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रेलयात्रा 3 : ट्रेन में साफ-सुथरे, सुसजित बाथरूम
By EditorialPublished on
हमें कोई सीट नं. नहीं दिया गया था। कन्डक्टर एक कोच के दरवाजे पर खड़ा हो गया और एक एक करके सबको ट्रेन में प्रवेश देने लगा। हमारे टिकिट पहले ही द्वार पर चेक हो गये थे। शुरू शुरू में ट्रेन में चढ़ने वाले सभी यात्रियों ने खिड़की वाली सीटों पर कब्जा कर लिया था। इतनी लम्बी यात्रा कर ही इसलिये रहा था कि इसका आनन्द उठा सकूं । ऐसे में खिड़की वाली सीट नहीं मिले तो सारा मजा किरकिरा हो जायेगा, इसी आशंका के साथ मैं अपना नम्बर आते ही जल्दी जल्दी और खिड़की वाली सीट खाली दिखाई दी उधर ही दौड़ पड़ा। सौभाग्य से खिड़की वाली कई स

रेलयात्रा : हमें कोई सीट नं. नहीं दिया गया था। कन्डक्टर एक कोच के दरवाजे पर खड़ा हो गया और एक एक करके सबको ट्रेन में प्रवेश देने लगा। हमारे टिकिट पहले ही द्वार पर चेक हो गये थे। शुरू शुरू में ट्रेन में चढ़ने वाले सभी यात्रियों ने खिड़की वाली सीटों पर कब्जा कर लिया था। इतनी लम्बी यात्रा कर ही इसलिये रहा था कि इसका आनन्द उठा सकूं । ऐसे में खिड़की वाली सीट नहीं मिले तो सारा मजा किरकिरा हो जायेगा, इसी आशंका के साथ मैं अपना नम्बर आते ही जल्दी जल्दी और खिड़की वाली सीट खाली दिखाई दी उधर ही दौड़ पड़ा। सौभाग्य से खिड़की वाली कई सीटें खाली थी। वैसे भी दोनों तरफ दो दो सीटें थी, खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा यात्री भी बाहर का नजारा अच्छी तरह देख सकता था।
डबल डेकर ट्रेन थी। मुझे उपर के डेक पर सीट मिली। नीचे के डेक के उपर के डेक से बाहर का नजारा अच्छी तरह से दिखाई देता है। पूरी ट्रेन वेस्टयूबल ट्रेन थी अर्थात एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में जाया जा सकता था। कन्डक्टर ने अभी तक एक ही डिब्बा खोला था, ज्यूंही इस डिब्बे की खिड़की वाली समान सीटें भरा नई, कन्डक्टर ने दूसरा डिब्बा खोल दिया। मैंने अपने डिब्बे में नजर घुमा कर देखा तो सभी यात्री खिड़की वाली सीटों पर ही बैठे थे। पांवों के आहे काफी जगह थी, सीट पीछे झुक जाती थी, इस तरह एक व्यक्ति आरामी से सीट पर सो सकता था।
ट्रेन निर्धारित समय पर रवाना हुई। अगले दिन शिकागो पहुँचने वाली थी। यह शांति थी कि शिकागो तक की तो यात्रा तक अब नीचे उतरने की जरूरत नहीं। यसे भारत में भी मैं रेल यात्रा के दौरान स्टेशनों पर नहीं उतरता, डर रहता है कि कही ट्रेन चल न दे। यहां तो चाह कर भी नहीं उतर सकता था क्यूंकि ट्रेन रवाना होने के पहले इसकी सीढ़ीयां बन्द कर दी जाती थी। स्टेशन आने पर कन्डक्टर इन सीदीयों पर लगा ढक्कन उतारता था, उसके पश्चात सीढ़ीयों के नीचे एक लोहे का मजबूत चौड़ा स्टूल रखता था, इस पर पांव रख कर ही यात्री उतर सकता था वरना नहीं। वैसे भी ट्रेन से उतर कर कोई करे क्या, हमारे यहां के स्टेशनों जैसी तफरी तो यहाँ थी नहीं, न कहीं मावली की रबड़ी थी और न ही फतेहाबाद के गुलाब जामुन । खाने पीने की सारी चीजें ट्रेन में ही उपलब्ध थी।
