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कर्नाटक से जो नदारद है
By EditorialPublished on
किसने, किसको, कब, क्या कहा, मैं यहां इसकी तफसील नहीं देने जा रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव -दर-चुनाव पनपता यह सिलसिला खुद को संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र (Democracy) बताने वाले देश के राजनेताओं (Politicians) को शोभा नहीं देता । हमारे राजनेताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जय- पराजय से ज्यादा जरूरी उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है, जिन्हें पुरखों ने हमें सौंपा है।
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शशि शेखर
किसने, किसको, कब, क्या कहा, मैं यहां इसकी तफसील नहीं देने जा रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव -दर-चुनाव पनपता यह सिलसिला खुद को संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र (Democracy) बताने वाले देश के राजनेताओं (Politicians) को शोभा नहीं देता । हमारे राजनेताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जय- पराजय से ज्यादा जरूरी उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है, जिन्हें पुरखों ने हमें सौंपा है।
वाकया मार्च 1948 का है। सत्तारूढ़ वाकया कांग्रेस आजादी (Congress freedom) के बाद अपना पहला विभाजन देखने जा रही थी। समाजवादी सिद्धांतों के पुरोधा आचार्य नरेंद्र देव और उनके साथियों ने 'सोशलिस्ट पार्टी' के गठन का निर्णय किया था। इस मौके पर आचार्य नरेंद्र देव ने कहा था- 'हमने कांग्रेस से अलग होने का निर्णय किसी शत्रुता या निरर्थक विरोध की भावना से प्रेरित होकर नहीं किया है। हममें कटुता की भावना नहीं है । हमारे बहुत से सहयोगी और मित्र कांग्रेस (Congress) में हैं और उनके साथ हमारे संबंध सदा मधुर रहेंगे । '
इस फैसले पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत की आंखें नम हो आई थीं और पुरूषोत्तम दास टंडन ने टिप्पणी की थी- 'राजनीति एक विचित्र चीज है। इसमें विभाजन की सदा आशंका बनी रहती है... जो लोग अलग हो रहे हैं, उनके आदर्श यदि केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों से पृथक हैं, तब तो उनका पृथक होना उचित है, किंतु यदि शासन का भार संभालने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं, तब भी हम उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकते। सत्ता प्राप्ति की भावना एक स्वाभाविक भावना है।'
अब आते हैं साल 1975 पर। इसी साल इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने आपातकाल की घोषणा की थी। कांग्रेस के लिए तमाम आघातों की आधारशिला भी उसी के साथ रख दी गई थी। हालांकि, इंदिरा गांधी की मुसीबतों का सिलसिला महीनों पहले शुरू हो चुका था। 5 दिसंबर, 1975 को मुंबई के जसलोक अस्पताल से इंदिरा गांधी को लिखा जयप्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan) का यह खत इसका जीवंत आभास देता है- 'प्रिय प्रधानमंत्री, आपने विपक्ष पर देश के प्रधानमंत्री के पद की प्रतिष्ठा और गरिमा को कम करने का आरोप लगाया है, लेकिन वास्तव में इस महान पद की प्रतिष्ठा को गिराने का काम आपसे अधिक किसी अन्य ने नहीं किया। क्या आप किसी लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री के बारे में यह कल्पना भी कर सकती हैं कि वह अपनी ही संसद में वोटिंग में भाग नहीं ले सकता, क्योंकि अदालत ने उसे चुनावों में कदाचार का दोषी करार दिया है?"
