Reservation based on religion
हृदयनारायण दीक्षित
पंथ मजहब आधारित आरक्षण या विशेषाधिकार समता के मूल अधिकार का अतिक्रमण हैं। ऐसे विशेषाधिकार राष्ट्रीय एकता-अखंडता के भी शत्रु हैं ....
गरीबी (Poverty) और अभाव पंथ मजहब आधारित नहीं होते। भारत भी धर्म, पंथ, मजहब या रिलीजन विश्वासी समूहों के करार का परिणाम नहीं है। यह संप्रभु संवैधानिक सांस्कृतिक राष्ट्र है। पंथ मजहब आधारित आरक्षण या विशेषाधिकार समता के मूल अधिकार का अतिक्रमण (Encroachment) हैं। संविधान के अनुच्छेद 15 में 'पंथ, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेद का निषेध है।' मगर यहां मजहबी आधार पर आरक्षण है। कर्नाटक सरकार (Government of Karnataka) ने मुस्लिमों को मिलने वाले चार प्रतिशत पंथ आधारित आरक्षण को उचित ही समाप्त किया है। उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के 10 प्रतिशत कोटे में शामिल किया गया है। मुस्लिमों को मिल रहा चार प्रतिशत आरक्षण अब वोक्कालिगा और लिंगायत में समायोजित कर दिया गया है। इस पर राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि हम सत्ता में आने के बाद इसे बहाल करेंगे। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।
संवैधानिक विषयों पर विचार के लिए संविधान सभा की कार्यवाही महत्वपूर्ण है। विभिन्न समुदायों को विशेष रक्षोपाय के लिए सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में 'अल्पसंख्यकों, मूलाधिकारों आदि संबंधी परामर्शदात्री समिति' गठित की थी। समिति की सिफारिशों पर सभा की एक बैठक अगस्त 1947 में हुई थी। उसमें पटेल ने कहा था, 'पूर्वी पंजाब और पश्चिम बंगाल में कुछ कठिनाइयां हैं। इस प्रश्न पर आगे विचार होगा।' डा. राधाकृष्णन ने कहा था, 'हम समिति की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हमने कुछ संशोधन किए हैं। हम सुव्यवस्थित प्रजातांत्रिक राज्य की स्थापना कर रहे हैं।' संविधान सभा में 25-26 मई, 1949 को बहस हुई। पटेल ने कहा, 'पूर्वी पंजाब और प. बंगाल को लेकर हमारे सुझाव अपूर्ण थे । विभाजन का प्रभाव अज्ञात था । इसलिए इस पर विचार करने के लिए एक उपसमिति नियुक्त की गई थी। उपसमिति ने प्रतिवेदन दिया। कुछ मुस्लिम प्रतिनिधियों ने संविधान पारित होने के बाद कहा था कि अब सब रक्षण समाप्त हो जाने चाहिए। यह अल्पसंख्यकों के हित में है।' पटेल ने कहा कि, 'एक असांप्रदायिक राज्य के लिए और अल्पसंख्यकों के हित में अच्छा यही है कि वे बहुसंख्यकों की सद्भावना तथा न्याय बुद्धि पर विश्वास करें।' मोहम्मद इस्माइल ने कहा कि, 'प्रतिवेदन के अनुसार अल्पसंख्यकों ने स्वयं माना है कि रक्षण समाप्त करना चाहिए। मैं नहीं जानता कि समिति कैसे संतुष्ट हो गई। मेरा दावा है कि समूचा मुस्लिम समुदाय रक्षण छोड़ने के पक्ष में नहीं है। एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करने के लिए मजहब को आधार बनाने में कोई हानि नहीं है।' वह पंथ- मजहब आधारित विभाजन को उचित मान रहे थे। जेडएच लारी ने कहा, 'अल्पसंख्यकों को राष्ट्र का अभिन्न अंग बनने का प्रयत्न करना चाहिए।' उन्होंने आगे कहा कि, 'आपको अनुसूचित जातियों के हितों की चिंता है। मुसलमानों की चिंता नहीं है।' एस. नागप्पा ने कहा, 'हम नहीं समझते कि हमें पंथक अल्पसंख्यक होने के कारण आरक्षण मिल रहा है। हमारे साथ दुर्व्यवहार हुआ। फिर भी हम धर्म पर अड़े रहे हम