Challenge of building trust

केंद्रीय बलों की भारी तैनाती करने तथा हिंसाग्रस्त इलाकों से हजारों लोगों को निकालने के बाद अब पूर्वोत्तर के मणिपुर (Manipur) में स्थिति पहले की तुलना में सामान्य जरूर नजर आ रही है, लेकिन राज्य के दो प्रमुख समुदायों के बीच पैदा अविश्वास को देखते हुए लंबे समय तक सावधानी बरते जाने की आवश्यकता है। सरस तौर पर राज्य के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति की मांग करने के विरोध में पिछले दिनों आदिवासियों ने जो प्रदर्शन किया था, वही भीषण हिंसा में तब्दील हो गया, जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान गई। लेकिन ध्यान से देखें, तो राज्य की स्थिति बिगड़ने के और भी कारण थे । उदाहरण के लिए, विगत फरवरी से सरकार ने पहाड़ी इलाकों में अतिक्रमण के खिलाफ जो अभियान चलाया, उससे कुकी आदिवासियों में क्षोभ पैदा हुआ, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में रहने के कारण इस अभियान से वही सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे थे। इसके अलावा मार्च के अंत में मणिपुर उच्च न्यायालय
(High Court)
ने राज्य सरकार (State government) को मैतेई समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करने के लिए जिस तरह कहा, उससे भी आदिवासियों में असंतोष पनपा। दरअसल स्थानीय आदिवासियों की आशंका यह है कि मैतेई समुदाय को अगर आदिवासी का दर्जा दे दिया जाता है, तो इससे उनके हितों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसी कारण उन्होंने रैली निकाली थी, जो हिंसा में परिणत हो गई। जाहिर है, राज्य के एक समुदाय में सरकार और दूसरे समुदाय के खिलाफ अविश्वास और असंतोष की भावना धीरे- धीरे और कई कारणों से पैदा हुई, लेकिन राज्य सरकार अगर इसे समय रहते भांप ही नहीं पाई, तो यह खुफिया मोर्चे पर उसकी गंभीर चूक थी। अपनी नस्लीय और सांस्कृतिक विविधता (Cultural diversity) के लिए प्रसिद्ध होने के बावजूद जो राज्य पिछले कई दशकों से उग्रवाद और आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है, वहां यह चूक सामान्य नहीं है, क्योंकि उग्रवादी ऐसी ही अशांति का फायदा उठाते हैं। यह अचानक नहीं है कि इसी हिंसा के बीच चुराचांदपुर में मुठभेड़ की दो अलग- अलग घटनाओं में कुछ उग्रवादी भी मारे गए। सरकार की सक्रियता से अब मणिपुर में धीरे-धीरे स्थिति सामान्य तो हो जाएगी, लेकिन दो समुदायों के बीच आपसी भरोसा और विश्वास बहाल करने की चुनौती अब भी ज्यादा बड़ी है।
Editorial

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