इसी पत्र में जेपी आगे लिखते हैं- 'क्या मेरी सलाह सुनेंगी? कृपया, उस बुनियाद को तहस- नहस न करें, जिसे राष्ट्रपिता (Father of the nation) के साथ-साथ आपके महान पिता ने रखा है। जिस मार्ग पर आप चल पड़ी हैं, उसमें संघर्ष और पीड़ा के सिवा कुछ भी नहीं है। आपको एक महान परंपरा, महान मूल्य और एक क्रियाशील लोकतंत्र विरासत में मिला है। इनको मलबे में तब्दील मत कीजिए। इन सबको फिर से खड़ा करने में काफी समय लगेगा। पर मुझे यकीन है कि ये खड़े जरूर होंगे । '
बताने की जरूरत नहीं कि सन् 1977 में इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल हटाया और आम चुनाव हुए, तो जनादेश ने उन्हें समूचे तौर पर नकार दिया। इस पराभव की जड़ में जेपी थे, इसके बावजूद दोनों के बीच कटुता नहीं पनप सकी। बाद में एक दिन जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी से मिलने उनके सरकारी आवास पर गए। पिता का मित्र होने के नाते वह इंदिरा गांधी और उनके परिवार को लेकर चिंतित थे । इस मौके पर उनकी वत्सलता फूट पड़ी- 'इंदू, तुम अब पद पर नहीं रही, तो तुम्हारा घर खर्च कैसे चलेगा?' इंदिरा जी का जवाब था कि पापा की किताबों की जो रॉयल्टी मिलती है, उससे हमारा गुजारा हो जाएगा। जेपी ने उन्हें आश्वस्त किया था कि जनता पार्टी की सरकार उनके खिलाफ प्रतिशोध की भावना से कोई कार्रवाई नहीं करेगी। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के समक्ष उन्होंने अपनी यह अपेक्षा भी व्यक्त की थी।
यह बात अलग है कि 'संपूर्ण क्रांति' के जनक की इस सदिच्छा को उनके ही शिष्यों ने ठुकरा दिया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ जयंतीलाल छोटेलाल शाह की अगुवाई में जांच आयोग बैठाया गया। वह पहले दिन से इस आयोग को खुद को परेशान करने का जरिया बताने लगीं। आने वाले दिनों में उनकी गिरफ्तारी (Arrest) और रिहाई ने इसे जन-स्वीकृति दिला दी। राजनीति में इस स्तर पर प्रताड़ना और 'विक्टिम कार्ड' खेलने की त्रासद शुरूआत हुई। दोनों प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना करने वाले परस्पर एक- दूसरे के विपक्षी थे और दोनों ही नहीं जानते थे कि वे ऐसी रवायत शुरू कर रहे हैं, जिसका शिकार वे, उनके पार्टीजन और सियासत में हाथ आजमाने की तमन्ना के साथ जन्मी अगली नस्लें होंगी। आज की राजनीति पर नजर डाल देखिए, दोनों प्रवृत्तियां एक साथ फलती-फूलती नजर आएंगी।
कर्नाटक का मौजूदा विधानसभा चुनाव इसका जीता जागता उदाहरण है।
पिछले दिनों कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (Mallikarjun kharge) ने अपनी एक जनसभा में प्रधानमंत्री की तुलना जहरीले सांप से कर दी । खड़गे पुराने दौर के नेता हैं। भूल का एहसास होते ही उन्होंने बिना समय गंवाए स्पष्टीकरण दे दिया, पर प्रधानमंत्री और भाजपा को मौका मिल गया था। बात शायद और तूल न पकड़ती, यदि खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे ने बाद में प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द का प्रयोग न किया होता। भाजपा इसे भी मुद्दा बना रही है। मुझे मालूम नहीं कि मतदाता इस विवाद से कितने प्रभावित होंगे, पर लोकतंत्र की गंगा अवश्य ऐसी करतूतों से प्रदूषित होती जाती है।
हम चुनाव-दर-चुनाव इस वैचारिक प्रदूषण को सहन करने के लिए अभिशप्त हैं।
किसने, किसको, कब, क्या कहा, मैं यहां इसकी तफसील नहीं देने जा रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव -दर- चुनाव पनपता ह सिलसिला खुद को संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र बताने वाले देश के राजनेताओं को शोभा नहीं देता। हमारे राजनेताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जय-पराजय से ज्यादा जरूरी उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है, जिन्हें पुरखों ने हमें सौंपा है।
यह बेवजह नहीं है कि चुनावों की घोषणा होते ही तटस्थ लोग कंपकंपाने लगते हैं। वे जानते हैं कि अगले कुछ दिन कीचड़ से महास्नान के हैं। एक शोध के अनुसार, 2024 के आम चुनाव : में 17.5 करोड़ के करीब युवा वोटर मताधिकार का प्रयोग करेंगे। वे किन मुद्दों पर वोट डालेंगे? क्या हर मतदाता राजनीतिक दलों के घोषणापत्र पढ़कर उनकी 'बैलेंस शीट' बनाता है? सब जानते हैं कि यह संभव नहीं है। ऐसे में, नेताओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने काम का लेखा-जोखा लेकर जनता के समक्ष हाजिर हों, पर उनके काम, वायदों की तुलना में आधे भी नहीं होते। यही वजह है कि राजनीतिज्ञों की ज्यादातर जमात लोगों का ध्यान बांटने की कोशिश करती नजर आती है। ऐसा कर हम अपनी नई पीढ़ी को वास्तविक मुद्दों की जगह क्या भड़काऊ भावनाओं पर मतदान के लिए प्रेरित नहीं कर रहे?
इस पनपते प्रचलन को रूकना चाहिए, पर रोकेगा कौन? सियासत के हम्माम में सब एक जैसे हैं।

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