ट्रेन काफी देर तक भूमिगत ही चलती रही। पेन स्टेशन का परिसर ही बहुत बड़ा है, इससे आसपास की तमाम बिल्डिंगें, डिपार्टमेन्ट स्टोर, मेडीसन स्क्वायर गार्डन, वगैरह अण्डर ग्राउण्ड में ही जुड़े हुए थे। किसी को तल पर आने की जरूरत ही नहीं थीं, नीचे ही नीचे इधर से उधर जाया जा सकता था। भूमिगत ही एक छोटी सी नगरी बन गई थी। पेन स्टेशन के पास ही मैसी का सात मंजिला डिपार्टमेन्ट स्टोर भी है। यह भी अण्डर ग्राउण्ड जुड़ा हुआ है। कभी मैसी का यह स्टोर दुनिया का सबसे बड़ा स्टोर हुआ करता था।
कन्डक्टर के अलावा ट्रेन में तीन चार अन्य सहायक भी थे। एक सहायक ने मेरी सीट के उपर एक स्टीकर चिपका दिया जिस पर शिकागो लिखा हुआ था, इसी तरह हर यात्री के गंतव्य का स्टीकर उसकी सीट के उपर चिपका दिया ताकि वह स्टेशन आये तो वे यात्री को वहां उतरने के लिये कह सकें।
सुरंग पार करके ज्यूं ही ट्रेन भूमितल पर आई एकदम उजाला हो गया। अब तक तो यही महसूस हो रहा था जैसे रात हो, अंधेरे अंधेरे ही घर से निकले थे, तब से अब तक अंधेरा ही था। ट्रेन आगे बढ़ती जा रही थी, समूचा न्यूयार्क शहर जैसे मेरी नजरों में घूम रहा था, खिड़की बहुत चौड़ी थी। अगली सीट के पीछे, हमारे यहां की चेयर कारों की तरह ही टेबल खुल जाता था। मेरी तरफ दो सीटें थी, इनके लिये दो चार्जिंग पोईन्ट इस टेबल के किनारे लगे हुए थे, मैंने भी अपना मोबाईल चार्जर पर लगा दिया था। हमारे यहां की ट्रेनों में भी यह सुविधा हो गई है मगर ए सीट के लिये एक पोइन्ट अभी तक शुरू नहीं हुआ है।
ट्रेन में बराबर घोषणाएं की जा रही थी, इन लोगों की अंग्रेजी समझ मुश्किल से ही आती है, आधी बात पल्ले पड़ती है, आधी नहीं। मेरे साथ यही ह रहा था। इनकी बात कुछ तो समझ में आती थी मगर मैं जो बोलता था, ये लोग बिल्कुल भी समझ नहीं पाते थे, मुझे अचरज होता था, हम लोग तो वैसे भी स रूक कर अत्यन्त साफ उच्चारित शब्दों में अंग्रेजी बोलते हैं। दरअसल इन लोगों ने अपनी अलग ही अंग्रेजी गढ ली है। मैंने एक सहायक से पूछा कि अगला स्टेशन कौन सा है तो भी वह नहीं समझा, दो चार बार दोहराया, इशारा किया तब उसने पूछा- यू मीन नेक्स्ट स्टोप ? स्टेशन को जब तक स्टोप नहीं बोलो इनके पल्ल नहीं पड़ता, लगेज को बेगेज बोलना पड़ता, प्लेटफार्म को ट्रेक ।
गाड़ी ने धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ ली, अब में अपनी सीट से उठा और बाथरूम जाने की सोची। बाथरूम को यहा रेस्ट रूम बोलते हैं। रेस्ट रूम निचली मंजिल पर थे। उतर कर नीचे गया, तीन चार बाथरूम एक साथ थे, एक बड़ा था जो दिव्यांग लोगों के लिये था मगर इसमें अन्य भी जा सकते थे। सभी अच्छे चौड़ चौड़े थे। हमारी ट्रेनों में भी बाधकम तो लम्बे चौड़े ही होते हैं। विमानों की तरह है इनमें टायलेट पेपर, नेपकीन्स, साबुन वगैरह थे। कुछ टूथब्रश, रेजर वर पाउच भी रखे थे। मैं सोच रहा था कि एसा हर ट्रेन में होता है या इसी ट्रेन में ऐसा था। फ्लश भी विमान की तरह वेक्यूम संचालित था।
