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रेलयात्रा 2 : अमेरिका की ट्रेनें 100 किमी. पर अटकी हुई
By EditorialPublished on
पेन स्टेशन पर जब हम उतर रहे थे तो सामने ही मेडिसन स्क्वायर गार्डन नजर आ गया। यह वही स्थान था जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान भारतीय आप्रवासियों तथा यहां रह रहे भारतवंशियों को सम्बोधित किया था। यह बास्केट बाल का बहुत बड़ा स्टेडियम है। अमेरिका में बास्केटबाल अत्यन्त लोकप्रिय है। आये दिन यहां बड़े बड़े मैच होते रहते है। इसके अलावा बड़े बड़े कलाकारों के कार्यक्रमों का भी यहां आयोजन होता है।

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रेलयात्रा : पेन स्टेशन पर जब हम उतर रहे थे तो सामने ही मेडिसन स्क्वायर गार्डन नजर आ गया। यह वही स्थान था जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान भारतीय आप्रवासियों तथा यहां रह रहे भारतवंशियों को सम्बोधित किया था। यह बास्केट बाल का बहुत बड़ा स्टेडियम है। अमेरिका में बास्केटबाल अत्यन्त लोकप्रिय है। आये दिन यहां बड़े बड़े मैच होते रहते है। इसके अलावा बड़े बड़े कलाकारों के कार्यक्रमों का भी यहां आयोजन होता है।
पेन स्टेशन चारों तरफ खूब फैला हुआ है। इसके कई द्वार है। घने बसे क्षेत्र में होने के कारण लोग एक गली से दूसरी गली जाने वगैराह के लिये भी इसका खुल कर इस्तेमाल करते है। यह सार्वजनिक स्थान है, हमारे यहां की तरह रेल्वे की बपौती नहीं।
मुम्बई (Mumbai) की लोकल ट्रेन (Local Train) वहां की जीवन रेखा है, यह पूरे शहर को ईस्ट और वेस्ट में विभाजित करती है और बीच में से निकलती है। ईस्ट से वेस्ट और वेस्ट से ईस्ट जाने के लिये पुल है, अण्डर ब्रिज है, रेल फाटक है फिर भी लोगों को बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है। जल्दी में लोग रेल्वे ब्रिज क्रोस करके इधर से उधर जाने की कोशिश करते हैं तो रेल अधिकारी उनसे टिकिट मांगते है। टिकिट नहीं होने पर भारी जुर्माना लगा देते हैं, किसी के पास नहीं हो तो जेल की हवा खिला देते है। ये सरासर अन्याय और अत्याचार है। रेल्वे भी जन सुविधा है, आखिर जनता की मूल्यवान भूमि अधिग्रहित करके ही तो रेल लाईन डाली गई है। आज मेट्रो लाईन बिछाने में इसीलिये तो दिक्कत आ रही है कि जनता अड़ी हुई है। रेल मंत्री सुरेश प्रभु सुलझे हुए हैं, उन्हें रेल्वे स्टेशनों का प्रयोग जनता के लिये खोल देना चाहिए।
अमेरिका में रेलों का विकास नहीं हो पाने के पीछे भी यही कहानी है। आज जापान, चीन और यूरोप के देशों में जिस तरह रेलों का विकास हुआ है उसके मुकाबले अमेरिका भी भारत की तरह पिछली शताब्दी में ही पड़ा हुआ है। उस दौरान जो हो गया, वही आज भी चल रहा है। भारत में रेलों का विकास नहीं होने का कारण सत्ताधीशों की उदासीनता और फण्ड की कमी रही है जबकि अमरीकी रेलों के पिछड़ेपन के कारण अन्य है।
अमेरिका में सभ्यता के विकास में रेलों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जहां जहां से रेल लाइनें गुजरी, उसके दोनों तरफ बस्तियां बस गई जिन्होंने धीरे कस्बों, शहरों का रूप ले लिया। पूर्व, पश्चिम से जुड़ गया, पूरा देश एक सूत्र में बंध गया। कालान्तर में रेल लाइनों के ईर्द गिर्द स्थापित सम्पत्तियों की कीमतें आसमान पर पहुँच गई, यहां लोगों के आवास बन गये। रेल का कोई भी विकास सम्पत्तियों को अधिग्रहित किये बिना या यहां के आवासियों को छेड़े बिना संभव नहीं था। आवासियों को छेड़ो तो मुकदमों का अम्बार लग जाये।
आज जापान व चीन में 250-300 किमी गति की ट्रेनें चलना साधारण बात है, यूरोप में भी द्रुतगति की ट्रेनें है मगर अमेरिका की ट्रेनें आज भी सौ किमी. की गति के आसपास अटकी हुई है। यहां मुझे लोस एंजलेस जाने में चार दिन लग रहे हैं, चीन या जापान में होता तो यह दूरी एक दिन में पूरी हो जाती।
