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भागवत कथा से मिलती है जीवन में शांति
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जिला मुख्यालय के समीपवर्ती के गांव पिपलांत्री में चल रही संगीतमय भागवत कथा (Bhagwat Katha) का वाचन करते हुए पुष्कर दास महाराज (Pushkar Das Maharaj) ने कहा कि भागवत का मतलब यही है जिसकी रुचि भगवान में लग जाए, आज के समय में सच्चा आनंद तो केवल सत्संग में है। आनंद का पल ही ईश्वर का रूप है।

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(प्रातः काल संवाददाता) राजसमंद | जिला मुख्यालय के समीपवर्ती के गांव पिपलांत्री में चल रही संगीतमय भागवत कथा (Bhagwat Katha) का वाचन करते हुए पुष्कर दास महाराज (Pushkar Das Maharaj) ने कहा कि भागवत का मतलब यही है जिसकी रुचि भगवान में लग जाए, आज के समय में सच्चा आनंद तो केवल सत्संग में है। आनंद का पल ही ईश्वर का रूप है।
सदगुरु तो अच्छा मिल जाता है लेकिन विवेक की जरूरत है। विवेक मिलता है सिर्फ सत्संग में भागवत की कथा में भटकने वाली आत्माएं कथा श्रवण करती है। धुंधुकारी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पांच स्त्रियों में फंसा था। उसकी आत्मा बांस में बैठी थी और सात गांठ से बंधा हुआ था। भागवत कथा सुनने से उसका उद्धार हुआ। भागवत कथा मनोरंजन नहीं आत्मानुरंजन होनी चाहिए। कथा सत्संग सबसे पहले घर में शांति करती है। ईश्वर से विमुख लोगों को कथा कीर्तन अशांति लगती है।
भागवत के ततवार्थ को समझाते हुए महाराज ने कहा कि आज के समय में लोग भागवत की कहानियों को पकड़ कर बैठते हैं। उनके कहानी के तत्वार्थ को नहीं समझने के कारण जीवन में क्रांति नहीं होती। भागवत का ही प्रमाण है कि शुकदेव ने एक ही बार कथा करी एवम राजा परीक्षित ने सुनी और उसकी मुक्ति हुई, लेकिन व्यक्ति के जीवन में अनेकों बार कथा सुनने से भी मुक्ति नहीं होती। छगन पालीवाल ने बताया कथा प्रतिदिन दोपहर 3 से 6 बजे तक चल रही है।

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