अब मन में थोड़ा विश्वास आ गया था तो मैंने पूरी ट्रेन में घूमने की कोशिश की वापस उपर आया और एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में होते हुए डाइनिंग कार में पहुँच गया। वहाँ दोनों तरफ टेबलें लगी हुई थी जिन पर कई यात्री बैठे थे। कुछ तो खा पी रहे थे तो कुछ अपने लेपटोप खोल कर काम कर रहे थे। एक युवती बैठे बैठे कुछ लिख रही थी। इन्हें देखकर मुझे भी प्रेरणा मिल गई कि मैं भी अपने लिखने वगैरह का काम यहां बैठ कर निपटा सकता है।
डाइनिंग कार के आगे ही कैफे था। यहां हर तरह की खाने पीने की वस्तुएं बिक रही थीं। सामान लेने के लिये लोगों की लाईन लगी हुई थी। सिर्फ 3 व्यक्तियों को अन्दर प्रवेश दिया जा रहा था बाकी सब बाहर लाईन में खड़े थे। तीन में से एक व्यक्ति काउन्टर पर अपनी खरीदी वस्तुओं का भुगतान कर रहा था जबकि बाकी दो अपने लिये सामान चुन रहे थे। भुगतान कर अपना सामान लेकर एक व्यक्ति बाहर निकला तभी लाईन में सबसे आगे खड़ा व्यक्ति अन्दर जा सका।
इस तरह का अनुशासन मुझे हर जगह नजर आया। अपने यहां तो सभी व्यक्ति एक साथ काउन्टर पर झूम पड़ते हैं, जवाब देने वाला भी किस किस को जवाब दे। यहां एसा नहीं है, पूछताछ भी करनी है तो लाईन में खड़ा होना पड़ता है लाईन भी पांच फुट दूर से शुरू होती है, एक निपट जाता है तभी दूसरे को बुलाया जाता है। व्यावसायिक स्थलों पर भी यही अनुशासन है। मैं तो आदत के मुताबिक एक जगह काउन्टर पर कुछ पूछ बैठा, वहां खड़ी लड़की किसी अन्य से बात कर रही थी, उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, मैंने वापस पूछा तो अत्यन्त तल्खी से बोली कि सामने लाईन में खड़े हो, मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो पांच फुट दूर 5-7 लोगों की लाइन लगी थी। मुझे इनके पीछे जाकर खड़ा होना पड़ा।
हमारे यहां भी एसा चलन है मगर अभी तक यह सिर्फ हवाई अड्डों पर सिक्यूरिटी चेकिंग के दौरान ही नजर आता है जहां शारीरिक जांच हेतु मेटेलिक गेट से 5 फुट दूर पीली लाईन के पीछे खड़े होना पड़ता है। लोग इसका भी ध्यान नहीं रखते और चल पड़ते हैं एक के पीछे दूसरा, सुरक्षा अधिकारी जब डपट कर पीछे जाने को कहते हैं तब इन्हें पता पड़ता है।
विमान में यात्रा करने वाले तो अपने आपको अभिजात्य ही समझते हैं मगर लाईन लगाते वक्त उनकी भेड़ चाल सब पोल खोल देती है। ट्रेन के कैफे के बाहर में भी लाईन में खड़ा हो गया, नम्बर आया तो अन्दर गया। चारों तरफ घूम घाम कर देखा तो मेरे मतलब की एक भी चीज नहीं थी। सेण्डविच थे मगर उनमें भी चीज रह से हुए थे जो मुझे नहीं भाते थे सब लोग कुछ न कुछ खरीद रहे थे, मैं कुछ नहीं खरीदता तो भी अजीब सा महसूस करता । मेरे पास अपना खाने पीने का पर्याप्त सामान था।
राजा की माताजी बहुत वृद्ध व रुग्ण हैं। उनकी देखभाल करने एक गुजराती महिला जागृति आती है। उसे खाने पीने की चीजें बनाने का बड़ा शौक है। रोज सुबह शाम वह गर्म गर्म फुलके, दाल, सब्जियां, पोहे, मठरी वगैरा बनाकर खिलाती थी तो देशी स्वाद मिल जाता था। उससे मैंने आलू की सब्जी और पूड़ियां बनवा ली थी। नमकीन भी मेरे पास बहुत था, इसलिये कैफे से कुछ खरीदने की जरूरत नहीं थी फिर भी मैंने डाइट कोक की एक केन खरीद ली और अपनी सीट पर लौट आया ।

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