Suresh Goyal
हमारा अगला पड़ाव मोन्ट्रीयल था। यह नाम माउन्ट रोयल के कारण पड़ा। कभी यह कनाडा का सबसे बड़ा शहर था मगर राजधानी बन जाने के बाद टोरन्टो इससे आगे बढ़ गया फिर भी कनाडा की औद्योगिक राजधानी तो आज भी यही है। ठीक उसी तरह जैसे हमारे यहां मुम्बई और दिल्ली। हमारे यहां भी कभी कलकत्ता देश का सबसे बड़ा शहर हुआ करता था, औद्योगिक राजधानी थी मगर दशकों के कम्युनिस्ट राज से पिछड़ता गया और मुम्बई इससे आगे बढ़ गया।
रास्ते में दोनों तरफ छोटे-बड़े शहर आते जा रहे थे मगर इनमें जाने के लिये एक्जीट लेना पड़ता था। हर शहर में एक पानी की टंकी थी जो बहुत दूर से दिखाई पड़ जाती थी, टंकी पर शहर का नाम लिखा होता । रास्ते में हमें जगह जगह ढेर सारे ट्रेलर्स पड़े हुए नजर आये ये चलते फिरते घर थे जो वाहनों के साथ जुड़ जाते हैं। ये किराये के लिए उपलब्ध थे लोग छुट्टियां मनाने कहीं जाते हैं तो इन्हें किराये पर ले लेते हैं और इसी में रहते, खाते-पीते, सोते है। ट्रेलर में किचन, बाथरूम, पलंग, बैठक सब होते हैं विभिन्न स्थानों पर इन ट्रेलरों के लिये ट्रेलर पार्क बने होते हैं. यहां पर गेस, पानी, बिजली आदि की सब सुविधा होती है।
ये ट्रेलर भी दो तरह के होते हैं, एक तो वे जो वाहनों से जुड़ कुछ दिन छुट्टी मनाने के लिये होते हैं, दूसरे इनसे बड़े होते हैं जो स्थाई घर का काम करते हैं। इन ट्रेलरों में अक्सर रिटायर्ड या वृद्ध लोग रहते हैं। इनकी भी कोलोनियां बन जाती हैं, सरकार इनके लिये स्थान प्रदान करती है जहां गेस, बिजली, पानी का कनेक्शन आसानी से मिल जाता है। इनकी कई कई कोलोनियां तो इतनी बड़ी होती है कि जैसे पूरा गांव बस गया हो। इन्हें अमेरिका में ट्रेलर पार्क कहा जाता है। कई बार इन पार्कों में 55 साल से कम उम्र के लोगों के ट्रेलर को प्रवेश नहीं दिया जाता।
इन चलित घरों में रहने का चलन इतना बढ़ गया है कि अमेरिका में कम रकम दो करोड़ लोग इनमें रहते हैं। अपेक्षाकृत सस्ते जीवन यापन के कार साधारण अमरिकियों की इनमें रूची बढती जा रही है। इनसे अमेरिका की छवि बड़ा आघात लग रहा है, दूसरे शब्दों में कहें तो इनकी तुलना हमारे यहां की क
बस्तियों से की जा सकती है। यहां रहने वालों को अल्प आय वर्ग और गरीबी रे से नीचे जीवन यापन करने वाले करार दिया जाता है। अमेरिका में अक्सर बड़े टोरनेडो और हरीकेन तूफान आते रहते हैं जिनसे इन ट्रेलर पाक को भारी पहुँचती है। हमारे यहां भी गाड़ोलिया लोहारों का समुदाय बरसों से गाड़ियों हुए ही अपनी जिन्दगी गुजार देता है। क्षति
पिछले बरसों अमेरिका में जो आर्थिक मंदी आई उससे रातों रात लाखो लोग बेघर हो गये। इससे इस तरह के पार्कों की मांग और बढ गई। इन पार्कों में रहने वाले भले ही गरीब हों मगर इनके मालिक अनाप शनाप कमाई करते हैं। कई पार्क वेश्यावृति, नशीले पदार्थों और अपराधियों के अड्डे भी बन गये हैं।
अमेरिका में आजकल यह भी हो गया है कि बच्चे ज्यू ही आत्म निर्भर हो घर संभाल लेते हैं तो अपने माता-पिता को ट्रेलर पार्क में छोड़ आते हैं। साल में एक या दो बार उनसे मिलने चले जाते हैं, नहीं गये तो नहीं भी गये। अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति को सोशल सिक्यूरिटी पेन्शन मिलती है। हमारे यहां तो वृद्धावस्था पेंशन विधवा पेंशन वगैराह को छोड़ कर आम आदमी के लिये कोई पेन्शन नहीं है जबकि आम आदमी के पैसों से ही सरकारी कर्मचारियों को भारी भरकम पेन्शन दी जाती है। अपने आधार कार्ड की तरह यहां के प्रत्येक नागरिक को सोशल सिक्यूरिटी नम्बर मिलता है। पौने बांसठ साल की उम्र होते ही यदि किसी नागरिक की कोई आय नहीं है तो उसे पेन्शन मिलना शुरू हो जाती है। यह पेन्शन इतनी होती है कि न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से हो जाती है।