19वीं शताब्दी के मध्य से बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक, पूरे अमेरिका में एक शहर से दूसरे शहर में रेल द्वारा ही जाया जाता था। अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग कम्पनियों की ट्रेनें चलती थी। इन कम्पनियों की गुड्स ट्रेनें भी चलती थी। 1920 के बाद रेलों की लोकप्रियता कम हुई, सड़क मार्ग बनने लगे। 1930 में रेलों के आधुनिकरण से फिर इस तरफ रूझान बढा, मगर 1965 आते आते यह बहुत कम हो गया। इस दौरान नेशनल हाईवे प्रणाली विकसित हो गई जिसने रेलों को कड़ी चुनौती दे दी। जिन स्थानों पर पहले सिर्फ रेल द्वारा ही जाना संभव था वहां अब बसों से आसानी से जाया जा सकता था।
हमारे यहां भी यही स्थिति थी। अहमदाबाद उदयपुर के कितना पास है। मुझे याद है कि सब अहमदाबाद जाने के लिये रेल ही एक मात्र विकल्प था। उदयपुर मारवाड़ जाते थे और वहां ट्रेन चेन्ज कर अहमदाबाद जाया जाता था। आज तो यह चन्द घंटों की दूरी पर है। से सड़क मार्ग के बाद वायु मार्ग ने अमेरिका में आशातीत प्रगति की। पूरा अमेरिका हवाई अड्डा और वायु सेवाओं के जाल से आच्छादित हो गया। आज वायु भार्ग अमेरिका में आवागमन के साधनों में शीर्ष स्थल पर है, सड़क मार्ग दूसरे तथा रेल मार्ग तीसरे स्थान पर है। कई कई स्थानों पर तो ट्रेनों की बजाय विमान से जाना सस्ता पड़ता है। मेरा लास एजलेस का टिकिट 290 डालर में आया जबकि विमान से जाने पर सिर्फ 250 डालर में ही आ जाता।
अमेरिका में लंबी दूरी के लिए ट्रेनों का प्रयोग कोई नहीं करता कम दूरी के लिए भले ही इनका प्रयोग एक विकल्प है। ट्रेनों के भाड़े भी अपेक्षाकृत महंगे पड़ते हैं। ऐसे में यहां ट्रेनों का विकास नहीं हो तो खलता नहीं मगर हमारे यहां रेल आज भी गमनागमन का सबसे सस्ता साधन है, इस कारण इसका विकास परम आवश्यक है। विकास यदि पहले से विद्यमान रेल संजाल तक ही सीमित रहे तो क्या फायदा, इसका जाल जब तक दूर दूर तक अनछूए और दुर्गम स्थानों तक नहीं पहुंचे, विकास के कोई मायने नहीं यह दुर्भाग्य की ही बात है कि उदयपुर संभाग ने प्रदेश को चार मुख्यमंत्री दिए, प्रभावी केन्द्रीय मंत्री दिये, मुख्यमंत्री को भी नाकों चने चबवाने वाला शक्तिशाली गृहमंत्री दिया इसके बावजूद रेलों का समुचित विकास नहीं हो पाया - देश इक्कीसवीं शताब्दी में पहुंच गया मगर बांसवाड़ा जैसा शहर आज भी रेल से वंचित है।
यहां ब्रोडगेज या मीटर गेज नहीं चलता। यहां स्टेण्डर्ड गेज है। सर्वत्र डबल डेकर ट्रेन चलना आम है। विमानों की तरह इसमें भी इकोनोमी व बिजनेस क्लास होती है। इकोनोमी क्लास में भी पूरी सुविधाएं है। समुची ट्रेन एयर कण्डीशन्ड होती है, सर्दियों में हीट संचालित रहती हैं। हमारे यहां की तरह थ्री टायर नहीं होते मगर स्लीपर में टू टायर जरूर होते।
एम ट्रेक एक कोरपोरेट कंपनी है जिसमें सरकार की भी आंशिक भागीदारी है। 1971 में इसने देश के 46 प्रदेशों व कनाड़ा के 3 प्रदेशों में रेल मार्गों पर आधिपत्य कर लिया। इससे पहले रेल मार्गों पर अलग अलग कंपनियों का कब्जा था। कोई कोई ट्रेन जरूर द्रुत गति से चलती है।
इनके मुकाबले लोकल ट्रेनों पर लोगों की निर्भरता अत्याधिक है। अलग अलग शहरों में आज भी ये अलग अलग कंपनियों द्वारा चलाई जाती हैं। अकेले न्यूयार्क में ही चार कंपनियों की लोकल ट्रेनें हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में चलती है।
आश्चर्य इस बात का है कि लोकल ट्रेनों को शहर के विमानतलों से नहीं जोड़ा गया है जिसकी कभी बहुत खलती है।
थोड़ी ही देर में शिकागो जाने वाली ट्रेन की बोर्डिंग शुरू होने की घोषणा गई। विमानों की तरह एक निश्चित गेट के बाहर तमाम यात्रियों को एकत्र होने के लिए कहा गया। मैं उस गेट के बाहर लगी कतार में खड़ा हो गया। शीघ्र हो द्वार खुला और हमें उस प्लेटफार्म में प्रवेश दिया गया जिस पर हमारी ट्रेन खड़ी थी। यहां प्लेटफार्म बोलो तो कोई नहीं समझता, ट्रेक बोलना पड़ता है।
प्लेटफार्म क्या था एक पतली सी पांच छ फीट की पट्टी थी। हमारे यहां प्लेटफार्मों पर जिस तरह एक स्पंदित जीवन और मेले सा वातावरण नजर आता है यहां एसा कुछ नहीं था। न तो सामान बेचने वालों की आवाजे, न यात्रियों की रेलमपेल, न विदा कर रहे मित्रों-रिश्तेदारों के भावुक क्षण कुलियों की जरूरत ही नहीं, सामान सारा पहले ही चेक इन हो जाता है। बेट्री संचालित कुछ कार्ट जरूर खड़ी थी, किसी के पास ज्यादा सामान हो तो इसमें ले जा सकते थे।

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