्सास राज्य के कई स्टेशन निकल गए। सुबह नींद खुली तो हम कोलोरेडो प्रदेश में प्रवेश कर चुके थे। ट्रेन यात्रा के दो दिन सकुशल पूर्ण हो गये थे और तीसरे दिन की यात्रा शुरू हो गई थी। माईक पर निरन्तर घोषणा हो रही थी कि यात्रीगण बाथरूम का प्रयोग करते वक्त डायपर, सेनेट्री नेपकीन वगैरा फ्लश नहीं करें वरना कमोड चोक हो जाएंगे। इससे प्रतीत होता था कि यह अक्सर पेश आने वाली समस्या थी। मुझे लगा कि पिछली ट्रेन जैसे इसमें भी बाथरूम गन्दे और अटे पड़े न हों। सुबह का वक्त था, इनका प्रयोग इस समय ज्यादा ही होता है मगर बाथरूम बहुत थे इसलिये लाइनें ज्यादा लम्बी नहीं थी। मैं भी यही आशंका लिये गया कि बाथरूम कहीं गन्दे न हों मगर अच्छी साफ सफाई थी तथा सामग्री भी सभी उपलब्ध थी, पानी भी पूरा आ रहा था।
ताजा होकर मैं ओब्जर्वेशन डेक में आकर बैठ गया। यहां कई लोगों से दोस्ती हो गई थी, ज्यादातर लोग पर्यटन हेतु ही इस ट्रेन से यात्रा कर रहे थे।
मेरे पास ही एक गोरा अमरीकी व्यक्ति बैठा था, वह बास्केटबाल खेल का प्रेमी था। सीयाटल में दो तीन दिन बाद कोई मैच होने वाला था, उसे देखने वह सियाटल जा रहा था। वह शिकागो से आसानी से सियाटल की उड़ान ले सकता था मगर इस ट्रेन यात्रा का आनन्द उठाने ही वह लॉस एन्जलेस तक इससे यात्रा कर रहा था और वहां से वह विमान पकड़ कर सियाटल जाने वाला था।
मैं भारत से हूं यह जानने के बाद उसने कहा कि उसकी भी भारत आने की इच्छा है। दरअसल उसके बेटे की मित्र एक भारतीय युवती ही है जिसका नाम उसने बिन्दु बताया। वो कह रहा था कि लड़की के माता पिता बहुत धनवान है जिस कारण लड़की अनाप शनाप खर्चा करती है, मेरा लड़का इतना खर्चा नहीं कर सकता। मैंने बरबस ही उससे पूछ लिया कि क्या दोनों शादी कर रहे हैं तो उसने कहा कि अभी तो दोनों पढ रहे हैं। शादी करना है, नहीं करना है, यह दोनों लड़का- लड़की ही तय करेंगे, न तो लड़की के माता पिता और न ही हम इस मामले में कोई दखलंदाजी कर सकते हैं।
अब मैंने उससे यह पूछ लिया कि मान लो आपका लड़का बिन्दु से शादी कर लेता है तो आपको कैसा लगेगा। उसने कहा अच्छा लगेगा क्यूंकि बिन्दु बहुत है अच्छी और समझदार लड़की है। उसकी इस बात से मुझे मन ही मन बहुत खुशी हुई फिर भी मैंने उससे पूछा कि आप तो कह रहे थे कि मां बाप ने उसे पैसे देकर बिगाड़ रखा हैं, तो उसने कहा खर्चा ज्यादा भले ही करती है मगर लड़की अच्छी है, हमारे घर पर आती रहती है और सब उसे पसन्द करने लगे हैं। बहुत तीसरी चौथी पीढ़ी के भारत वंशी लड़के लड़कियां आजकल निःसंकोच अमरीकियों से शादी कर रहे हैं, इन लोगों ने भारत देखा ही नहीं, अमेरिका में ही पैदा-पले बढ़े, अमरीकियों की तरह ही बोलते चाहते रहते-खाते तो इनको यहां के अपने साथी ही ज्यादा पसन्द आते हैं।
दरअसल अमेरिका में भारतीयों के प्रति दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन आया है। गोरे नहीं होने के कारण भारतीयों को भी अश्वेतों की तरह ही नफरत से देखा जाता था। गोरे लोगों की बस्तियों में भारतीयों को मकान तक किराये पर नहीं मिलते थे। पैसों के बलबूते दो चार भारतीय अगर गोरों की बस्ती में मकान खरीद लेते थे तो उस बस्ती में रहने वाले गोरे एक एक कर मकान छोड़ कर चले जाते थे। जो गोरे कुछ साल भारतीयों के पड़ौस में बिता देते हैं वो मानने लगते हैं कि भारतीयों के प्रति जो उनके मन में नफरत थी वह गलत थी। भारतीयों से बढ़िया पड़ौस कोई हो ही नहीं सकता। ये सहयोगी और उदार तो हैं ही मगर रिश्ता एसा निमाते है जैसे अपने ही हों। यही कारण है कि कई बस्तियों में जहां गोरे अपने मकान बेच कर चले गये, वहां भारतीय आ गये और बस्तियों के दाम बढ़ने लगे तो गोरे लोग फिर आकर बसने लगे हैं। इस तथ्य के बावजूद भी गोरों द्वारा भारतीयों के प्रति भेदभाव के किस्से आये दिन सुनने को मिलते हैं।

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