अमेरिका में गरीब से गरीब से लेकर अमीर से अमीर व्यक्ति तक को पेन्यान मिलती है। सरकार का 37 प्र.श. खर्चा इस पेन्शन पर ही हो जाता है जो 1300 बिलीयन डालर होता है। यह पेन्शन दो तरह की होती है। एक उन्हें मिलती है। जिन्होंने अपने इनकम टेक्स के साथ सोशल सिक्यूरिटी टेक्स जमा कराया होता है। जिसने जितना अधिक टेक्स जमा कराया उसे उतनी ही अधिक पेन्शन मिलती है मगर इसकी भी एक अधिकतम सीमा है, किसी ने कितना भी टेक्स जमा कराया हो इस सीमा से अधिक पेन्शन उसे नहीं मिलती। एसी पेन्शन लेने वाले अमेरिका छोड़ दुनिया के किसी भी कोने में रहें तो उन्हें घर बैठे पेन्शन मिल जाती है।
उदयपुर में मेरा एक मित्र है वह 10-12 साल अमेरिका में रहा, उसे सोशल सिक्यूरिटी नम्बर मिल गया। रिटायरमेन्ट के बाद वह उदयपुर आ गया, उसे घर बैठे हजार डालर की पेन्शन मिल जाती है, भारतीय मुद्रा में यह 60 हजार रू. से भी अधिक हो जाती है। और क्या चाहिये।
कई अमरीकी भारतीय आजकल यही करने लगे हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं, काम धंधा संभाल लेते हैं, खुद की पेंशन शुरू हो जाती है तो भारत आकर फ्लेट खरीद लेते हैं। पति पत्नी दोनों की पेंशन से ठाठ का जीवन यापन करते हैं। दूसरी तरह की सोशल सिक्यूरिटी पेन्शन उन लोगों को मिलती है जिन्होंने सोशल सिक्यूरिटी टेक्स जमा नहीं कराया। ये गरीब, असहाय और वृद्ध लोग होते हैं। अमेरिका के नागरिक बन गये कई भारतीयों के माता पिता जब उनके साथ रहने आ जाते हैं तो यह पेन्शन उन्हें भी मिलने लगती है, मगर इसके लिये उन्हें अमेरिका में रहना जरूरी होता है। उदयपुर में भी हमारे मिलने वाला एक परिवार है जो अमेरिका में यह पेन्शन उठाता है।
चलते चलते हम एक छोटे से शहर में निकल पड़े। एक बात यहां देखने में आई, बस्ती कितनी भी छोटी क्यूं न हो, हर जगह मेक्डोनल्डस, पीजा हट, बर्गर किंग, टेको बेल्स जैसे खाने पीने के स्थान प्रचुरता से होते हैं। यहां भी हर जगह फ्रेन्च का ही बोलबाला था। कोई मामूली अंग्रेजी तक भी नहीं समझता था। यह आश्चर्यजनक ही था क्यूंकि हमारे यहां यह धारणा घर कर चुकी है कि विकास के लिये अंग्रेजी जानना, बोलना जरूरी है। बिना अंग्रेजी के भी इस क्षेत्र की सम्पन्नता, समृद्धि और विकास में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। मैं फ्रान्स भी जा चुका हूं। पेरिस सहित कई शहरों में गया हूं, वहां भी अंग्रेजी का ऐसा अभाव दिखाई नहीं दिया, लोग अंग्रेजी समझते हैं, बोलते हैं।
यहां तो हालत यह थी कि हम एक मॉल में घूम रहे थे, एक दुकान पर किसी से अंग्रेजी में बात कर रहे थे, वहां एक लड़की थी, उसे हमारी बात बिल्कुल भी समझ नहीं आ रही थी, हमें अंग्रेजी में बोलता देख एक वृद्ध दम्पत्ति हमारे पास आए और हमसे पूछने लगे कि यहां बीयर कहां मिलेगा, वे काफी देर से पूछताछ कर रहे हैं मगर यहां कोई अंग्रेजी समझता ही नहीं। हमें भी पता नहीं था तो हम क्या बताते।
थोड़ी देर घूम घाम कर वापस हमने हाईवे पकड़ ली। यह एक अनूठे तरह का पर्यटन था। जहां मर्जी आये रूक जाओ, घूमो-फिरो, जब मर्जी हो चल पड़ो। सड़क के दोनों तरफ मीलों तक खेती ही खेती नजर आ रही थी। बुआई इतनी सघन थी कि मक्की के खेत भी दूर से घास के लॉन नजर आ रहे थे। पौधों से पौधों के बीच की दूरी और पौधों की एक कतार से दूसरे कतार की दूरी बहुत कम थी इसलिये प्रति एकड़ उपज भी कई गुना ज्यादा हो जाती होगी। खेती इतनी सुनियोजित थी कि मक्की के पौधे एक ही ऊंचाई के एसे प्रतीत हो रहे थे जैसे मशीन से निकाले हो। खेत बहुत बड़े बड़े थे और हर खेत में अनाज के भण्डारण हेतु लोहे के विशाल ढांचे बने हुए थे। शीघ्र ही खेत बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में परिवर्तित गये हम मोन्ट्रियल के बाहरी इलाके में पहुँच चुके थे।
Editorial

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