अनुसूचित जातियों ने देश पर अरब से आक्रमण नहीं किया है।' नजीरुद्दीन अहमद ने कहा, 'मुस्लिमों के लिए स्थानों का रक्षण मुस्लिमों के लिए ही हानिप्रद होगा।' सभा के उपाध्यक्ष डा. एचसी मुखर्जी ने कहा, 'हम मजहब आधारित अल्पसंख्यकों को मान्यता नहीं दे सकते। पंथक वर्गों के लिए रक्षण तत्काल समाप्त हो जाने चाहिए।' आरके सिंधवा ने कहा, 'सांप्रदायिक संघर्ष के कारण भारी बर्बादी हुई है। समझ नहीं आता कि लोग अभी भी सांप्रदायिक रक्षण क्यों चाहते हैं।' इसी क्रम में पं. नेहरू ने कहा, 'मेरे सहयोगी उपप्रधानमंत्री ने प्रस्ताव रखा है। इसका अर्थ है कि जो बात बुरी है हम उसका त्याग कर रहे हैं । हम सदा के लिए इसे समाप्त कर रहे हैं। पृथक निर्वाचन और सभी पृथकतावादी बातों से देश का भयानक अहित हुआ है। सभी वर्ग अपनी विचार प्रणाली अपना सकते हैं, मगर यह अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक पंथ आदि के आधार पर नहीं किया जा सकता। मैं समझता हूं कि स्थान रक्षण की व्यवस्था को उठा लेना ही सिद्धांततः सही है । ' तजम्मुल हुसैन ने कहा, 'हम अल्पसंख्यक नहीं हैं। यह शब्द अंग्रेजों ने निकाला था। वे चले गए। अब इस शब्द को डिक्शनरी से निकाल देना चाहिए।' तब अनुसूचित जातियों के आरक्षण पर लगभग सभी सदस्य सहमत थे, मगर मजहब -रिलीजन के आधार पर रक्षण देने का विरोध लगभग सभी सदस्यों ने किया। खरगे को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
दो दिसंबर, 1948 को संविधान सभा में मोहम्मद इस्माइल और मोहम्मद ताहिर ने अल्पसंख्यक रक्षोपाय के प्रश्न उठाए । मौलाना हजरत मोहानी ने आवेश में आकर कहा कि अगर किसी के दिमाग में है कि वह पर्सनल ला में दखल दे सकता है तो उससे कहूंगा कि इसका नतीजा बुरा होगा। कार्यवाही में धमकी भरे आपत्तिजनक अंश नहीं छापे गए। जब पूरा देश विभाजन को लेकर व्यथित था तब दारूल उलूम देवबंद के तत्कालीन कुलपति ने कहा था, 'हम पाकिस्तान को एक इस्लामी राज्य होने के नाते बधाई देते हैं, लेकिन चिंता यह है कि जो मुसलमान भारत में रह गए हैं, अब वे और भी अल्पसंख्यक हैं। इस देश में उनके सामूहिक जीवन का क्या होगा ? शरीयत -ए-पाक के मुताबिक सिर्फ एक ही रास्ता है कि वे अपने शरीय संगठन कायम करें। हिंदुस्तान की मुस्लिम जमातें और फिरकें एक हों ।' यानी उनका आशय यही था कि वे अलग रहना चाहते हैं और सेक्युलर राज्य नहीं मानते ।
सांप्रदायिकता को लेकर न्यायालयों ने भी कई मार्गदर्शन दिए हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायपीठ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात भी है। 2005 में सर्वोच्च न्यायपीठ ने अल्पसंख्यकवाद की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का परामर्श दिया कि रिलीजन- मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक दावों को महत्व देने से विशेष संरक्षण की मांग को बढ़ावा मिलेगा। मजहब आधारित सिद्धांत से एक नए विखंडन का सामना करना पड़ सकता है। संविधान सभा और न्यायालयों के निर्देश मार्गदर्शी हैं। संविधान निर्माता एक मजबूत राष्ट्र चाहते थे। कर्नाटक मामले में संविधान सभा की बहसें मार्गदर्शी और राष्ट्रहितकारी हैं। वस्तुतः, पंथ मजहब आधारित विशेषाधिकार राष्ट्रीय एकता-अखंडता के शत्रु हैं। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)
Editorial

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