Congress
राज कुमार सिंह
बिना विपक्षी एकता के कांग्रेस (Congress) भाजपा (BJP) से मुकाबला नहीं कर पाएगी और इसमें भी उसका जनाधार बढ़ने की उम्मीद कम है...
कर्नाटक में त्रिकोणीय चुनावी मुकाबले के बावजूद नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का विपक्षी एकता मिशन कितना सफल हो पाएगा, समय ही बताएगा, लेकिन देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल कांग्रेस आगे कुआं-पीछे खाई जैसी स्थिति से रूबरू है। कभी जिस कांग्रेस ने देश-प्रदेशों पर एकछत्र राज किया, उसकी अपनी हैसियत अब महज सात राज्यों तक सिमट गई है। राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक ही ऐसे राज्य हैं, जहां कांग्रेस को भाजपा का मुकाबला करने के लिए किसी अन्य दल के साथ की जरूरत नहीं ।
राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हिमाचल में कांग्रेस की सरकारें भी हैं, पर विडंबना यह है कि विधानसभा चुनावों में सत्ता हासिल कर लेने वाली कांग्रेस लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने टिक नहीं पाती। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनावों के चंद महीने बाद ही लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) हुए तो परिणाम चौंकाने वाले आए। मध्य प्रदेश में कांग्रेस 29 में मात्र एक लोकसभा सीट जीत पाई। राजस्थान में 25 में 24 सीटें भाजपा जीती और शेष एक तब उसके सहयोगी रहे रालोपा प्रमुख हनुमान बेनीवाल। इस लिहाज से छत्तीसगढ़ ने कांग्रेस की थोड़ी सी इज्जत बचा ली, जहां वह 11 में से 2 सीटें जीतने में सफल रही, जबकि शेष 9 भाजपा की झोली में गईं।
अब जिस कर्नाटक (Karnataka) में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहां पिछली बार भी कांग्रेस ने 77 सीटें जीत कर अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन साल भर बाद हुए लोकसभा चुनाव में पासा पलट गया। 28 में से 25 सीटें भाजपा जीत गई। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर को एक-एक सीट पर संतोष करना पड़ा। इनके अलावा बिहार, झारखंड और तमिलनाडु में भी कांग्रेस सत्ता में तो शामिल है, पर उसकी हैसियत बहुत जूनियर पार्टनर की है। जिस बिहार (Bihar) से लोकसभा के 40 सांसद चुने जाते हैं, वहां कांग्रेस सत्तारूढ़ महागठबंधन में राजद और जदयू के बाद तीसरे नंबर की पार्टी है । शिवसेना (Shivsena) में बगावत के बाद महाराष्ट्र में जो महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई, उसमें भी कांग्रेस तीसरे नंबर की ही पार्टी थी। जाहिर है, जिन राज्यों में कांग्रेस दूसरे-तीसरे या उससे भी निचले नंबर पर फिसल गई है, वहां क्षेत्रीय दलों का दबदबा है। इनमें से ज्यादातर दल या तो पूर्व कांग्रेसियों ने बनाए हैं या फिर उन्होंने कांग्रेस से उसका परंपरागत जनाधार छीन लिया है।
यही जमीनी राजनीतिक सच और दलीय हितों का टकराव बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विपक्षी एकता की मुहिम में बड़ी समस्या हैं। भला ये दल क्यों चाहेंगे कि उनके प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पा कर फिर से खड़ी हो जाए ? मसलन कभी कांग्रेस की नेता रहीं ममता बनर्जी ने अपने दम पर बंगाल की सत्ता वाम मोर्चा से छीनी, जिसने तीन दशक से भी ज्यादा समय तक वहां राज किया था। अब वहां तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता में है तो इस बार भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई है, जबकि कांग्रेस- वाम वहां नाम के लिए ही बचे हैं। यही स्थिति आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी
(Jagan Mohan Reddy)
और तेलंगाना (Telangana) के मुख्यमंत्री केसीआर की है। अपने पिता राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद उनकी जगह मुख्यमंत्री बनने का दबाव बनाने पर कांग्रेसनीत तत्कालीन केंद्र सरकार ने जगन का जैसा उत्पीड़न किया, उसे वह भूले नहीं होंगे। फिर मोदी सरकार से उनके रिश्ते अच्छे ही रहे हैं। हां, अगर उनके कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी चंद्रबाबू नायडू वापस राजग में गए तो रणनीतिक रूप से जगन संप्रग में जा सकते हैं, पर अपनी शर्तों पर, जिनमें कांग्रेस के लिए आंध्र में अपने पैरों पर खड़े होने की जगह नहीं मिलेगी। यही रणनीति तेलंगाना में केसीआर की रहेगी।
महाराष्ट्र (Maharashtra) की राजनीति में तूफान आने के संकेत तमाम जानकार दे रहे हैं, पर तय है कि वहां भी पैर फैलाने की ज्यादा जगह उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस को नहीं देंगे। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र से ही सर्वाधिक 48 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अभी तक किसी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का संकेत नहीं दिया है। सत्तारूढ़ गठबंधन में उन्होंने कांग्रेस को सम्मान भी दिया है, पर अन्नाद्रमुक की कमजोरी के बाद उन पर ज्यादा राजनीतिक दबाव नजर नहीं आता।
अब वापस उत्तर भारत लौटते हैं। आम आदमी पार्टी कांग्रेस से दिल्ली और पंजाब की सत्ता छीन चुकी है। इसके बावजूद आप के
संयोजक अरविंद केजरीवाल के स्वर कांग्रेस के प्रति इधर बदले हैं तो शायद इसलिए कि भ्रष्टाचार का शिकंजा कसते - कसते खुद उन तक पहुंच गया है और विपक्षी नेताओं को लगता है कि अगले लोकसभा चुनाव के लिए ही नहीं, बल्कि केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता के मुकाबले के लिए भी एकता जरूरी है। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को खोई जमीन पाने का मौका तो हरगिज नहीं देगी। केंद्र की सत्ता का रास्ता आज भी उत्तर प्रदेश से ही निकलता है, जहां से सर्वाधिक 80 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं। पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां एकतरफा जीत हासिल की। दो दशक तक यहां राज करनेवाले सपा-बसपा भी हाशिये पर फिसल गई हैं। कांग्रेस तो किसी गिनती में ही नहीं बची। राहुल गांधी तक अमेठी से पिछली बार हार गए। सिर्फ सोनिया गांधी रायबरेली से जीत पाईं। फिर भला सपा या बसपा भी, क्यों कांग्रेस को दोबारा पनपा कर अपने लिए खतरा बनने देंगी? कांग्रेस ऐसे दोराहे पर पहुंच गई है कि बिना विपक्षी एकता भाजपा का मुकाबला मुमकिन नहीं और एकता में भी उसके जनाधार बढ़ाने तक पर अंकुश रहेगा- नेतृत्व तो बहुत दूर की कौड़ी है।
Editorial

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